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नेपाल में प्लेन हाइजैक की पहली घटना में कैसे भारत को देखने के लिए अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की का नजरिया छिपा हुआ है? यहां समझिए हर एक बात...
'धीरे-धीरे चल चांद गगन में
कहीं ढल न जाए रात, टूट न जाएं सपने...'
10 जून, 1973 को बिराटनगर से काठमांडू के लिए जब फ्लाइट उड़ी थी तो उसमें सवार भारतीय अभिनेत्री माला सिन्हा शायद अपना यही गाना गुनगुना रही होंगी. माला सिन्हा उस दौर की कमाल की एक्ट्रेस थीं. 1959 में देवानंद के साथ उनकी फिल्म आई थी 'लव मैरिज'. इसी फिल्म का ये गाना आज भी संगीत के शौकीनों की पसंद है. फ्लाइट में माला सिन्हा के साथ पति सी पी लोहानी भी थे जो नेपाली फिल्मों के स्टार थे.
हिमालय के ऊपर जमी बर्फ और आसमान के बादलों के बीच से निकल रही फ्लाइट में वैसे तो 22 लोग सवार थे, लेकिन इनमें से तीन ऐसे थे जिनका इस यात्रा की रुमानियत से कोई वास्ता नहीं था. उनकी तो मंजिल भी काठमांडू नहीं थी. जी हां, ये तीनों प्लेन को हाइजैक करने के इरादे से इसमें सवार हुए थे. वे इसमें कामयाब भी रहे. यह नेपाल में विमान अपहरण की पहली घटना थी. इसकी कहानी जानने से पहले जान लीजिए कि इन तीन में एक दुर्गा प्रसाद सुबेदी भी थे, जो नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री चुनी गईं सुशीला कार्की के पति हैं.
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ये नाम जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि नेपाल में जेन-जी के आंदोलन और तख्तापलट को कुछ लोग राजशाही की वापसी की आहट के रूप में देख रहे हैं. वहीं, कार्की के अंतरिम प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के साथ संबंधों को लेकर भी अटकलें लग रही हैं. खासकर इसलिए भी कि आंदोलन के दौरान कुछ जगहों पर भारत-विरोधी नारेबाजी और भारतीय मीडियाकर्मियों के साथ मारपीट की कुछ घटनाएं हुई थीं.
52 साल पहले हुई प्लेन हाइजैक की इस घटना का नेपाल की मौजूदा शासन व्यवस्था या विदेश नीति से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन इसकी कहानी में शायद इन मुद्दों पर सुशीला कार्की के नजरिये के संकेत छिपे हैं.
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नेपाल एयरलाइंस की फ्लाइट नंबर डीएस 6 में 10 जून 1973 को दुर्गा प्रसाद सुबेदी के साथ बसंत भट्टराई और नागेंद्र प्रसाद डांगोल भी चढ़े थे. फ्लाइट के उड़ान भरते ही तीनों प्लेन के क्रू के पास पहुंचे. उनके हाथ में ग्रेनेड थे. उन्होंने प्लेन को भारतीय सीमा क्षेत्र में अररिया जिले की फारबिसगंज की ओर ले जाने को कहा. क्रू के सदस्यों के साथ उनकी झड़प हुई, लेकिन हथियार के दम पर वे अपनी बात मनवाने में सफल रहे. फारबिसगंज की आधी-अधूरी बनी हवाई पट्टी पर जब प्लेन उतरा तो नेपाली कांग्रेस के कुछ साथी पहले से ही वहां मौजूद थे. उन्होंने किसी भी यात्री से कुछ नहीं कहा. प्लेन में लदे तीन बक्से उतारे और उसे दोबारा उड़ान भरने की इजाजत दे दी. कोई खून-खराबा नहीं हुआ, लेकिन इस घटना से हंगामा मच गया. शांतिप्रिय देश माने जाने वाले नेपाल में प्लेन हाइजैक की घटना ही अनोखी थी, लेकिन हंगामे की असली वजह तो वो बक्से थे.
