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Amarnath Yatra 2022: अमरनाथ गुफा का रहस्य क्या है, कैसे वहां हुआ शिवलिंग का निर्माण ?

Amarnath Temple मंदिर और गुफा से जुड़े रहस्यों के बारे में आपको पता है. अगर नहीं तो यहां जानिए गुफा का इतिहास क्या है और कैसे वहां शिवलिंग का निर्माण हुआ.

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डीएनए हिंदी: हिमालय की गोदी में स्थित भगवान शिव को समर्पित अमरनाथ का मंदिर (Amarnath Temple) हिंदुओं के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है. हर साल दूर दूर से यात्री बाबा बर्फानी के दर्शन करने के लिए यहां आते हैं और पहले से ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं. कहते हैं जिनको बाबा का बुलावा आता है वे ही यात्रा पर जा पाते हैं, ये यात्रा इतनी भी आसान नहीं है

यह गुफा जम्मू कश्मीर के श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 135 किलोमीटर दूर स्थित है, जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई करीब  13 हजार, 600 फीट है. इस पवित्र गुफा की लंबाई 19 मीटर, चौड़ाई 16 मीटर और ऊंचाई 11 मीटर है

अमरनाथ गुफा और मंदिर का इतिहास (History of Amarnath Temple and Cave)


मान्यता है कि इस गुफा में भगवान शिव और माता पावर्ती के अमरत्व का महत्व छिपा है, इसलिए हिंदुओं में इसकी इतनी मान्यता है. इस पवित्र गुफा के दर्शन करने से भक्तों की सभी मुरादें पूरी होती हैं, हालांकि इसके दर्शन बेहद दुर्लभ हैं, बड़ी मुश्किलों के बाद भक्तगण इसके दर्शन करने के लिए यहां पहुंचते हैं.

इस पवित्र मंदिर का अपना एक ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है. इस गुफा में जो शिवलिंग है वो पूरे साल बर्फ से ढका रहता है, इसलिए भोले को बाबा बर्फानी या हिमानी शिवलिंग कहते हैं. 

इस पवित्र हिमलिंग के दर्शन करने दूर-दूर से भक्त जन यहां पहुंचते हैं. अमरनाथ की यात्रा पूरे साल में करीब 45 दिन की होती है, जो ज्यादातर जुलाई और अगस्त के बीच में होती है. आषाढ़ पूर्णिमा से लेकर भाई-बहन के पावन पर्व रक्षाबंधन तक होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए दुनिया के कोने-कोने से शिव भक्त अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं. 

गुफा में क्या है खास (Importance of Amarnath Cave)

इतिहास में इस बात का भी जिक्र किया जाता है कि महान शासक आर्य राजा कश्मीर में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा करते थे, रजतरंगिनी किताब में भी इसे अमरनाथ या अमरेश्वर का नाम दिया गया है

कहा जाता है की 11 वीं शताब्दी में रानी सुर्यमठी ने त्रिशूल, बनालिंग और दुसरे पवित चिन्हों को मंदिर में भेंट स्वरुप दिये थे, अमरनाथ गुफा की यात्रा की शुरुआत प्रजाभट्ट द्वारा की गई थी, इसके साथ-साथ इतिहास में इस गुफा को लेकर कई और कथाएं भी मौजूद हैं

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पवित्र गुफा की खोज  (Discovery of Baba Barfani Cave)

कहा जाता है की मध्य कालीन समय के बाद, 15 वी शताब्दी में दोबारा धर्मगुरूओं द्वारा इसे खोजने से पहले लोग इस गुफा को भूलने लगे थे

इस गुफा से संबंधित एक और कहानी भृगु मुनि की है. कहा जाता था की कश्मीर की घाटी जलमग्न है और कश्यप मुनि ने कई नदियों का बहाव किया था

इसलिए जब पानी सूखने लगा तब सबसे पहले भृगु मुनि ने ही सबसे पहले भगवान अमरनाथ जी के दर्शन किये थे।

इसके बाद जब लोगों ने अमरनाथ लिंग के बारे में सुना तब यह लिंग भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग कहलाने लगा. 

40 मीटर ऊंची अमरनाथ गुफा में पानी की बूंदों के जम जाने की वजह से पत्थर का एक आरोही निक्षेप बन जाता है

हिन्दू धर्म के लोग इस बर्फीले पत्थर को शिवलिंग मानते है, यह गुफा मई से अगस्त तक मोम की बनी हुई होती है क्योंकि उस समय हिमालय का बर्फ पिघलकर इस गुफा पर आकर जमने लगता है और शिवलिंग का आकार ले लेता है

कहा जाता है की सूर्य और चन्द्रमा के उगने और अस्त होने के समय के अनुसार इस लिंग का आकार भी कम-ज्यादा होता है लेकिन इस बात का कोई वैज्ञानिक सबूत नही है

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, यह वही गुफा है जहां भगवान शिव ने माता पार्वती को जीवन के महत्त्व के बारे में समझाया था।

दूसरी मान्यताओं के अनुसार बर्फ से बना हुआ पत्थर पार्वती और शिवजी के पुत्र गणेशजी का का प्रतिनिधित्व करता है।

इस गुफा का मुख्य वार्षिक तीर्थस्थान बर्फ से बनने वाली शिवलिंग की जगह ही है।

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अमरनाथ गुफा का रास्ता (What is the way of Amarnath Cave)

श्रीनगर या पहलगाम से पैदल ही यात्रा की जाती है, इसके बाद की यात्रा करने के लिए  5 दिन लगते है,राज्य यातायात परिवहन निगम और प्राइवेट ट्रांसपोर्ट से जम्मू से पहलगाम और बालताल तक की यात्रा की जाती है. इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर से प्राइवेट टैक्सी भी कर सकते है. 

उत्तरी रास्ता तकरीबन 16 किलोमीटर लंबा है लेकिन इस रास्ते पर चढ़ाई करना बहुत ही मुश्किल है. यह रास्ता बालताल से शुरू होता है और डोमिअल, बरारी और संगम से होते हुए गुफा तक पहुंचता है, उत्तरी रास्ते में हमें अमरनाथ घाटी और अमरावाथी नदी भी देखने को मिलती है जो अमरनाथ ग्लेशियर से जुड़ी हुई है

कहा जाता है की भगवान शिव पहलगाम (बैलगाव) में नंदी और बैल को छोड़ गए थे, चंदनवाड़ी में उन्होंने अपनी जटाओं से चन्द्र को छोड़ा था और शेषनाग सरोवर के किनारे उन्होंने अपना सांप छोड़ा था

 

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