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गैस चेंबर जैसे हालात से कैसे उबरा चीन? जानिए कैसे कम दिया हवा का प्रदूषण

Air Pollution: आज जैसी हवा दिल्ली एनसीआर की है, कुछ साल पहले तक ऐसा ही हाल चीन का था लेकिन अब हालात बदल चुके हैं.

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Air Pollution

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डीएनए हिंदी: दिल्ली और समूचा एनसीआर क्षेत्र बीते कुछ सालों से हवा के प्रदूषण से जूझ रहा है. सर्दियां आते ही हवा का प्रदूषण इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि सांस लेने और बाहर निकलने में तकलीफ होने लगती है. इस बार भी प्रदूषित हवा के चलते ही स्कूलों को बंद कर दिया गया है और GRAP 4 के प्रतिबंध लागू किए गए हैं. ऐसे ही हालात चीन में लगभग एक दशक पहले हुए करते थे. चीन ने बीते 10 सालों से कई ऐसे प्रयास किए हैं जिससे उसने इस समस्या पर काफी हद तक काबू पा लिया है. ऐसे में दिल्ली और भारत के दूसरे शहरों को इस उदाहरण से सीखने की जरूरत है, ताकि आने वाले समय में दिल्ली को गैस चेंबर की समस्या से निजात दिलाई जा सके.

दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के प्रदूषण का मुख्य कारण पराली जलाना, गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण, फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं और हवा की कम रफ्तार होती है. इस बार भी देखा गया कि तमाम प्रयासों के बावजूद हवा में सुधार नहीं हो रहा था लेकिन जैसे ही हल्की बारिश के साथ हवा चली तो प्रदूषण धुल गया. हालांकि, बारिश और हवा इंसानों के हाथ में नहीं है ऐसे में कुछ ऐसे उपाय करने होंगे जो स्थायी तौर पर इस समस्या को खत्म कर सकें. आइए इसे विस्तार से समझते हैं...

PM 2.5 के स्तर में आई कमी
सालों तक खराब हवा के कारण चीन के लोगों को कई तरह की समस्याएं हुईं. दुनियाभर में चीन की आलोचना भी हुई. हालात ऐसे थे कि हर साल लगभग पांच लाख लोगों की जान सिर्फ खराब हवा की वजह से जा रही थी. आखिर में चीन ने इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाए. बीते कुछ सालों में पार्टिकुलेट मैटर यानी PM 2.5 एक तिहाई हो चुका है. बता दें कि PM 2.5 इतना बारीक होता है कि यह सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाता है और कई खतरनाक बीमारियों को दावत देता है.

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चीन ने साल 2013 में ही नेशनल एयर क्वालिटी एक्शन प्लान लागू किया था. इसके लिए उसने भारी भरकम बजट भी खर्च किया और तुरंत ही 19 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट शुरू किए. इन पर तुरंत काम भी शुरू किया गया. लोगों को समस्या हुई तो विरोध भी हुआ लेकिन चीन की सरकार ने इस पर काम जारी रखा और अपने फैसले पर टिकी रही.

चीन ने कैसे कम किया प्रदूषण?
चीन ने पुरानी और खराब गाड़ियों को सड़क से पूरी तरह हटा दिया. कई अहम शहरों में गाड़ियों की संख्या काफी कम कर दी गई. ऐसे कारखानों को शहर से बाहर कर दिया गया जो प्रदूषण फैला रहे थे. कुछ कारखानों को पूरी तरह से बंद कर दिया गया. प्रदूषण की मार झेल रहे कई शहरों में ग्रीन कॉरिडोर बनाकर उनमें खूब पेड़ लगाए गए. फैक्ट्रियों में कोयले का इस्तेमाल बंद कर दिया गया और नए प्लांट को दी जाने वाली मंजूरी पर रोक लगा दी.

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2013 से पहले सिर्फ राजधानी बीजिंग के 40 लाख से ज्यादा घरों में ईंधन के तौर पर कोयले का इस्तेमाल हो रहा था. लोग ठंड से बचने के लिए भी कोयले की आग जलाते थे. सरकार ने कोयले के इस्तेमाल पर रोक लगा दी और नेचुरल गैस या हीटर दे दिए. साल 2014 में सिर्फ बीजिंग में 392 कारखाने बंद कर दिए.

भारत में क्या हैं चुनौतियां?
पराली जलाने पर रोक हर बार लगाई जाती है लेकिन किसानों का कहना है कि उनके पास इसका कोई विकल्प नहीं है. दरअसल, धान की फसल के तुरंत बाद गेहूं की बुवाई करनी होती है और किसान ज्यादा समय तक इंतजार नहीं कर सकते. ऐसे में उन्हें पराली जलाकर ही खेत साफ करना होता है. ऐसे में अगर सरकार इस समस्या का कोई हल निकाले तो एक झटके में प्रदूषण में भारी कमी आ सकती है. दूसरी समस्या, फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं है. दिल्ली-एनसीआर में हजारों छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां मौजूद हैं. अब इन फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाले डीजल जेनरेटरों को गैस में बदलने की प्रक्रिया शुरू की गई है.

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इसके अलावा, फैक्ट्रियों की चिमनियों और गाड़ियों से निकलने वाले धुएं को कम करने की जरूरत है. गाड़ियों को इलेक्ट्रिक गाड़ियों में बदलने की मुहिम पर जोर दिया जा रहा है लेकिन ई-व्हीकल महंगे होने और चार्जिंग की पर्याप्त सुविधा न होने की वजह से अभी इसकी रफ्तार भी धीमी है.

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