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असीम मुनीर के हाथ में सारी ताकत, फिर भी क्यों क्यों डूब रहा पाकिस्तान? जानें वजह

क्या असीम मुनीर की बढ़ती ताकत पाकिस्तान के आर्थिक और आंतरिक संकट को छिपा पाएगी? जानिए देश की बुनियादी कमजोरियों और रिपोर्ट के बड़े खुलासे.

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असीम मुनीर के हाथ में सारी ताकत, फिर भी क्यों क्यों डूब रहा पाकिस्तान? जानें वजह

असीम मुनीर की बढ़ती ताकत के बीच क्यों डूब रहा पाकिस्तान, X and AI Photo

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  • असीम मुनीर की बढ़ती ताकत के बाद भी कंगाली की तरफ जा रहा पाकिस्तान.
  • देश में स्थिरता की एक नकली छवि दिखाने के दमनकारी उपायों का सहारा लिया जा रहा.
  • इमरान खान जेल में बंद होने के बावजूद देश की राजनीति में अपना गहरा प्रभाव बनाए है.

Pakistan Economic Crisis: पाकिस्तान इस समय एक बेहद अजीब और गंभीर स्थिति से गुजर रहा है. पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की जहां ताकत बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. 'वन वर्ल्ड आउटलुक' की एक हालिया रिपोर्ट ने पाकिस्तान के इस अंतर्विरोध को पूरी दुनिया के सामने ला दिया है. रिपोर्ट का साफ कहना है कि जनरल मुनीर को मिलने वाला बाहरी समर्थन पाकिस्तान की अंदरूनी कमजोरियों को लंबे समय तक नहीं छिपा सकता.

क्यों चर्चा में है असीम मुनीर?

पाकिस्तान की राजनीति और सत्ता में वहां की सेना का दखल हमेशा से चला आ रहा है, लेकिन मौजूदा समय में यह प्रभाव इतना बढ़ चुका है कि अब देश की नागरिक सरकार केवल नाम की रह गई है. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर जितने अधिक व्यक्तिगत रूप से शक्तिशाली होते जा रहे हैं, देश की हर सफलता और असफलता उतनी ही ज्यादा सीधे उनके नेतृत्व से जुड़ती जा रही है.

पहले के समय में देश की बदहाली के लिए अक्सर नागरिक प्रशासन या चुनी हुई सरकारों को दोषी ठहराकर सेना खुद को बचा लेती थी. लेकिन अब ऐसा करना मुमकिन नहीं लग रहा है. 

पाकिस्तान में सेना के भीतर क्यों बढ़ी बेचैनी?

पाकिस्तान में चल रहा राजनीतिक दमन अब सीधे तौर पर सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर से जुड़ता जा रहा है, क्योंकि वही पूरे सिस्टम की निगरानी कर रहे हैं. देश में स्थिरता की एक नकली छवि दिखाने के लिए लगातार बेहद कठोर और दमनकारी उपायों का सहारा लिया जा रहा है. इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि पाकिस्तान आर्थिक रूप से बेहद सीमित और राजनीतिक रूप से पूरी तरह बंटा हुआ देश बना हुआ है.

इसके अलावा, सिक्योरिटी और डिप्लोमेसी के मोर्चे पर भी चुनौतियां बिल्कुल नेक्स्ट-लेवल हैं, जहां खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे अशांत प्रांतों में उग्रवाद अब भी सुरक्षा बलों के लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द बना हुआ है, वहीं पाकिस्तान सरकार भले ही ऑफिशियल बयानों में ईरान के साथ अपने रिश्तों को बेहद मधुर दिखाती हो, लेकिन असल में जमीनी स्तर पर दोनों देशों के संबंध काफी तल्ख हैं.

इसके साथ ही, पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान लंबे समय से जेल में बंद होने के बावजूद देश की राजनीति में अपना गहरा प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे हैं जो मौजूदा व्यवस्था के लिए एक अलग ही क्लेश है, और सबसे बड़ा ट्विस्ट तो खुद सेना के भीतर है जहां लिए गए कुछ फैसले असंतुष्ट जनरलों की संख्या को बढ़ा रहे हैं, जो आने वाले समय में सेना प्रमुख असीम मुनीर के लिए एक बड़ा आंतरिक असंतोष और चिंता का सबब बन सकता है. 

पाकिस्तान की क्या है आर्थिक स्थिति?

सत्तारूढ़ व्यवस्था भले ही आर्थिक स्थिरता के बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन सच यह है कि सेना की असीमित ताकत भी पाकिस्तान की बुनियादी समस्याओं को बदलने में नाकाम रही है. पाकिस्तान आज भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए पूरी तरह से बाहरी वित्तीय सहायता, विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानियों द्वारा भेजे जाने वाले धन और मित्र देशों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मदद पर टिका हुआ है.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) लगातार पाकिस्तान से कड़े आर्थिक सुधारों को लागू करने की मांग कर रहा है. आईएमएफ का मानना है कि पाकिस्तान में बार-बार आर्थिक संकट पैदा करने वाली मूल कमजोरियां आज भी जस की तस बनी हुई हैं:

ऊर्जा क्षेत्र का संकट: बिजली और ऊर्जा क्षेत्र में सर्कुलर कर्ज का आकार अब भी बहुत बड़ा बना हुआ है.

कमजोर टैक्स बेस: पाकिस्तान में करदाताओं का दायरा बेहद सीमित है, जिससे सरकार की अपनी कमाई न के बराबर है.

निर्यात में कमी: देश के निर्यात में विविधता की भारी कमी है, जिसके कारण विदेशी मुद्रा की कमाई नहीं बढ़ पा रही है.

एफडीआई की कमी: देश की जरूरतों के मुकाबले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) बेहद कमजोर और नाकाफी बना हुआ है.

घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रम: लगातार घाटा झेल रहे सरकारी उपक्रम (SOEs) देश के सीमित संसाधनों पर एक भारी बोझ बने हुए हैं.

इन सबके ऊपर प्रशासनिक अक्षमता के कारण सुधारों को केवल घोषित करना आसान है, लेकिन उन्हें जमीन पर लागू करना बेहद कठिन साबित हो रहा है, जिसने देश में एक असामान्य राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पैदा कर दी है.
 

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