दुनिया
स्वेज नहर और लाल सागर को जोड़ने वाले इस रूट के बंद होने से दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई ठप होने का खतरा मंडरा रहा है.
मिडिल ईस्ट में तनाव और जंग के हालात दिन-ब-दिन और गंभीर होते जा रहे हैं. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव के कारण पहले से ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उथल-पुथल देखने को मिल रही थी. दुनिया भर में तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर चिंताएं उस वक्त और गहरा गईं जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से आवाजाही प्रभावित हुई. लेकिन अब एक और नई और परेशान करने वाली खबर सामने आई है, जिसने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार की नींद उड़ा दी है.
रॉयटर्स के अनुसार, ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने समुद्र के एक और बेहद रणनीतिक और अहम रास्ते बाब-अल-मंडेब स्ट्रेट (Bab-el-Mandeb Strait) पर नाकाबंदी का ऐलान कर दिया है. हालांकि, हूती विद्रोहियों का कहना है कि यह नाकाबंदी फिलहाल सऊदी अरब से जुड़े जहाजों के लिए लागू की गई है, लेकिन जिस तरह से इस इलाके में जहाजों पर हमले और रुकावटें बढ़ी हैं, उसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बजा दी है.
होर्मुज स्ट्रेट के बाद बाब-अल-मंडेब दूसरा ऐसा समुद्री रास्ता है जिसे चोकपॉइंट यानी वैश्विक व्यापार की सबसे नाजुक नस माना जाता है. यह जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है. इतना ही नहीं, यह स्वेज नहर के दक्षिणी प्रवेश द्वार के रूप में भी काम करता है.
आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 10 से 12 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है, जिसमें कच्चे तेल और एलएनजी के बड़े शिपमेंट शामिल हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस समुद्री मार्ग पर संकट लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल के दाम 200 डॉलर प्रति बैरल के पार भी पहुंच सकते हैं, जो कि दुनिया भर में महंगाई का एक बड़ा विस्फोट साबित होगा.
इस पूरे घटनाक्रम का सीधा और गहरा असर भारत पर पड़ना तय माना जा रहा है. भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से भी अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. मिडिल ईस्ट और उत्तरी अफ्रीका से आने वाले ऊर्जा संसाधनों के लिए भारत इन समुद्री रास्तों पर काफी हद तक निर्भर है. इसके अलावा, भारतीय रिफाइनरियां रोजाना बड़ी मात्रा में रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद यूरोप के बाजारों में भेजने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल करती हैं.
व्यापारिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत का लगभग 95 प्रतिशत विदेशी व्यापार समुद्र के रास्ते ही होता है. स्वेज नहर और बाब-अल-मंडेब स्ट्रेट मिलकर भारत के कुल विदेशी व्यापार के करीब 35 प्रतिशत हिस्से को संभालते हैं. भारत से यूरोप, उत्तरी अमेरिका और उत्तरी अफ्रीका भेजे जाने वाले लगभग 80 प्रतिशत सामान इसी इलाके से होकर गुजरते हैं.
इनमें भारत के मुख्य निर्यात जैसे कपड़े, रेडीमेड गारमेंट्स, दवाइयां, भारी मशीनरी और बासमती चावल जैसे कृषि उत्पाद शामिल हैं. अगर इस रास्ते पर जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक ठप रहती है या जहाजों को अफ्रीका का चक्कर लगाकर लंबा रास्ता तय करना पड़ता है, तो इससे समुद्री माल भाड़ा और बीमा का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा. इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों के मुनाफे पर पड़ेगा और भारत में आयात होने वाली चीजें भी महंगी हो जाएंगी, जिससे देश में महंगाई बढ़ने का जोखिम खड़ा हो सकता है.
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