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DNA TV Show: कांग्रेस पसार रही एक-एक सीट के लिए क्षेत्रीय दलों के सामने हाथ, क्यों बदल गए हैं सबसे पुरानी पार्टी के हालात?

DNA TV Show: एकसमय कांग्रेस की सत्ता देश के एक छोर से दूसरे छोर तक रहती थी. क्षेत्रीय दल उसके साथ जुड़ने को लालायित रहते थे, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. कांग्रेस को एक-एक सीट मांगनी पड़ रही है. इन बदले हुए हालात का DNA चेक कर रही है ये रिपोर्ट.

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DNA TV SHOW

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DNA TV Show: एक समय था जब राष्ट्रीय पार्टी, अपने हिसाब से गठबंधन की क्षेत्रीय पार्टियों को लोकसभा सीटें दिया करती थी. ये वो समय था जब राष्ट्रीय पार्टियां बड़ा भाई हुआ करती थीं. लेकिन देश की एक राष्ट्रीय पार्टी 2024 चुनावों के लिए क्षेत्रिय पार्टियों की कृपा पर आश्रित हो गई है. हम कांग्रेस पार्टी की बात कर रहे हैं. देश की सत्ता पर लंबे समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी के हालात बदल चुके हैं. अब उसे 'नगरी नगरी द्वारे द्वारे जाकर', क्षेत्रीय पार्टियों से सीटें देने की गुजारिश करनी पड़ रही है. 

पिछले 10 वर्षों में देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के हालात बदल गए, जज्बात बदल गए हैं. अब स्थिति ये है कि कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों से लोकसभा सीटें मांगनी पड़ रही हैं. क्षेत्रीय पार्टियां अपने शर्तों पर कांग्रेस के लिए सीटें दे रही हैं. सीटों के बंटवारे का सीक्रेट फॉर्मूला कुछ भी हो, लेकिन इतना तय है कि 2024 के चुनावी मैदान में, कांग्रेस पार्टी एक छोटी और कमजोर राजनीति दल की तरह मैदान में उतर रही है. 

UPA का इंजन, INDI की कमजोर बोगी बना

कांग्रेस चाहती तो पूरे देश में अपने दम पर चुनाव लड़ सकती है या फिर ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार सकती है. लेकिन सत्ताधारी दल बीजेपी से लड़ते लड़ते, स्थिति ये आ गई है कि देश पर सबसे ज्यादा समय तक शासन चलाने वाली कांग्रेस, आज अलग-अलग राज्यों में सीटें मांगकर ले रही है. ये वही कांग्रेस पार्टी है, जिसे UPA का इंजन माना जाता था, और अन्य सहयोगी पार्टियों को उसकी बोगियां. लेकिन आज INDI गठबंधन में इंजन नहीं है, बस बोगियां ही बोगियां हैं, और कांग्रेस तो इसमें ही एक स्लीपर क्लास की बोगी बनकर रह गई है, जो क्षेत्रीय पार्टियों से भी पीछे है.

आम आदमी पार्टी के सामने भी फैलाने पड़े हैं हाथ

INDI गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस को आम आदमी पार्टी के आगे सीटों के लिए हाथ फैलाने पड़ गए हैं. आम आदमी पार्टी पहले ही पंजाब में कांग्रेस के साथ सीट शेयर करने से इनकार कर चुकी है. कांग्रेस पंजाब में उनसे सीटें नहीं मांग पाएगी. लेकिन दिल्ली की सीटों को लेकर आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के प्रति नर्म रुख अपनाया है. खबर ये आ रही है कि दिल्ली की 7 लोकसभा सीटों को लेकर सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर बात बन गई है. 

ऐसा है कांग्रेस-आप का संभावित सीट शेयरिंग फॉर्मूला

  • दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को 3 सीटें दी हैं यानी आम आदमी पार्टी 4 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.
  • साउथ दिल्ली, नॉर्थ वेस्ट दिल्ली, नई दिल्ली और वेस्ट दिल्ली में आम आदमी पार्टी अपना उम्मीदवार उतारेगी.
  • चांदनी चौक, ईस्ट दिल्ली, नॉर्थ ईस्ट दिल्ली सीट से कांग्रेस पार्टी अपना उम्मीदवार उतार सकती है.
  • सीट शेयरिंग के फॉर्मूले के तहत आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से गुजरात में दो सीटें मांगी, जो कांग्रेस ने उसे दे दी हैं.
  • गुजरात की भरूच और भावनगर लोकसभा सीट से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतर सकते हैं.
  • आम आदमी पार्टी ने पंजाब में भले ही कांग्रेस को सीट नहीं दी है, लेकिन चंडीगढ़ सीट कांग्रेस को दे दी है.
  • गोवा में आप ने साउथ गोवा की जिस सीट पर अपना उम्मीदवार घोषित किया था वो अब कांग्रेस के लिए खाली कर दी है.
  • कांग्रेस की तरफ से आम आदमी पार्टी को हरियाणा में एक सीट दी जा सकती है.

