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आजादी के 79वें साल बाद भारी विदेशी कर्ज में डूबे पाकिस्तान का 1947 से 2026 तक पूरा सफर. जानें महंगाई, गरीबी और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मदद की पूरी हकीकत और आंकड़े.
Pakistan After Independence: 14 अगस्त 1947 को धर्म के आधार पर पाकिस्तान भारत से अलग हुआ था. आजादी के बाद अपनी कट्टरवादी सोच की वजह से वह पूरी तरह तबाह हो गया. आज 2026 में यह मुल्क आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहा है. आइए देखते हैं कि बीते 79 सालों में भारत के मुकाबले पाकिस्तान की आज क्या हकीकत है.
पाकिस्तान अपनी आजादी के 79 वर्ष पूरा तो कर रहा है, लेकिन देश की हालत बहुत बुरी हो चुकी है. आज भी पाक एक चौराहे पर खड़ा है जहां एक तरफ तकनीकी विकास की उम्मीद है और दूसरी तरफ पुरानी व्यवस्थाओं की चुनौतियां और उसके आतंकी सोच ने उसे दबा कर रखा है. इतना ही नहीं, रही-सही कसर कुदरत की मार ने पूरी कर दी, जिसने समय-समय पर आने वाली आपदाओं से पाकिस्तान को विकास की दौड़ में बहुत पीछे धकेल दिया है.
आजादी के 80वें साल के करीब पहुंचते हुए पाकिस्तान की तुलना अक्सर भारत के विकास से की जाती है. आंकड़ों के अनुसार, भारत की GDP 3.92 ट्रिलियन डॉलर वहीं, पाकिस्तान की जीडीपी करीब 407.3 अरब है. इस बात यह साफ-साफ पता चलता है कि भारत विकास के मामले में पाकिस्तान से बहुत आगे निकल चुका है.
इसके अलावा, पाकिस्तान को विदेशी कर्ज 2029 तक करीब $100 बिलियन से अधिक का चुकाना पड़ेगा. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का कुल विदेशी मुद्रा भंडार अभी $10 बिलियन के आसपास ही है. इससे यह साफ पता चलता है कि कर्ज की राशि उसके पास मौजूद भंडार से 10 गुना ज्यादे है.
पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था वर्तमान में बड़े संकट से गुजर रही है. सार्वजनिक स्कूलों की गिरती हालत ने युवाओं को आधुनिक कौशल से लैस करने के बजाय कट्टरपंथ की ओर धकेलने का जोखिम पैदा कर दिया है.
पाकिस्तान उन गिने-चुने देशों में शामिल है जो अपनी जीडीपी का 2% से भी कम हिस्सा शिक्षा पर खर्च करते हैं. इसके अलावा, देश में एक तरफ महंगे अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूल हैं और दूसरी तरफ उर्दू या स्थानीय भाषाओं वाले सरकारी स्कूल, जिसने समाज में एक गहरी भाषाई और आर्थिक खाई पैदा कर दी है.
2002 में मुशर्रफ द्वारा शुरू किए गए 'एजुकेशन सेक्टर रिफॉर्म' (ESR) जैसे प्रयासों के बावजूद राजनीतिक हस्तक्षेप और धार्मिक कट्टरपंथियों के दबाव के कारण पाठ्यक्रम में जरूरी बदलाव नहीं हो पाए.
पाकिस्तान के संवैधानिक इतिहास को निरंतर फेरबदल के रूप में देखा जाता है. 1956, 1962 और 1973 के बाद अब 26वें और 27वें संशोधनों के जरिए न्यायपालिका की शक्तियों को कम करने और कार्यपालिका के नियंत्रण को बढ़ाने के आरोप लगे.
इसके अलावा, जरूरत के सिद्धांत के तहत अदालतों ने अक्सर सैन्य तख्तापलट को सही ठहराया है, जिसने लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर किया है.
पाकिस्तान में गरीबी की दर 2025-26 तक लगभग 28.9% तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं महंगाई दर की बात करें तो जुलाई की रिपोर्ट के अनुसार, अभी यह 9.20% है. लैंगिक असमानता के मामले में पाकिस्तान दुनिया में 145वें स्थान पर है, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संरचनात्मक बोझ है. जिसकी वजह से आम नागरिक के लिए जीवन स्तर अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है.
पाकिस्तान आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, देश की साक्षरता दर 63% है. हालांकि, यूनेस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान इसे 50% के करीब मानते हैं. जिसमे 73% पुरूष और 54% महिला है.
वहीं, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) आंकड़ों के अनुसार भारत की साक्षरता दर 80.9% से अधिक है, जिसमें पुरूष 87.2% और महिलाओं लगभग 74.6% है. इन बातों यह साफ पता चलता है कि इन 79 सालों में भारत ने सिर्फ आर्थिक-सामाजिक मोर्चों पर ही नहीं, बल्कि हर स्तर पर पाकिस्तान से बहुत आगे है.