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मुस्लिम देशों के इस संगठन का नया सदस्य अफ्रीका का सबसे पावरफुल माने जाने वाला देश मिस्र हो सकता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि मिडिल ईस्ट के देश कतर, कुवैत, जॉर्डन, अजरबैजान और सीरिया भी इसमें शामिल होने के लिए आतुर दिखाई दे रहे हैं.
पाकिस्तान और सऊदी वाले डिफेंस पैक्ट में अब तुर्किए भी शामिल हो गया है. हाल ही में सऊदी में मीटिंग के बाद तीनों देशों ने इस 'मक्का पैक्ट' पर हस्ताक्षर किए हैं. अब ये तीनों मुस्लिम देश चाहते हैं कि इस संगठन का विस्तार हो. तुर्किए ने क्लीयर कर दिया है कि अभी तो बस शुरुआत है. इस समझौते में और भी इस्लामी देश शामिल होंगे. NATO के अनुच्छेद 5 की तरह, मक्का पैक्ट में भी किसी एक देश पर अटैक तीनों पर हमला माना जाएगा. अब सवाल ये उठता है कि आखिर इस संगठन में शामिल होने वाला नया देश कौन-सा होगा?
ऐसी चर्चा है कि मुस्लिम देशों के इस संगठन का नया सदस्य अफ्रीका का सबसे पावरफुल माने जाने वाला देश मिस्र हो सकता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि मिडिल ईस्ट के देश कतर, कुवैत, जॉर्डन, अजरबैजान और सीरिया भी इसमें शामिल होने के लिए आतुर दिखाई दे रहे हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसकी वजह ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा युद्ध है, जिसमें तेहरान ने इन देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर अपनी मिसाइलों और ड्रोन से अटैक किया. इन देशों को अब लगने लगा है कि अमेरिका उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाता है. अब तक अमेरिका इन देशों को सुरक्षा की गारंटी देता रहा है, लेकिन ईरान युद्ध ने इसकी हकीकत को सामने ला दिया है.
मुस्लिम नाटो का विस्तार क्यों?
इन मुस्लिम देशों के गठबंधन के विस्तार की वजह भी एक्सपर्ट्स ने बताई है. उन्होंने कहा कि ये सुरक्षा समझौता ईरान युद्ध, अमेरिकी सुरक्षा गारंटी को लेकर अनिश्चितता, ईरान का युद्ध में प्रदर्शन और क्षेत्रीय शक्तियों की बाहरी ताकतों पर कम निर्भर रहने की इच्छा इसके विस्तार की वजह है. इसके तीनों ही संस्थापक देश इस बात पर जोर देते हैं कि यह एक रक्षात्मक व्यवस्था है, न कि ईरान विरोधी गठबंधन या नाटो का विकल्प. इसके शुरुआती दिनों में ही इस संगठन के टारगेट काफी बड़े दिखाई दे रहे हैं. एक्सपर्ट्स का ये भी मानना है कि यह दशकों में मुस्लिम शक्तियों के नेतृत्व में क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा बनाने का पहला प्रयास है.
मक्का समझौते में अगला देश कौन होगा शामिल?
तुर्किए मक्का समझौते को लेकर अपनी महत्वाकांक्षा स्पष्ट कर चुका है. तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने राष्ट्रपति एर्दोगन का हवाला देते हुए कहा कि यह गठबंधन तीन देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्होंने कहा, 'हमें इसका विस्तार करना चाहिए और अगर जरूरत हो तो सभी देशों को इसके दायरे में लाना चाहिए.' फिलहाल मिस्र ही ऐसा देश है, जिसे इन तीनों में से किसी देश ने सार्वजनिक रूप से अगले सदस्य के रूप में पहचाना है.
फिदान ने काहिरा को स्वाभाविक साझेदार बताते हुए कहा कि उसके गठबंधन में शामिल होने के लिए सिर्फ तकनीकी मुद्दे ही बाकी हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि तीनों देश मिस्र को गठबंधन में चाहते हैं क्योंकि उसके शामिल होने से इसका राजनीतिक और सैन्य प्रभाव काफी बढ़ जाएगा. हालांकि काहिरा मक्का पैक्ट की शर्तों को स्वीकार करने के बारे में सतर्क है क्योंकि अमेरिका के साथ उसके मौजूदा संबंध प्रभावित हो सकते हैं. मिस्र अफ्रीका की सबसे मजबूत और दुनिया की 19वीं सबसे ताकतवर सेना रखता है. उसके पास 4.4 लाख सक्रिय सैनिक हैं. इसके अलावा हजारों टैंक, वायुसेना और नौसेनिक बेड़ा भी ताकतवर है.
मिस्र के अलावा और कौन-कौन हो सकते हैं शामिल?
मिस्र के अलावा, कतर और कुवैत को खाड़ी देशों में सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है. कतर के पूर्व प्रधानमंत्री शेख हमद बिन जसीम अल थानी ने X पर एक पोस्ट में उम्मीद जताई कि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सभी सदस्य आखिरकार मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में शामिल हो जाएंगे. GCC छह देशों का एक राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा समूह है, जिसमें सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान शामिल हैं. कतर यूनिवर्सिटी के अली बकिर ने यह भी सुझाव दिया है कि जॉर्डन, अजरबैजान और सीरिया भी इस गठबंधन में शामिल हो सकते हैं.
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