दिल्ली है कांग्रेस की ढलान का प्रतीक

कांग्रेस के लिए दिल्ली एक ऐसी नब्ज है, जो उसे पुराने सुखद दिनों की याद दिलाती है. साथ ही यह उसके ढलान का भी प्रतीक है. दरअसल दिल्ली एक ऐसा राज्य रहा है, जिस पर लंबे समय तक कांग्रेस की सत्ता रही है. अगर हम विधानसभा चुनाव की बात करें तो-

  • दिल्ली में पहली विधानसभा का गठन 1993 में हुआ था, जिसमें भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज करके सरकार बनाई थी.
  • इसके बाद वर्ष 1998, वर्ष 2003 और वर्ष 2008, में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने जीत दर्ज की.
  • इस तरह लगातार 15 वर्षों तक दिल्ली विधानसभा पर कांग्रेस का ही शासन रहा है.
  • वर्ष 2013 में हुए चुनाव में आप ने दिल्ली में सरकार बनाई, लेकिन फिर 2 वर्ष बाद दोबारा चुनाव हो गए.
  • दो साल बाद दोबारा हुए चुनाव में फिर से आम आदमी पार्टी ने वहां अपनी सरकार बनाई है. 

अगर हम पिछले 7 लोकसभा चुनावों के डेटा का विश्लेषण करें, तो इससे ये पता चलता है कि 1996 से लेकर 2019 तक हुए सात लोकसभा चुनावों में एक समय काल ऐसा रहा है, जब दिल्ली की विधानसभा और लोकसभा पर कांग्रेस का सिक्का चलता था.

  • वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 5 और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थीं.
  • इसके बाद वर्ष 1998 के चुनाव में बीजेपी को 6 और कांग्रेस को 1 सीट मिली थी.
  • वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में तो कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी और सारी सीटें बीजेपी जीती थी.
  • इसके बाद कांग्रेस ने रफ्तार पकड़ी और वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में 6 सीटें जीतीं. बीजेपी को 1 सीट मिली.
  • 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दिल्ली की सभी सात सीटें जीत गईं और भाजपा को शून्य पर रहना पड़ा था. 

आप अगर गौर करें तो देखेंगे कि 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान दिल्ली राज्य में कांग्रेस पार्टी की ही सरकार थी. इस समय शीला दीक्षित मुख्यमंत्री हुआ करती थी  यानी उनके कार्यकाल में कांग्रेस पार्टी का दिल्ली में एकछत्र राज था.

  • वर्ष 2013 में शीला दीक्षित के जाते ही कांग्रेस पार्टी के हालात बदल गए.
  • 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को दिल्लीवालों ने एक भी सीट नहीं जीतने दी.

यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी दिल्ली की सीटों के लिए आम आदमी पार्टी की दया पर निर्भर है. इसी वजह से खबर यही आई है कि कांग्रेस को 7 में से केवल 3 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कहा गया है.

उत्तर प्रदेश में भी दयनीय हैं कांग्रेस के हालात

दिल्ली की तरह ही उत्तर प्रदेश, कांग्रेस की पारंपरिक सीटों वाला राज्य है. अमेठी और रायबरेली जैसी सीटें तो गांधी-नेहरू परिवार की पारिवारिक सीट रही है. केंद्र में सत्ता हासिल करने के लिए उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना, हर पार्टी की चाहत है. कांग्रेस भी उससे अछूती नहीं है. लेकिन कांग्रेस की जो स्थिति है, उसमें, उसके लिए ज्यादा हाथ पांव मारने की जगह नहीं है. कांग्रेस जैसी पार्टी को आज के दौर में समाजवादी पार्टी जैसी क्षेत्रीय पार्टी से यूपी में सीटें मांगनी पड़ रही हैं. 

भले ही इसे सीट शेयरिंग फॉर्मूला कहा जा रहा हो, लेकिन कहीं ना कहीं, कांग्रेस पार्टी को भी पता है कि सत्ता में अगर आना है, तो यूपी में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतनी होंगी. पिछले 1 दशक में कमजोर हो चुकी कांग्रेस पार्टी के लिए क्षेत्रीय पार्टियों की छोड़ी गई सीटें चुनने के अलावा, कोई चारा नहीं है. यूपी में भी यही है. समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने हाल ही में कहा था कि जब तक कांग्रेस पार्टी के साथ सीटों को लेकर मामला सुलझ नहीं जाता तब तक वो राहुल गांधी की न्याय यात्रा में शामिल नहीं होंगे. कल इन दोनों के बीच सीट का बंटवारा हो गया.

