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पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में हालात बेहद बेकाबू हो गए हैं, जहां एक प्रदर्शनकारी की शोकसभा में जुटी भीड़ पर सुरक्षा बलों की ताबड़तोड़ फायरिंग में 27 लोगों की मौत हो गई और 200 से अधिक लोग घायल हो गए.
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) इस समय बेहद गंभीर राजनीतिक और मानवीय संकट से गुजर रहा है. रावलकोट इलाके में एक प्रदर्शनकारी की शोकसभा के दौरान भड़की हिंसा ने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया है. जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का आरोप है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने शांतिपूर्ण तरीके से एकत्रित हुए नागरिकों पर ताबड़तोड़ गोलीबारी की. इस सीधी सैन्य कार्रवाई में अब तक 27 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं.
इसके अलावा, 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है और कई लोग लापता बताए जा रहे हैं. यह हिंसक मोड़ उस समय आया जब लोग शाहजैब हबीब नाम के एक प्रदर्शनकारी के अंतिम संस्कार और शोकसभा में शामिल होने पहुंचे थे. JAAC के अनुसार, शाहजैब की मौत भी पहले रेंजर्स की गोलीबारी में ही हुई थी.
JAAC के वरिष्ठ नेता शौकत नवाज मीर ने पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं. उनका दावा है कि सेना और अर्धसैनिक बलों को अवामी एक्शन कमेटी के सदस्यों को देखते ही गोली मारने के सीधे आदेश दिए गए हैं. मीर का कहना है कि पाकिस्तानी हुकूमत आम नागरिकों और कश्मीरी जनता की आवाज को बंदूक की नोक पर दबाना चाहती है. हालांकि, इन गंभीर आरोपों पर अभी तक पाकिस्तान सरकार या सैन्य मुख्यालय की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.
इस मौजूदा अशांति की मुख्य जड़ पिछले साल अक्टूबर 2025 में हुआ तथाकथित मुजफ्फराबाद समझौता है. यह समझौता लंबे समय तक चले हिंसक आंदोलनों और गहरे आर्थिक संकट के बाद पाकिस्तान सरकार, स्थानीय PoK प्रशासन और JAAC के बीच हुआ था. उस समय सरकार ने जनता के आक्रोश को शांत करने के लिए कई वादे किए थे, जिनमें प्रमुख थे- गेहूं, आटे और बिजली पर स्थायी सब्सिडी देना, पूर्व के आंदोलनों में मारे गए लोगों के परिवारों को उचित मुआवजा, बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, स्थानीय लोगों के राजनीतिक व प्रशासनिक अधिकारों को मजबूत करना.
JAAC का आरोप है कि मुजफ्फराबाद समझौते के इतने महीनों बाद भी अधिकांश वादे सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए. सुधारों और आर्थिक राहत के नाम पर जनता को केवल आंशिक रियायतें या कोरे आश्वासन मिले. सरकार की इसी टालमटोल नीति के खिलाफ JAAC ने 9 जून से पूरे क्षेत्र में पूर्ण बंद और नए सिरे से आंदोलन का बिगुल फूंका. दूसरी ओर, सरकारी अधिकारियों का दावा है कि वे अधिकांश मांगें मान चुके हैं, लेकिन विधानसभा सीटों के आरक्षण और दीर्घकालिक सब्सिडी जैसे जटिल मुद्दों पर अभी भी गतिरोध बरकरार है.
इस दमन चक्र के खिलाफ PoK की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. इंटरनेट पर वायरल हो रहे एक वीडियो में एक कश्मीरी लड़की भावुक होकर पूछती है, "हमने सरकार से अपने हक का गेहूं और बिजली मांगी थी, लेकिन बदले में हमें गोलियां दी जा रही हैं. क्या यही आपकी लोकतांत्रिक व्यवस्था है?"
वहीं, आंदोलन के एक अन्य प्रमुख चेहरे साकिब इलयासी ने बेहद आक्रोश में कहा कि पाकिस्तान ने जो परमाणु बम भारत के डर से बनाया था, यदि वह अपने ही नागरिकों को अधिकार नहीं दे सकता, तो वही बम PoK की जनता पर गिराकर उन्हें खत्म कर दे. रोज-रोज के अपमान और दमन से मौत बेहतर है.
यह आंदोलन अब केवल सब्सिडी या आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पाकिस्तान के शासन तंत्र, संसाधनों के शोषण और स्थानीय स्वायत्तता के खिलाफ एक बड़े विद्रोह का रूप ले चुका है. अगर इस्लामाबाद ने तुरंत दमनकारी नीति छोड़कर सार्थक बातचीत का रास्ता नहीं चुना, तो आने वाले दिनों में यह अशांति पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले सकती है.