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Falkland Islands Controversy: फीफा वर्ल्ड कप 2026 के सेमीफाइनल में इंग्लैंड पर ऐतिहासिक जीत के बाद अर्जेंटीना के खिलाड़ी जियोवानी लो सेल्सो ने मैदान पर फॉकलैंड द्वीप का विवादित बैनर लहराकर एक नए सियासी बवाल को जन्म दे दिया है.
The Las Malvinas Controversy: फीफा वर्ल्ड कप 2026 के सेमीफाइनल में गुरुवार रात (भारतीय समयानुसार) को इंग्लैंड को 2-1 से हराने के बाद अर्जेंटीना के खिलाड़ी जोश में कुछ ऐसा कर बैठे, जिसने खेल के मैदान को सियासी अखाड़ा बना दिया. मैच जीतने की खुशी में अर्जेंटीना के मिडफील्डर जियोवानी लो सेल्सो ने एक ऐसा बैनर लहरा दिया, जिसके बाद फुटबॉल की दुनिया में बवाल मच गया है. इस बैनर पर लिखा था- "लास मालविनास सोन अर्जेंटीनास" यानी फॉकलैंड द्वीप अर्जेंटीना का है.
बात सिर्फ खिलाड़ियों तक नहीं रुकी, अर्जेंटीना की उपराष्ट्रपति विक्टोरिया वियार्रुएल ने भी सोशल मीडिया पर आग में घी डालते हुए लिख दिया कि फॉकलैंड हमारा है, इसे हम अपने खून और दिल में लेकर चलते हैं. अब फीफा इस पर कड़ा एक्शन ले सकता है, लेकिन इस खेल के पीछे जो असली झगड़ा है, वो सदियों पुराना है. आपको बताते हैं कि आखिर क्या है ये फॉकलैंड विवाद, जिसके लिए कभी दोनों देश आपस में कट मरने को तैयार हो गए थे.
आसान भाषा में कहें तो जिसे ब्रिटेन फॉकलैंड द्वीप कहता है, अर्जेंटीना उसे लास मालविनास बुलाता है. यह द्वीपों का एक समूह है, जो अर्जेंटीना के पूर्वी तट से करीब 480 किलोमीटर दूर अटलांटिक महासागर में स्थित है. भौगोलिक रूप से यह अर्जेंटीना के करीब है, लेकिन इस पर कब्जा ब्रिटेन का है. यही बात अर्जेंटीना को हमेशा खटकती है.
इस विवाद की जड़ें 19वीं सदी की शुरुआत में नेपोलियन के दौर के युद्धों से जुड़ी हैं. ब्रिटेन का दावा है कि उसने 1774 में ही इस जगह पर अपना हक जता दिया था और 1832 में वहां अपना पूरा कंट्रोल सेटअप कर लिया. दूसरी तरफ, अर्जेंटीना का मानना है कि स्पेन से आजादी मिलने के बाद विरासत में यह इलाका उसका होना चाहिए था, जिस पर अंग्रेजों ने जबरन कब्जा कर लिया. तब से दोनों देशों के बीच इस जमीन के टुकड़े को लेकर ठनी हुई है.
सालों की तनातनी के बाद यह विवाद साल 1982 में एक खूनी जंग में बदल गया. उस वक्त अर्जेंटीना में मिलिट्री का शासन था. देश के आंतरिक हालातों और जनता के गुस्से से ध्यान भटकाने के लिए वहां के सैन्य तानाशाह ने 2 अप्रैल 1982 को फॉकलैंड द्वीप पर हमला बोल दिया और उस पर कब्जा कर लिया.
अर्जेंटीना को लगा कि इतनी दूर मौजूद द्वीप के लिए ब्रिटेन शायद ही कोई बड़ा कदम उठाएगा. लेकिन अर्जेंटीना का यह अंदाजा बिल्कुल गलत साबित हुआ. ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने इसे अपनी नाक का सवाल बना लिया. उन्होंने तुरंत ब्रिटिश नौसेना और लड़ाकू विमानों को हजारों मील दूर फॉकलैंड के लिए रवाना कर दिया.
लगभग 74 दिनों तक चली इस जंग में दोनों देशों के बीच समंदर और आसमान में भीषण लड़ाई हुई. यह युद्ध 14 जून 1982 को तब खत्म हुआ जब अर्जेंटीना की सेना को ब्रिटिश फौज के सामने घुटने टेकने पड़े और सरेंडर करना पड़ा. ये जंग बेहद दर्दनाक रही, जिसमें दोनों पक्षों के कुल 900 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई. इसमें अर्जेंटीना के 649 सैनिक मारे गए, जबकि ब्रिटेन के 255 सैनिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. इसके अलावा तीन आम नागरिक भी इस युद्ध की भेंट चढ़ गए. इस हार के बाद अर्जेंटीना में सैन्य शासन ताश के पत्तों की तरह ढह गया और वहां लोकतंत्र की वापसी हुई.
भले ही युद्ध को बीते चार दशक से ज्यादा का वक्त हो चुका है, लेकिन अर्जेंटीना के लोगों के दिलों में फॉकलैंड को खोने का दर्द और ब्रिटेन के खिलाफ गुस्सा आज भी जिंदा है. यही वजह है कि जब भी खेल के मैदान पर, खासकर फुटबॉल में, ये दोनों टीमें आमने-सामने होती हैं, तो मैच सिर्फ एक खेल नहीं रह जाता, बल्कि एक जंग बन जाता है. साल 1986 के वर्ल्ड कप में डिएगो माराडोना का वो मशहूर 'हैंड ऑफ गॉड' गोल भी इसी जंग की पृष्ठभूमि के बाद आया था, जिसे अर्जेंटीना के लोगों ने अपनी हार का बदला माना था. अब 2026 में सेमीफाइनल जीतने के बाद लो सेल्सो की इस हरकत ने उस पुराने जख्म को एक बार फिर हरा कर दिया है.
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