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पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से अच्छे संबंध रहे हैं. ध्यान रहे कि शिया मुल्क ईरान से सऊदी अरब को खतरा होने पर पाकिस्तान ने मक्का और मदीना जैसे पवित्र स्थलों की रक्षा करने की इच्छा जताई थी.
पूरा विश्व तमाम तरह के बड़े बदलावों का गवाह बन रहा है. सवाल होगा कैसे? तो जवाब के लिए हमें उन इवेंट्स का अवलोकन करना चाहिए जिन्होंने अभी बीते दिनों मेन स्ट्रीम मीडिया के अलावा सोशल मीडिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा. ध्यान रहे पिछले हफ्ते ब्रिटेन और अमेरिका जब अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा के भव्य समारोह और राजनयिक गतिविधियों में व्यस्त थे, तब एक और घटना घटी जिसे पश्चिमी देशों और उनकी राजधानियों ने लगभग अनदेखा किया बावजूद इसके कि यह घटना जियो पॉलिटिक्स पर गहरा असर डाल सकती है.
बता दें कि 17 सितंबर को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 'स्ट्रेटेजिक म्यूच्यूअल डिफेंस एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर किए. ममले में दिलचस्प ये कि इसे 'इस्लामिक नाटो' के रूप में देखा जा रहा है, और इसका मुख्य बिंदु यह है कि 'किसी भी देश पर कोई भी हमला, दोनों देशों पर हमला माना जाएगा'.
बता दें कि नाटो का अनुच्छेद 5 भी यही कहता है, और यह सामूहिक रक्षा का मूल सिद्धांत है जो गठबंधन के सदस्यों को बांधता है. अगर किसी सहयोगी देश पर हमला होता है, तो सभी सदस्य इसे अपने ऊपर हमला समझेंगे और मदद के लिए कार्रवाई करेंगे. पुतिन के यूक्रेन पर हमले के बाद से इस प्रावधान का अक्सर जिक्र किया गया है.
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से अच्छे संबंध रहे हैं. ध्यान रहे कि शिया मुल्क ईरान से सऊदी अरब को खतरा होने पर पाकिस्तान ने मक्का और मदीना जैसे पवित्र स्थलों की रक्षा करने की इच्छा जताई थी. सुन्नी सऊदी अरब, जिसे इस्लामिक दुनिया का केंद्र माना जाता है, और पाकिस्तान, जो एकमात्र मुस्लिम परमाणु शक्ति वाला देश है, के बीच यह नया समझौता एक नया माहौल बनाएगा.
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि, 'परमाणु हथियारों से हमें जो सुरक्षा मिलती है, और हमारे पास जो क्षमता है, वह इस समझौते के अनुसार सऊदी अरब को उपलब्ध कराई जाएगी.' पाकिस्तान ने यह भी नहीं कहा कि अन्य इस्लामिक देश इस गठबंधन में शामिल नहीं हो सकते. उप प्रधानमंत्री इशाक दार ने कहा, 'अन्य देशों ने भी इसी तरह के समझौते की इच्छा जताई है.'
यह समझौता एक ऐसे समय में हुआ है, जब एक हफ़्ते पहले इज़राइल ने कतर की सरकारी इमारत में अमेरिकी संघर्ष विराम प्रस्ताव पर चर्चा कर रहे हमास के अधिकारियों पर हवाई हमला किया था. दोहा में हुआ यह अभूतपूर्व हमला अमीर अरब और खाड़ी देशों के लिए इस क्षेत्र में अमेरिका पर भरोसे के भ्रम को तोड़कर रख दिया है. ईरान, लेबनान, यमन, सीरिया और कतर में इज़राइल के खतरनाक सैन्य हमलों ने इन देशों में अपने खुद के सुरक्षात्मक परमाणु हथियार बनाने की सोच को बल दिया है.
भारत को आहत करता नजर आ रहा है समझौता
आर्थिक तंगी, राजनीतिक अस्थिरता और अर्ध-सैन्य स्थिति वाला पाकिस्तान, जो अपने हथियार साझा करने को तैयार है, दोनों देशों के लिए फायदेमंद है. यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ी सफलता है क्योंकि सऊदी अरब जैसे सहयोगी देश के कारण उसकी इस्लामिक दुनिया में अहमियत बढ़ गई है और उसके और भी समर्थक बनने की संभावना है.
इससे परमाणु प्रतिद्वंद्वी भारत को भी एक बड़ा राजनयिक और सुरक्षा झटका लगा है, जिसके साथ पाकिस्तान कई युद्ध और झड़पें कर चुका है.
पिछले कुछ सालों में सऊदी अरब, खाड़ी देशों और भारत के संबंधों में काफी सुधार हुआ है. लेकिन चिंता यह है कि अगर भारत से कोई विवाद होता है तो क्या यह समझौता इन देशों को स्वचालित रूप से पाकिस्तान के पक्ष में ले आएगा?
मई में दोनों देशों के बीच हिंसक झड़प के बाद, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि, 'हमने फिलहाल पाकिस्तान के आतंकवादी और सैन्य ठिकानों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई को सिर्फ़ स्थगित किया है.'
भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि वह 'राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय व वैश्विक स्थिरता पर इसके असर का अध्ययन करेगा.' मंत्रालय ने आगे कहा, 'भारत और सऊदी अरब के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी है, जो पिछले कुछ सालों में काफी मजबूत हुई है. हमें उम्मीद है कि यह रणनीतिक साझेदारी आपसी हितों और संवेदनशीलताओं का ध्यान रखेगी.'
हालांकि, भारतीय प्रशासन में चिंता और परेशानी होगी क्योंकि उसके दुश्मन ने एक ऐसा दरवाज़ा खोल दिया है, जिसके बारे में उन्हें उम्मीद है कि वह खाई में न बदल जाए. भारतीय लोग उम्मीद करेंगे कि यह समझौता सिर्फ़ राजनीतिक एकजुटता तक ही रहे और बिना शर्त युद्ध की गारंटी में न बदल जाए. ध्यान रहे कि मौजूदा वक़्त में भारत की विदेश नीति के सामने बहुत बड़ी चुनौतियां हैं, राष्ट्रपति ट्रंप ने रूसी तेल रियायत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का दंड दिया है, जिससे कुल टैरिफ 50% हो गया है, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा है. चीन के साथ संबंध भी पिछले कुछ सालों में बहुत मुश्किल रहे हैं, जबकि पाकिस्तान और चीन के संबंध एक मजबूत दोस्ती में बदल गए हैं.
साउदी-पाकिस्तान डील का मकसद खतरों, आतंकवाद और सीमा पार विद्रोह से निपटने के लिए सैन्य सहयोग, संयुक्त अभ्यास और खुफिया जानकारी साझा करना है. इसमें दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी का आदान-प्रदान और सैन्य उपकरणों का संयुक्त उत्पादन भी शामिल है. यह समझौता मध्य-पूर्व की स्थिति बदल सकता है, क्योंकि पाकिस्तान के 170 वॉरहेड सऊदी अरब को एक ऐसा हथियार देते हैं जो भविष्य में अन्य देशों तक भी फैल सकता है. कह सकते हैं कि यह एक इस्लामिक नाटो है, जो मौजूदा जियो ;पॉलिटिक्स को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखता है.
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