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Data Protection Bill 2023: डेटा प्रोटेक्शन बिल क्या है, विपक्ष जता रहा ऐतराज, क्यों बरपा है हंगामा?

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि यह विधेयक सरकार को निजी डेटा तक पहुंचने का अधिकार देता है. अगर ऐसा हुआ तो सबकी प्राइवेसी पर सरकार की नजर होगी.

Data Protection Bill 2023: डेटा प्रोटेक्शन बिल क्या है, विपक्ष जता रहा ऐतराज, क्यों बरपा है हंगामा?

लोकसभा में Data Protection Bill पर चर्चा की मांग कर रहे हैं अश्विनी वैष्णव. (तस्वीर-PTI)

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डीएनए हिंदी: केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने गुरुवार को लोकसभा में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल 2023 पेश किया है. इस बिल का पहला प्रस्ताव, गोपनीयता और निजता को लेकर सवालों के घेरे में था, जिसके बाद सरकार ने इसे वापस ले लिया था. प्रस्तावित विषय पर विधेयक बनने में 5 साल लगे हैं. बीते 6 साल से इस पर चर्चा होती रही है. यह प्रस्ताविक कानून का पांचवा संस्करण है.

अगर यह विधेयक कानून बनता है भारतीयों के डिजिटल पर्सनल डेटा पर नजर रखी जाएगी. केंद्र सरकार के मुताबिक यह संवैधानिक दायरे के भीतर ही होगा. किसी के व्यक्तिगत डेटा का उल्लंघन नहीं किया जाएगा. निजता और गोपनीयता के भीतर ही सरकार, इस कानून को लाना चाहती है. सरकार की दलील है कि इससे इंटरनेट कंपनियों के डेटा स्टोरेज और प्रॉसेसिंग पर लगाम लगेगी और उनकी जवाबदेही तय होगी.

क्यों डेटा प्रोटेक्शन बिल पर विपक्ष जता रहा है ऐतराज?

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि यह विधेयक सरकार को निजी डेटा तक पहुंचने का अधिकार देता है और इससे एक विजिलेंस स्टेट बन जाएगा. कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने सुझाव दिया कि विधेयक को आगे के मूल्यांकन के लिए संसदीय स्थायी समिति के पास भेजा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह विधेयक, निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है.

तृणमूल कांग्रेस के विधायक सौगत रे ने नए विधेयक को समिति को भेजे गए मूल विधेयक से बहुत अलग बताया. उन्होंने कहा कि बिल को पूरी तरह से बदल दिया है. मैं चाहता हूं कि इस बिल को फिर से स्थायी समिति के पास भेजा जाए. कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि यह बिल पुट्टुस्वामी फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निजता के मौलिक अधिकार का खंडन करता है. ल सभी गैर-सरकारी संगठनों पर पूरी ताकत से लागू होगा और सरकार को इस कानून से छूट मिलेगी.

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राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सांसद सुप्रिया सुले ने डेटा के अत्यधिक केंद्रीकरण का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि यह संघीय ढांचे की भावना को चोट पहुंचाता है. सूचना का अधिकार कमजोर कर दिया गया है.। सरकार पूरी तरह सुरक्षित रहेगी और अन्य लोग पूरी तरह बेनकाब हो जाएंगे. केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि सरकार विधेयक को लेकर चिंताओं पर चर्चा के लिए तैयार है.

क्या है डेटा प्रोटेक्शन बिल?

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक 2022 (बिल) के ड्राफ्ट को 5 जुलाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिल गई थी.  यह डिजिटल सिटीजन के कॉन्सेप्ट पर काम करता है. यह डिजिटल नागरिकों के अधिकार और कर्तव्यों पर जोर देता है. यह बिल जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) समेत दूसरे न्यायलों में डेटा संरक्षण कानूनों का आधार बन सकता है. इस विधेयक में डेटा की वैधता, निष्पक्षता और पारदर्शिता, उद्देश्य सीमा, डेटा एक्युरेसी, स्टोरेज क्षमता, इंटिग्रिटी, गोपनीयता और निजता जैसे विषय शामिल हैं. यह विधेयक कंपनियों पर ज्यादा जोर डाले बिना ही डेटा प्रोटेक्शन की बात करता है.

यह विधेयक, शुरुआत से ही चर्चा में है. विपक्ष इसे मौलिक अधिकारों में दखल मानता है. बीते 6 साल से इस कानून पर बहस छिड़ी है. इस विधेयक के ड्राफ्ट को आसान भाषा में तैयार किया गया है. इसका मकसद टेक्नोलॉजी, हेल्थ, कम्युनिकेशन बैंकिंग, फाइनेंस, ई-कॉमर्स और कई अन्य संगठनों के लिए जवाबदेही तय करनी है.

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यह बिल 18 नवंबर 2022 से ही सार्वजनिक चर्चा के लिए जारी किया गया था. बिल को विशेषज्ञों और कंपनियों की ओर से कुल 20,000 सुझाव मिले हैं. दिलचस्प बात यह है कि अधिकारियों के अनुसार सार्वजनिक परामर्श के लिए प्रसारित प्रस्तावित मसौदे और संसद में पेश किए जाने वाले अंतिम विधेयक के बीच ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. 

इस विधेयक में क्या-क्या है खास?

- इस विधेयक में पर्सनल डेटा की परिभाषा दी गई है. कोई भी डेटा जो किसी व्यक्ति की पहचान करने में मदद कर सकता है, वह पर्सनल डेटा है. 

- यह 'डिजिटल पर्सनल डेटा' के प्रॉसेसिंग पर लागू होता है. इसके दायरे से नॉन पर्सनल डेटा और नॉन डिजिटल फॉर्मेट दोनों को बाहर रखा गया है. 

- यह देश के भीतर ही डिजिटल डिजिटल पर्सनल डेटा प्रॉसेसिंग पर लागू होता है.

- विधेयक में प्रावधान है कि किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत डेटा को कानूनी आधार पर ही प्रॉसेस किया जा सकता है. इसके लिए व्यक्ति की सहमति अनिवार्य है. 

- विधेयक के वर्तमान मसौदे में 'डीम्ड सहमति' की अवधारणा पेश की गई है जो उन स्थितियों को संदर्भित करती है जहां सहमति की स्पष्ट रूप से जरूरत नहीं है.

- अगर प्रॉसेसिंग रोजगार और सार्वजनिक उद्देश्य के लिए है तब सहमति मान ली जाएगी. ये आधार कर्मचारी डेटा को दी गई सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं. विपक्ष को इस मुद्दे पर भी ऐतराज है.

-  इस बिल के कानून बनने के बाद जुर्माना लगाने का निर्धारण करने के लिए एक डेटा संरक्षण बोर्ड स्थापित किया जाएगा. 

- यह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी लागू होगा.

- अगर कोई कंपनी, गलत तरीके से डेटा प्रॉसेसिंग में शामिल होता है, किसी की गोपनीयता सार्वजनिक होती है, डेटा ब्रीच की घटना सामने आती है तो उस पर 200 करोड़ तक जुर्माना लग सकता है. 

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