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यूक्रेन ने रूस के खिलाफ युद्ध में सोवियत दौर की 50 साल पुरानी R-60 एयर-टू-एयर मिसाइल को फिर से तैनात कर दिया है.
रूस के खिलाफ जारी जंग में यूक्रेन ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरी दुनिया के सैन्य विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है. यूक्रेन की वायु सेना अब रूसी ड्रोन्स और मिसाइलों को मार गिराने के लिए 1970 के दशक की सोवियत काल वाली R-60 मिसाइल का इस्तेमाल कर रही है. जिस मिसाइल को सालों पहले आउटडेटेड मानकर रिटायर करने की तैयारी थी, आखिर यूक्रेन उसे दोबारा जंग के मैदान में क्यों लेकर आया है?
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को अब कई साल हो चुके हैं. इस लंबी जंग में यूक्रेन के आधुनिक एयर डिफेंस हथियारों का स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है. यूक्रेन आमतौर पर हवा में रूसी खतरों को खत्म करने के लिए R-73 जैसी आधुनिक मिसाइलों का इस्तेमाल करता रहा है. हालांकि, लगातार हो रहे हमलों के कारण R-73 की कमी हो गई है.
इसके अलावा, यूक्रेन को अपने पश्चिमी देशों से मिले F-16 लड़ाकू विमानों की मिसाइलों (जैसे AIM-9 और AIM-120) को भी बचाकर रखना पड़ रहा है. ऐसे में यूक्रेन ने अपने पुराने सोवियत हथियारों के जखीरे की तरफ रुख किया और 1970 के दशक में तैयार की गई R-60 मिसाइलों को दोबारा तैनात कर दिया.
हाल ही में जारी एक वीडियो में देखा गया कि यूक्रेन के एक MiG-29MU1 फाइटर जेट ने बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान भरते हुए रूस की नई जेट-संचालित क्रूज मिसाइल 'S8000 बांदेरोल' पर R-60 मिसाइल दागी और उसे हवा में ही तबाह कर दिया.
R-60 को सोवियत संघ ने 1973 के आसपास अपनी सेना में शामिल किया था. यह एक छोटी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल है, जो इंफ्रारेड गाइडेंस सिस्टम पर काम करती है.
यह मिसाइल दुश्मन के विमान या ड्रोन के इंजन से निकलने वाली गर्मी को पहचानकर उस पर हमला करती है. हवाई मुठभेड़ के लिए बनाई गई यह मिसाइल आकार में छोटी और वजन में हल्की है, जिससे यह तेजी से अपना रास्ता बदल सकती है.
हालांकि यह आज के आधुनिक फाइटर जेट्स के खिलाफ थोड़ी पुरानी पड़ सकती है, लेकिन रूस के छोटे और मध्यम रफ्तार वाले ड्रोन्स और जेट-संचालित क्रूज मिसाइलों के लिए यह आज भी बेहद घातक साबित हो रही है.
यूक्रेन के लिए यह कदम उठाना इसलिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि रूस अब पहले से कहीं ज्यादा तेज रफ्तार वाले ड्रोन्स तैनात कर रहा है. रूस अब गेरान-3, गेरान-4, गेरान-5 और बांदेरोल जैसी मिसाइलों और ड्रोन्स का इस्तेमाल कर रहा है, जिनकी रफ्तार 500 से 700 किमी प्रति घंटा तक होती है.
शुरुआती दौर में धीमी गति से उड़ने वाले ड्रोन्स को जमीन से मार गिराना आसान था, लेकिन अब इनकी रफ्तार बढ़ने से ग्राउंड-बेस्ड एयर डिफेंस का इंटरसेप्शन रेट गिरकर 50 से 60 फीसदी पर आ गया है. इस वजह से यूक्रेन को अपने फाइटर जेट्स को हवा में उतारना पड़ रहा है. F-16 और MiG-29 के कीमती आधुनिक हथियारों को बचाने के लिए R-60 मिसाइल सबसे मुफीद और किफायती विकल्प बनकर उभरी है.
यूक्रेन सिर्फ पुरानी मिसाइल का इस्तेमाल ही नहीं कर रहा, बल्कि इसे नए जमाने के हिसाब से अपग्रेड भी कर रहा है. रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, यूक्रेन एक विशेष कार्यक्रम के तहत R-60 मिसाइलों के पुराने एनालॉग सिस्टम को हटाकर आधुनिक डिजिटल तकनीक लगा रहा है. इससे मिसाइल के इंफ्रारेड सीकर की क्षमता में सुधार हुआ है, जिससे यह जमीन के शोर-शराबे और गर्मी के बीच भी दुश्मन के ड्रोन को आसानी से खोज लेती है.
अगर R-60 जैसी मिसाइलें भी खत्म हो जाती हैं, तो यूक्रेनी पायलटों को फाइटर जेट्स में लगी गन से ड्रोन्स को निशाना बनाना पड़ेगा, जो कि बेहद जोखिम भरा काम है. ऐसे में 1970 के दशक की R-60 मिसाइल को नया जीवन देना यूक्रेन के लिए एक मास्टरस्ट्रोक और मजबूरी का बेहतरीन हल साबित हो रहा है.