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फ्रांस में नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के दिन ही पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई. देशभर में 250 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया.
भारत समेत दुनियाभर में पॉलिटिक्स के जानकार इस मुद्दे पर एकमत हैं कि नागरिक आंदोलन किसी भी मुल्क, चाहे वो विकसित हो या फिर विकाशील, की जड़ों में मट्ठा डालने का काम करते हैं. ये आंदोलन बदलाव से ज्यादा नुकसान लेकर आते हैं. सवाल ये है कि क्या ये बातें सही हैं या फिर कोरी लफ्फाजी? जवाब समझने के लिए हम फ्रांस का रुख कर सकते हैं. फ्रांस में राजनीतिक उथल-पुथल जारी है, प्रदर्शनकारी यथासंभव व्यवधान पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. बुधवार को पेरिस, मार्सिले और अन्य फ्रांसीसी शहरों में प्रदर्शन कर रहे हज़ारों लोगों का 80,000 पुलिस अधिकारियों से सामना हुआ.
नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के दिन ही पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई. देशभर में 250 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया गया. लेकिन ये विरोध प्रदर्शन हो क्यों रहे हैं और इनकी शुरुआत कैसे हुई?
क्या है 'ब्लॉक एवरीथिंग' आंदोलन | What is Block Everything Protest
इस प्रदर्शन के केंद्र में ब्लोक्वोंस टाउट - यानी Block Everything नाम का एक समूह है. इसका नेतृत्व सबसे पहले मई में दक्षिणपंथी समूहों ने किया था, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बाद में इसे वामपंथी और अति-वामपंथी समूहों ने भी अपना लिया है. अब देश के शक्तिशाली श्रमिक संघ इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं और यह प्रदर्शन बिना किसी स्पष्ट नेतृत्व के आगे बढ़ रहा है.
अभियान कैसे शुरू हुआ? इसके पीछे की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है और उसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. इसी साल फ्रांस में गर्मियों में ऑनलाइन अभियान शुरू हुआ था. इस अभियान में लोगों को हड़ताल करने, सड़कें जाम करने और सार्वजनिक सेवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा था. इसकी वजह देश पर बढ़ते कर्ज और 12 महीनों में चौथे प्रधानमंत्री आने की वजह से आई अस्थिरता को बताया गया.
यह विरोध प्रदर्शन सेबेस्टियन लेकोर्नू के लिए एक कठिन परीक्षा साबित हुआ है, जिन्होंने सोमवार को फ्रांस्वा बायरू की जगह ली थी.
बायरू मात्र नौ महीने पहले ही सत्ता में आए थे. उन्होंने 2026 के खर्च में €44 बिलियन (4.5 लाख करोड़ रुपये) की भारी कटौती का प्रस्ताव रखकर आक्रोश पैदा कर दिया था. इस कटौती से वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों ही गुस्से में थे.बायरू की योजना में दो सार्वजनिक अवकाशों को समाप्त करना भी शामिल था.
मितव्ययिता योजना ने सरकार में गहरे अविश्वास को जन्म दिया है, और कई लोगों ने अपनी कुंठा राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पर निकाली है, जिनकी अल्पमत सरकारें एक के बाद एक संकटों में उलझी हुई हैं, जिससे फ्रांस अस्थिरता के लंबे चक्र में फंसा हुआ है.
ब्लॉक एवरीथिंग का कोई स्पष्ट नेता न होने के कारण प्रदर्शनकारियों के इरादे अलग-अलग हैं. लेकिन कई लोगों का कहना है कि प्रदर्शनकारियों को लगता है कि राजनीतिक व्यवस्था अब अपने लक्ष्य से भटक गई है. वो संवैधानिक बदलाव की मांग कर रहे हैं. वहीं, कई लोग ऐसे हैं जो रेनेसां पार्टी के मुखिया के पद से मैक्रों के इस्तीफे और अमीरों पर अधिक कर लगाने की मांग कर रहे हैं.
क्या हो रहा है फ्रांस की सड़कों पर?
बुधवार, 10 सितंबर को हुए विरोध प्रदर्शनों ने देश के कई शहरों में उथल-पुथल मचा दी. दंगाइयों ने सड़कें जाम कर दीं और आगजनी की. इंटरनेट पर ऐसी तस्वीरें और वीडियो भी वायरल हुए जिनमें दिख रहा है कि कारों को रोकने के लिए प्रदर्शनकारी सड़कों पर कूड़ेदान को लुढ़का रहे हैं.
फ्रांस में विरोध की ये आग कैसे सब कुछ अपनी चपेट में ले रही है? यदि इस प्रश्न के जवाब तलाशने हों तो हम राजधानी पेरिस पर भी एक नजर डाल सकते हैं. बताते चलें कि पेरिस के गारे डू नॉर्ड रेलवे स्टेशन के बाहर करीब 1000 लोग इकट्ठे हुए थे, इन लोगों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस का इस्तेमाल भी किया गया. ये प्रदर्शनकारी बुधवार को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग वाले पोस्टर लेकर खड़े थे. देश के अन्य हिस्सों में मार्सिले, मोंटपेलियर, नैनटेस और ल्योन में प्रमुख सड़कों पर यातायात बाधित होने की खबरें आईं.
फ्रांस में हो रहे इस विरोध प्रदर्शन ने गृह मंत्री ब्रूनो रिटेलो को भी बगलें झांकने पर मजबूर किया है. मीडिया से बात करते हुए रिटेलो ने बताया कि प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने ब्रेटन शहर रेनेस में एक बस में आग लगा दी.
इन दंगों की तुलना मैक्रों के पहले कार्यकाल के दौरान टैक्स में बढ़ोतरी के खिलाफ़ शुरू हुए येलो वेस्ट आंदोलन से की जा रही है. इस आंदोलन में ईंधन पर लगने वाले टैक्स में बढ़ोतरी का विरोध किया गया था, इसके तहत मजदूरों ने कई ट्रांसपोर्ट सर्किलों पर प्रदर्शन किया था. जानकारों का कहना है कि अभी के दंगे येलो वेस्ट आंदोलन के मुकाबले कम तीव्र रहे हैं. इनका मकसद हर तरह का काम रोक देने का था, इससे ये चूक गए हैं.
मार्सिले में विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों ने मीडिया के सामने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि, 'गुस्सा महीनों, यहां तक कि सालों से भड़क रहा है. मैक्रों के दूसरे कार्यकाल में पांच प्रधानमंत्री आ गए और इससे कुछ भी नहीं बदला है. वहीं कहा यह भी जा रहा है कि यह प्रदर्शन देश के सभी मज़दूरों के लिए एक संदेश है- 'कोई इस्तीफा नहीं, लड़ाई जारी है'. इसके साथ ही इस सरकार के लिए एक संदेश है- 'हम पीछे नहीं हटेंगे, और अगर हमें मरना पड़ा, तो हम खड़े होकर मरेंगे.'
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