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दरअसल, उन दिनों नेपाल में राजतंत्र था, लेकिन इसके खिलाफ आंदोलन भी जोर पकड़ रहा था. नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में लोकतंत्र की स्थापना के लिए जगह-जगह विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे, लेकिन राजशाही के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए धन की जरूरत होती है. नेपाली कांग्रेस के पास इसकी निहायत कमी थी. इसीलिए, विमान अपहरण की ये योजना बनाई गई थी. अपहरण का मकसद उन बक्सों में मौजूद 32 लाख नेपाली रुपया हासिल करना था. यह धनराशि नेपाल के केंद्रीय बैंक ले जाई जा रही थी. फारबिसगंज से इन पैसों को सड़क मार्ग से पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग ले जाया गया.
हाइजैक की साजिश रचने वालों में गिरिजा प्राद कोइराला भी शामिल थे जो लोकतंत्र की स्थापना के बाद देश के प्रधानमंत्री बने. सुबेदी और अन्य साजिशकर्ता अगले एक साल में पकड़ लिए गए. वे कुछ साल जेल में रहे. फिर उन्हें रिहा कर नेपाली अधिकारियों को सुपुर्द कर दिया गया. सुबेदी फरारी के दौरान वाराणसी में रहे. पकड़े जाने के बाद उन्हें अररिया जेल में रखा गया. सुबेदी ने रिहाई के बाद एक किताब लिखी थी जिसका नाम था 'विमान विद्रोह'. इसमें उन्होंने लिखा था कि यह प्लेन हाइजैक नहीं था, बल्कि लोकतंत्र चाहने वाले नेपाली युवाओं के विद्रोह का प्रतीक था.
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सुशीला कार्की और दुर्गा प्रसाद सुबेदी की मुलाकात भी वाराणसी में ही हुई थी. कार्की तब पढ़ने के लिए वहां आई थीं. आगे चलकर उन्होंने त्रिभुवन यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की और सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश के पद तक पहुंचीं. उनके फैसलों में लोकतंत्र के समर्थन की झलक मिलती है. वे नागरिक अधिकारों की समर्थक हैं. वे गरीबों और कमजोरों के पक्ष में कानून की व्याख्या करती रही हैं. जेन-जी के आंदोलन में बिना किसी भागीदारी के देश के सर्वमान्य चेहरे के रूप में उनके चुने जाने का कारण भी यही है. इससे यह भी स्पष्ट है कि कार्की राजशाही की वापसी का जरिया नहीं हो सकतीं. जेन-जी के आंदोलन को राजशाही की साजिश बताने वाले लोगों के लिए ये स्पष्ट होना जरूरी है. राजशाही की वापसी की मांग नेपाल में पहले उठ चुकी है, लेकिन इस आंदोलन का मकसद वो नहीं है. ऐसा कहने वाले दरअसल मौजूदा व्यवस्था में मौजूद भ्रष्टाचार और कुशासन के समर्थक हैं. वो चाहते हैं कि लोगों का ध्यान मौजूदा अव्यवस्था से हटाकर राजशाही की मांग की ओर मोड़ा जाए. कार्की ने प्रधानमंत्री बनते ही स्पष्ट कर दिया कि वे इस पद पर रहने नहीं आई हैं. अगले साल 5 मार्च को चुनाव की तारीखों का भी ऐलान कर दिया गया है. कार्की लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली कराना चाहती हैं, ये साफ है. वो व्यवस्था में कितना बदलाव कर पाती हैं, ये देखने वाली बात होगी.
सुशीला कार्की का परिवार नेपाली कांग्रेस से जुड़ा रहा है. नेपाली कांग्रेस जब भी सत्ता में रही है, भारत और नेपाल के रिश्ते अच्छे रहे हैं. कार्की जीवन और लोकतंत्र के प्रति अपने नजरिया का श्रेय भी भारत में मिली शिक्षा को देती हैं. प्रधानमंत्री के रूप में भी उनके नजरिये में खास बदलाव की उम्मीद नहीं है. आंदोलन में कई तत्वों की मौजूदगी के चलते ये संभव है कि कार्की खुलकर भारत-समर्थक नीति न बनाएं, लेकिन वे किसी हाल में पूर्व पीएम केपी ओली की तरह नहीं हो सकतीं जो चीन का नाम लेकर भारत को डराने की कोशिश करते थे.
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