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भारत पर भी पड़ सकता है 100% टैरिफ का असर, रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ अमेरिका लाएगा बिल

रूस से तेल का इंपोर्ट भारत चीन समेत यूरोप के कई देश कर रहे हैं, लेकिन ट्रंप सरकार यूरोप को टैरिफ से बचाकर अन्य देशों पर टैरिफ लगाने का प्रयास कर रही है. हालांकि इस पर अभी अमेरिकी संसद में बहस जारी है.

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भारत पर भी पड़ सकता है 100% टैरिफ का असर, रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ अमेरिका लाएगा बिल

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अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर भारत और रूस के व्यापारिक रिश्तों को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है. अमेरिकी संसद हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में चल रही बहसों के बीच एक नया संशोधन पेश किया गया है, जिसमें भारत का नाम सीधे तौर पर घसीटने की कोशिश की गई है. अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो भारत समेत उन चुनिंदा देशों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जो रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहे हैं.

सीनेट के सामान्य इशारे से आगे बढ़कर अब सीधे नाम पर क्यों आया मामला

बीते अगस्त महीने में अमेरिकी सीनेट ने 'सेंशनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' को भारी बहुमत से पास किया था. इस दौरान बिल के मूल प्रारूप में किसी भी देश का नाम सीधे तौर पर नहीं लिखा गया था, बल्कि यह प्रावधान किया गया था कि जो पांच देश सबसे ज्यादा तेल और गैस खरीदते हैं, उन पर यह नियम लागू होगा, लेकिन अब अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेटिक सांसद स्टेनी हॉयर ने एक कदम आगे बढ़कर संशोधन पेश किया है. इस नये संशोधन में चीन, भारत, तुर्की, और यूएई जैसे देशों के नाम सीधे तौर पर जोड़कर उन्हें 100 प्रतिशत तक सेकेंडरी टैरिफ के दायरे में लाने की मांग की गई है. अमेरिकी संसद का यह रुख संकेत देता है कि रूस पर आर्थिक शिकंजा कसने के लिए वाशिंगटन अब व्यापारिक साझेदारों पर सीधा दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है.

टैरिफ अधिकारों पर क्यों बंटे हैं सांसद

यह पूरा बिल जितना रूस के खिलाफ है, उतना ही अमेरिकी संसद के भीतर आंतरिक खींचतान का भी केंद्र बन गया है, जहां एक तरफ कुछ सांसद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह विशेष अधिकार देना चाहते हैं कि वे रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी-भरकम टैरिफ थोप सकें, वहीं दूसरी तरफ इसका विरोध भी शुरू हो गया है. डेमोक्रेटिक सांसद ग्रेगरी मीक्स ने बिल के उस प्रावधान (सेक्शन 113) को पूरी तरह हटाने का प्रस्ताव रख दिया है, जिसके जरिए राष्ट्रपति को यह असीमित टैरिफ शक्ति मिलने वाली थी. एक्सपर्ट्स की मानें तो अमेरिकी संसद में खुद इस बात को लेकर एकमत नहीं है कि दूसरे देशों के व्यापार पर इस तरह का भारी टैक्स लादना अमेरिकी अर्थव्यवस्था या वैश्विक बाजार के लिए कितना सही होगा.

क्या वाकई भारत के लिए यह कोई आपदा है

वैश्विक व्यापार विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के प्रस्तावों के कानूनी और व्यावहारिक रास्ते में कई अड़चने हैं. इस तरह के प्रतिबंधात्मक बिल लंबे समय तक कागजों या बहसों में अटके रहते हैं. इसके अलावा, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों ने भी राष्ट्रपति के असीमित टैरिफ अधिकारों पर कुछ कानूनी लगाम भी लगाई है.भारत के नजरिए से देखें तो रूस से कच्चा तेल इंपोर्ट करना देश की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें स्थिर रखने के लिए एक रणनीतिक जरूरत रहा है. वैश्विक बाजार में अगर अचानक रूसी तेल की सप्लाई बाधित होती है, तो पूरी दुनिया में कच्चे तेल के दाम आसमान छू सकते हैं, जिससे अमेरिका खुद भी अछूता नहीं रहेगा. यही वजह है कि अमेरिकी संसद के भीतर ही इस कड़े प्रावधान को लेकर विरोध और संशय बना हुआ है.

यूरोप को छूट और भारत पर निशाना क्यों

अमेरिका द्वारा लाये गये इन प्रतिबंधों में यूरोपीय देशों के लिए ट्रंप नरम रुख अपना रहे हैं. बिल में उन कई यूरोपीय देशों को बाहर रखा गया है, जो किसी न किसी रूप में रूसी गैस या ऊर्जा का इंपोर्ट जारी रखे हुये हैं. एक्सपर्ट्स की मानें तो यह कुछ देशों को सिलेक्ट कर प्रतिबंध लगाने वाला रवैया साफ करता है कि अमेरिकी  यह सिर्फ दबाव बनाने के लिए कर रहा है. इसे लागू करना इतना आसान नहीं है, जितना लग रहा है. वहीं हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में इन संशोधनों पर क्या अंतिम मुहर लगेगी और कौन सा प्रस्ताव टिक पाएगा. यह आने वाले दिनों की राजनीतिक उठापटक पर निर्भर करेगा. 

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