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होर्मुज स्ट्रेट में ईरान की 'नो-गो ज़ोन' पाबंदी, बिना परमिशन घुसने पर लगेगा बैन, जानें कितना भारी पड़ेगा समुद्री ताला

मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के युद्ध के बीच होर्मुज की घेराबंदी चल रही है. इसबीच ईरान ने जहाजों को बिना अनुमति एंट्री न करने की नसीहत दी है. ऐसे में इसका असर सिर्फ भारत पर ही नहीं, दुनिया भर के कई देशों पर पड़ेगा.

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होर्मुज स्ट्रेट में ईरान की 'नो-गो ज़ोन' पाबंदी, बिना परमिशन घुसने पर लगेगा बैन, जानें कितना भारी पड़ेगा समुद्री ताला

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मिडिल ईस्ट में युद्ध के बीच एक बार फिर से अमेरिका और ईरान होर्मुज को लेकर तनातनी शुरू हो गई है. इसबीच ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रेजाई ने बड़ा ऐलान यिका है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अब होर्मुज स्ट्रेट के बाहर नया एक नो गो जोन एरिया घोषित किया जाएगा. इसमें अनुमति के बाद ही एंट्री मिलेगी. साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि ये एरिया अमेरिकी नौसेना की ब्लॉकेड लाइन से शुरू होगा, जो फारस की खाड़ी के कुछ हिस्सों तक फैलेगा. अगर इससे कोई जहाज बिना अनुमति के गुजरता है तो उसे इस्लामिक रिपब्लिक की प्रतिबंध लिस्ट में डाल दिया जाएगा. 

ट्रंप के दांवों को बताया झूठ, सिर्फ 7 से 8 जहाज गुजरने की बात

पिछले कई दिनों होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि यह रास्ता पूरी तरह से खुला है. इससे जहाज गुजर रहे हैं, लेकिन मोहसिन रेजाई ने ट्रंप के इस दांवे को झूठा बताया है. उसने कहा कि फिलहाल होर्मुज स्ट्रेट से रोजाना सिर्फ 7 से 8 जहाजों से ज्यादा नहीं गुजर रहे हैं. इनमें से 5 से 6 जहाज ईरान के लिए जरूरी सामान लेकर जा रहे हैं. ऐसे में साफ है कि बिना अनुमति के अब यहां से जहाज नहीं निकलने दिये जाएंगे. 

आखिरकार ईरान ने क्या और क्यों उठाया ये कदम

ईरान के सैन्य प्रशासन और नौसेना अधिकारियों की ओर से जारी ताजा समुद्री चेतावनियों के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट के आसपास के एरिया में एक विशेष 'नो-गो ज़ोन' निर्धारित कर दिया गया है. इस कदम के तहत वाणिज्यिक, मालवाहक और विशेष रूप से पश्चिमी देशों या उनके सहयोगियों से जुड़े जहाजों की एंट्री को कड़ाई से सीमित किया गया है. ईरान का दावा है कि ये कदम क्षेत्रीय सुरक्षा, तटीय संप्रभुता की रक्षा और संभावित विदेशी जासूसी व उकसावे वाली गतिविधियों को रोकने के लिए उठाया गया है. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय नौवहन एजेंसियों में इस घोषणा के तुरंत बाद हड़कंप मच गया है, क्योंकि कई तेल टैंकर और मालवाहक जहाज अब समुद्र में फंसने या रास्ता बदलने के लिए मजबूर हो गये हैं.

पेट्रोल, गैस और हर घर की रसोई हो सकती है प्रभावित

दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और भारी मात्रा में लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) इसी होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती है. भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है. ऐसे में जब भी इस जलमार्ग में कोई रुकावट आती है, तो तीन बड़े संकट सीधे रूप से पैदा होने का डर बन जाता है. इनमें सबसे पहला कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई बाधित होते ही क्रूड ऑयल के दाम बढ़ने का खतरा, जिसका असर घरेलू स्तर पर ईंधन महंगा होने का पड़ता है. वहीं दूसरा ईंधन महंगा होने का मतलब है कि माल ढुलाई का प्रभावित होना. यानी सब्जी, फल, दूध और अनाज जैसी चीजों पर पैसे बढ़ सकते हैं. वहीं तीसरा है भारत खाड़ी देशों से एलपीजी और गैस का बड़ा हिस्सा आयात करता है. आपूर्ति में देरी या माल ढुलाई दरें बढ़ने से रसोई गैस सिलेंडर के दाम बढ़ सकते हैं.

इंश्योरेंस प्रीमियम का साइलेंट ब्लास्ट और शिपिंग रूट का संकट

ईरान द्वारा क्षेत्र को restricted zone घोषित करते ही दुनिया भर की बीमा कंपनियों ने उस रूट से गुजरने वाले हर जहाज के लिए वार-रिस्क प्रीमियम को कई गुना बढ़ा दिया है. इसका सीधा मतलब यह है कि अगर कोई जहाज चक्कर लगाकर लंबे रास्ते जैसे अफ्रीका का केप ऑफ गुड होप से सामान लाता है, तो यात्रा में 12 से 15 दिन ज्यादा समय लगेगा. इसके साथ ही ईंधन का खर्चा भी दोगुना हो जाएगा. इसका असर सिर्फ तेल पर ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पार्ट्स और विदेशों से आने वाले कपड़ों व सामानों पर भी पड़ेगा, क्योंकि माल ढुलाई महंगी होते ही कंपनियां इसका पूरा बोझ अंतिम उपभोक्ता यानी आपकी और हमारी जेब पर डाल देती हैं.

भारत के लिए यह खबर क्यों बेहद खास है

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है. देश की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक फारस की खाड़ी की स्थिरता पर टिकी हुई हैं. ऐसे में भारतीय नौसेना और जहाजरानी मंत्रालय इस पूरी स्थिति पर कड़ी नजर बनाये हुये हैं. भारतीय जहाजों के सुरक्षित आवागमन के लिए वैकल्पिक मार्गों और कूटनीतिक वार्ताओं की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं. अगर यह पाबंदी लंबे समय तक चलती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीति (Inflation) का दबाव बढ़ सकता है.

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