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Legal opium production in India: अफीम प्रोडक्शन और प्रोसेसिंग के लिए क्यों केंद्र सरकार ने दी प्राइवेट कंपनियों को इजाजत?

Opium production in India: भारत ने अफीम प्रोडक्शन और प्रोसेसिंग के दरवाजे प्राइवेट प्लेयर्स के लिए खोल दिया है. अफीम की खेती पर क्यों उठते हैं सवाल, कैसे होता है इसका उत्पादन और कैसे इसे प्रोसेस किया जाता है. आइए समझते हैं.

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भारत में अफीम प्रोडक्शन करेंगी प्राइवेट कंपनियां. 

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डीएनए हिंदी: भारत (India) ने अफीम के उत्पादन (Opium Production) और अफीम प्रॉसेसिंग (Opium Processing) के दरवाजे अब प्राइवेट कंपनियों के लिए खोल दिए हैं. बजाज हेल्थकेयर ऐसी पहली कंपनी बन गई है जिसने यह टेंडर हासिल किया है. अब बजाज पोस्ता स्ट्रॉ का प्रोडक्शन करेगा जिसके जरिए एल्कलॉइड (Alkaloids) हासिल किया जाता है. अफीम के प्रोसेसिंग से कई दर्द निवारक दवाइयां (Pain Relievers)  बनती हैं. 

ऐतिहासिक अभिलेखों के मुताबिक भारत में अफीम की खेती 15वीं शताब्दी से होती रही है. जब मुगल साम्राज्य का पतन हो रहा था तब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (British East Indian Company) ने अफीम की खेती पर एकाधिकार कर लिया था. आम किसानों से अफीम की खेती का अधिकार छीन लिया गया था. अफीम का पूरा व्यापार 1873 तक सरकारी नियंत्रण में आ गया था.

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किन कानूनों के तहत कंट्रोल होती है अफीम की खेती?

जैसे ही भारत को आजादी मिली, अफीम की खेती और व्यापार का अधिकार पूरी तरह से केंद्र सरकार के पास चला गया. अफीम की खेती को नियंत्रित करने के लिए अंग्रेजों ने एक कानून भी अफीम एक्ट के नाम से बनाया था. अफीम एक्ट 1857, 1878 और डेंजरस ड्रग्स अधिनियम, 1930 ही ऐसे अधिनियम थे जिसके जरिए देश में नशीली दवाओं के उत्पादन पर नजर रखी जाती थी. अफीम की खेती और अफीम की प्रोसेसिंग नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सबस्टेंस (NDPS) एक्ट के नियमों के तहत होता है.

देश में अफीम उगाने और बेचने के क्या नियम हैं?

अफीम की खेती की इजाजत सबको क्यों नहीं दे दी जाती है? इस सवाल के जवाब में एडवोकेट विशाल अरुण मिश्रा कहते हैं कि अफीम की खेती की इजाजत सबको नहीं दी जा सकती है. यह बेहद खतरनाक ड्रग है जो इंसान की चेतना को प्रभावित कर सकता है. मेडिकल साइंस भले ही इसे दवाइयों के तौर पर देखे लेकिन अगर इसके खुले इस्तेमाल की इजाजत दे दी जाए तो पूरी पीढ़ी इसकी जद में आ सकती है. यह बेहद तीखे किस्म का निश्चेतक है. इसलिए ए़नडीपीएस एक्ट के तहत ही इस पर नजर रखने की जरूरत है.

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एडवोकेट उज्जवल भरद्वाज कहते हैं कि अवैध व्यापार की आशंका और एडिक्शन के जोखिम की वजह से अफीम की खेती को सख्ती से कंट्रोल किया जाता है. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के 22 जिलों में केंद्र सरकार ने कुछ सीमित इलाकों में अफीम प्रोडक्शन की इजाजत दी है.

हर साल सरकार तय करती है लाइसेंस नीति

केंद्र सरकार हर साल अफीम की खेती के लिए लाइसेंस नीति तय करती है. सरकार हर साल अफीम की खेती का रकबा कम करती है. किसान अपनी फसल में चीरा नहीं लगा सकते हैं. केवल उत्पादन ही कर सकते हैं. अफीम की खेती पर सख्ती से नजर रखी जाती है. अवैध अफीम उत्पादन की जांच के लिए सरकार सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल करती है. जब फसल तैयार हो जाती है को सरकार अपने फॉर्मूले से यह जांचती है कि कितना प्रोडक्शन हुआ होगा. सरकार पूरी तरह से अफीम खरीद लेती है और कारखानों में इसे प्रोसेस करती है.

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अफीम का अफगानिस्तान के साथ ये है कनेक्शन

भारत में तस्करी के जरिए अफीम अफगानिस्तान से आता है. अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था ही इसी अपरोक्ष कारोबार पर टिकी है. देश में अफीम का प्रोडक्शन यूपी में गाजीपुर, मध्य प्रदेश के नीमच में होती है. सरकारी अफीम और अल्कलॉइड कारखानों में संसाधित होती है. यहीं मॉर्फिन, कोडीन, थेबाइन और ऑक्सीकोडोन जैसे उत्पादों का प्रोडक्शन होता है.

एडवोकेट अनुराग कहते हैं कि अगर सरकार अफीम की खेती को कंट्रोल करती है तो इसे प्राइवेट प्लेयर्स को सौंपने में कोई दिक्कत नहीं है. ध्यान देने वाली बात बस इतनी सी है कि किसी भी तरह से इसकी तस्करी न होने वाले. एक-एक फूल पर सरकार की नजर हो. अगर ऐसा नहीं हुआ तो ड्रग के कारोबार पर कंट्रोल कर पाना बेहद मुश्किल होगा. 

अफीम का इस्तेमाल कहां-कहां होता है?

अफीम से तरह-तरह के ड्रग बनते हैं. अफीम से मॉर्फिन जैसी दवाइयां बनती हैं. कैंसर मरीजों के लिए भी अफीम से बनी दवाइयों का इस्तेमाल किया जाता है. अफीम से बना प्रोडक्ट कोडीन खांसी की दवाइयों में इस्तेमाल होता है. अफीम इतना खतरनाक ड्रग है कि लोग इसके इस्तेमाल के बाद एडिक्ट हो जाते हैं. भारत समेत 12 देशों में इसकी खेती को कानूनी तौर पर मान्यता दी गई है. अफीम का इस्तेमाल औषधि के लिए होती है. 

निजी कंपनियों की दखल से क्या होगा बदलाव?

प्राइवेट कंपनियों के दखल से अफीम प्रोडक्शन में तेजी आ सकती है. अगर फर्मास्युटिकल कंपनियों ने प्रोडक्शन तेज किया तो सरकार को बड़ा आर्थिक फायदा पहुंच सकता है. बजाज हेल्थकेयर के मुताबिक अफीम से अल्कालॉयड और दवा एपीआई सरकार को मुहैया कराने का टेंडर मिला है. एक अनुमान के मुताबिक आने वाले कुछ वर्षों में कंपनी 6000 टन प्रोसेस्ड कर सकती है. मॉर्फिन और कोडिन जैसे अलग-अलग अल्कलॉइड के प्रोडक्शन को भी बढ़ावा मिल सकता है. हालांकि इन सबके बीच सरकार के पास सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि कैसे अफीम की खेती की मॉनिटरिंग की जाए.

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