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US का मिडिल ईस्ट से सेना हटाने से साफ इनकार, नेतन्याहू भी नाराज, ईरान से डील पर फंसा पेच

अमेरिका और ईरान के बीच एमओयू डील साइन जरूर हो गई है, लेकिन इसके बाद भी कई ऐसी शर्तें और बातचीत हैं, जिस पर ईरान और अमेरिका की सहमति नहीं बन रही है. ऐसे में साफ है कि यह समझौता अभी पु​ष्ट नहीं हुआ है. 

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US का मिडिल ईस्ट से सेना हटाने से साफ इनकार, नेतन्याहू भी नाराज, ईरान से डील पर फंसा पेच

us iran mou agreement

(Credit Image AI)

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.यूएस ईरान के बीच साइन हुआ एमओयू, लेकिन दरार बाकी
.यूएस और ईरान के बीच कई मांग और शर्तों को लेकर पेच फंसा हुआ है
.अमेरिका ने पूरा समझौता न होने तक मिडिल ईस्ट से अपनी सेना हटाने से साफ इनकार कर दिया है
.नेतन्याहू ने भी ईरान के प्रति नाराजगी जाहिर की है. अमेरिका इसके समर्थन में है.

अमेरिका और ईरान के बीच एमओयू डील साइन हो गई है. इस पर अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद गालिबाफ ने साइन कर दिये हैं, लेकिन अभी अमेरिकी शर्तें और नेतन्याहू की नाराजगी इस पर पेच फंसा सकती है. दोनों देशों के बीच कुछ बातों को लेकर अब भी तकरार बनी हुई है, जहां एक तरफ ईरान ने आर्थिक प्रतिबंधों से राहत मांगी है, तो वहीं... अमेरिका ने इस पर थोड़ी भी ढील देने से साफ इनकार कर दिया है. ट्रंप ने साफ कहा कि ईरान से तब प्रतिबंध नहीं हटाये जाएंगे, जब तक वह हमारे हिसाब से नहीं चलता. इसमें अमेरिकी अधिकारियों से भी कुछ शर्तें रख दी हैं. साथ ही नेतन्याहू ने भी नाराजगी जताई है. आइए जानते हैं वो बातें जिन पर फंस रहा अमेरिका और ईरान के सहमति पर पेच...

लेबनान से नहीं हटेगी हमारी सेनाएं

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान से डील के बाद पहली प्रेस वार्ता की. इसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा ईरान परमाणु हथियार हासिल नहीं कर सकता. हम उसे ऐसा करने नहीं देंगे. साथ ही लेबनान में हमने अपना बफर जोन बनाया है, जहां पर हमारी सेना तैनात है. युद्ध समाप्ति और सहमति के बाद भी हमारी सेना वहां तैनात रहेगी. उसे हटाने का फैसला हम अपने हिसाब से करेंगे. 

रॉयटर्स के अनुसार, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के अधिकारियों से पूछा गया कि ईरान और अमेरिका में सहमति के लिए अमेरिका की क्या इच्छा है, अमेरिका क्या चाहता है. इस पर अमेर‍िकी अध‍िकारी ने कहा कि न्यूक्लियर प्रोजेक्ट बेहद अहम है. इसके लिए उन्हें वादा करना होगा कि वे दोबारा इस पर काम शुरू नहीं करेंगे. इसके साथ ही प्रतिबंधों में ढील समय के साथ दी जाएगी. उनके व्यवहार को देखकर दी जाएगी. शुरुआत में हम प्रतिबंधों को हटाने के लिए धीरे धीरे कदम बढ़ाएंगे. अगर वे भी हमारी तरफ पहल करते हैं तो हम अपने वादों को पूरा करने के लिए तैयार हैं, लेकिन हमारी पहल का हमें कोई इनपुट नहीं आता दिखेगा तो हम तुरंत कार्रवाई करेंगे. 

25 अरब डॉलर की मांग 

अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ईरान की 25 अरब डॉलर देने पर सहमति दी है, लेकिन ईरान को पैसा तभी जारी किया जाएगा, जब ईरान शांति समझौते के तहत शर्तों को पूरा करेगा. फंड जारी उसी स्थिति में होगा. 

मिडिल-ईस्ट में तैनात रहेगी अमेरिकी सेना

द गार्जियन के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि मिडिल ईस्ट में बातचीत और समझौता पूरी तरह से पूरा न होने तक अमेरिकी सेना मिडिल-ईस्ट में तैनात रहेगी. फरवरी में युद्ध के शुरू होने के बाद से ही अमेरिका ने इस इलाके में भारी संख्या में सेना तैनात की है. उन्हें वापस बुलाया जाएगा, लेकिन समझौता न होन तक ऐसा नहीं किया जा सकता. ईरानी अपनी बात पर अमल करेगा और समझौता पूर्ण होगा, तब हमारी सेना वहां से हट जाएगी. 

हिजबुल्लाह ने किया हमला तो इजरायल को बचाव का अधिकार

वहीं, अमेरिकी अधिकारी ने अपनी शर्तों में यह भी शामिल किया, जब हमारी ईरान के साथ सीजफायर डील हुई थी, जब उसमें लेबनान का जिक्र नहीं किया गया था. लेबनान और इजरायल की बातचीत चल रही है. ऐसे में अगर ईरान हिजबुल्लाह को कंट्रोल करने में असमर्थ रहता है. ​हिजबुल्लाह की तरफ से इजरायल पर कोई भी हमला किया जाता है तो इजरायल जवाबी कार्रवाई करेगा. उसे ऐसा करने का पूरा अधिकार होगा. 

ओमान को बातचीत से किया बाहर

अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता में भूमिका निभा रहे, ओमान को अमेरिका ने बातचीत से बाहर कर दिया है. अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ईरान के साथ बातचीत में ओमान डबल स्टैंडर्ड गेम कर रहा था. वह एक तरफा बातें कर रह था. वह लगातार ऐसी बातें कर रहा था, जो अमेरिका को पसंद नहीं है. इसके साथ ही ईरान के कर्मचारी की तरह सिर्फ उनकी बातों को ही रख रहा था. हमारी बातों को वह समझ नहीं पा रहा था. इसलिए उसे बातचीत से बाहर कर दिया.

यूएन की मंजूरी चाहता है ईरान

ईरान अमेरिका के साथ हो रही डील पर यूएन की मंजूरी चाहता है. इसके पीछे की वजह यह है कि किसी भी बातचीत में एक बार को कोई भी देश हस्ताक्षर के बाद भी पीछे हट सकता है, लेकिन यूएन की मौजूदगी और पुष्टि के बाद पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं होती. यूएन के सामने समझौते की पुष्टि होने के बाद उसे नहीं मानने वाले को जुर्माना तक भरना पड़ता है. 

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