17 सीट ही मिली हैं कांग्रेस को यूपी में

खबर है कि समाजवादी पार्टी ने यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस को मात्र 17 सीटें दी हैं. कांग्रेस को अमेठी, रायबरेली, प्रयागराज, वाराणसी, महाराजगंज, देवरिया, बांसगांव, सीतापुर, अमरोहा, बुलंदशहर, गाजियाबाद, कानपुर, झांसी, बाराबंकी, फतेहपुर सीकरी, सहारनपुर और मथुरा सीट दी गई है. इन सीटों के बंटवारे के दौरान कुछ सीटों को लेकर पेंच फंस गया था. लेकिन प्रियंका गांधी की एंट्री के बाद मामला सुलझा गया.

कई राजनीतिक विश्लेषकों को हैरानी इस बात पर है कि कांग्रेस जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी, यूपी में लोकसभा सीटों को लेकर मात्र 17 सीटें लेने पर राज़ी हो गई है. यही नहीं कांग्रेस पार्टी ने इस बार मध्यप्रदेश की खजुराहो सीट को समाजवादी पार्टी के लिए छोड़ दिया है. हालांकि मध्यप्रदेश में समाजवादी पार्टी की स्थिति बहुत खराब रही है.

पूरे उत्तर भारत में लगातार बेहाल हो रही है कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी ने हमेशा से अपना चुनावी फोकस दक्षिण भारत पर रखा है. दक्षिण से ही कांग्रेस को संजीवनी मिलती रही है. 2024 चुनावों के लिए भी कांग्रेस ने दक्षिण भारत को ही टारगेट किया है, क्योंकि 2019 के चुनावों में उत्तर भारत में कांग्रेस का जो हाल हुआ, उससे कांग्रेस ने सीख ली है. 2019 के चुनाव में अगर हम उत्तर भारतीय राज्यों की लोकसभा सीटों का विश्लेषण करें, तो पता चलता है कि- 

  • उत्तर भारत में पड़ने वाले 9 राज्यों में कांग्रेस की बुरी स्थिति रही है. 
  • 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 9 में से उत्तर भारत के 7 राज्यों में खाता भी नहीं खोल पाई थी.
  • जम्मू कश्मीर की 6 सीटों में से 5 पर उसने चुनाव लड़ा था लेकिन एक भी सीट नहीं जीती थी.
  • हिमाचल प्रदेश की कुल 4 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और यहां भी एक भी सीट नहीं जीती
  • उत्तराखंड की सभी 5 सीटों पर चुनाव लड़ा और यहां भी वही हाल हुआ था. रिजल्ट शून्य रहा था.
  • हरियाणा की सभी 10 सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था और यहां भी वही हाल था.
  • राजस्थान की कुल 25 सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था, एक भी सीट नहीं मिली.
  • दिल्ली की सभी 7 सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था, और यहां भी हाल शून्य था.
  • चंडीगढ़ सीट पर भी कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था, ये भी नहीं जीत पाए थे.
  • उत्तर प्रदेश की 80 में से 67 सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था, यहां केवल 1 सीट मिली थी.
  • पंजाब की कुल 13 सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था, यहां उन्हें 8 सीटें मिली थीं.

दक्षिण भारत को उम्मीद मानती है कांग्रेस, क्या है वहां हाल

उत्तर भारत में कांग्रेस को कुछ खास हासिल होने की उम्मीद नहीं है. उन्हें उम्मीद है दक्षिण भारत से.

  • दक्षिण भारत में 7 राज्य आते हैं. जिसमें 131 लोकसभा सीटें पड़ती हैं.
  • इनमें तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटें, केरल की 20, कर्नाटक की 28 सीट हैं.
  • आंध्रप्रदेश की 25, तेलंगाना की 17 तथा लक्षद्वीप और पुडुचेरी की 1-1 सीट भी है.
  • लक्षद्वीप-पुडुचेरी को हटा दें तो बाकी 5 दक्षिण भारतीय राज्यों की 129 सीट पर भी कांग्रेस का प्रदर्शन गिरा है.
  • वर्ष 2009 के चुनावों में कांग्रेस ने इन 129 सीट में से 60 सीटें हासिल की थीं.
  • वर्ष 2014 में कांग्रेस को इन दक्षिण भारतीय राज्यों में महज 19 सीटें ही मिली थीं.
  • वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को यहां से 27 सीटें ही हासिल हुई थीं.

समय के साथ कांग्रेस पार्टी देश के हर राज्य में दूसरे दर्जे की पार्टी बन गई है. इसलिए क्षेत्रीय पार्टियां, या फिर वो पार्टियों जिनको बने कुछ वर्ष ही हुए हैं, वो भी उन्हें अपनी सहूलियत के हिसाब से सीटें दे रही हैं और शर्तों पर कांग्रेस से उनकी सीटें ले भी रही हैं.

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