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मिडिल ईस्ट में शांति स्थापित करने की कोशिशों के बीच, अमेरिका और ईरान के आगामी समझौते ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है.
मिडिल ईस्ट से आ रही खबरें दुनिया की चिंता बढ़ाने वाली हैं. अमेरिका और ईरान के बीच होने जा रहे एक शांति समझौते ने इस इलाके में शांति लाने के बजाय तनाव को और बढ़ा दिया है. इस डील पर इजरायल ने बेहद सख्त और आक्रामक रुख अपनाया है, जिससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में तनाव घटने के आसार बेहद कम हैं.
अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले इस अंतरिम समझौते पर इजरायल के रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज़ ने पहली बार आधिकारिक बयान दिया है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि इजरायल, लेबनान से कब्जा की गई जमीन को किसी भी कीमत पर खाली नहीं करेगा. काट्ज़ ने कहा कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच यह समझौता पेंडिंग है, तब तक इजरायली सेना पीछे नहीं हटेगी.
उन्होंने अमेरिका को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि इजरायल कोई 'बनाना रिपब्लिक' (कमजोर या दूसरों के इशारों पर चलने वाला देश) नहीं है और डोनाल्ड ट्रंप का यह समझौता इजरायल को किसी भी फैसले के लिए मजबूर नहीं कर सकता. पाकिस्तान की ओर से आए एक बयान के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के अधिकारी इस समझौते पर दस्तखत करने के लिए शुक्रवार (19 जून) को जेनेवा में मिलने वाले हैं. लेकिन इजरायल के तेवर देखकर लगता है कि वह इस शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है.
इजरायली रक्षा मंत्री ने साफ कर दिया है कि उनकी सेना न सिर्फ लेबनान, बल्कि सीरिया और गाजा पट्टी के कब्जे वाले इलाकों में भी अनिश्चितकाल तक डटी रहेगी. दरअसल, ईरान चाहता है कि इस समझौते के तहत इजरायल लेबनान में सक्रिय चरमपंथी संगठन हिज्बुल्लाह पर अपने हमले रोक दे. लेकिन इजरायल इसके उलट ईरान को ही धमकी दे रहा है.
काट्ज़ ने कहा कि अगर ईरान ने लेबनान में इजरायली सैन्य कार्रवाई के विरोध में इजरायल पर कोई हमला किया, तो इजरायल ईरान के खिलाफ अभूतपूर्व और विनाशकारी ताकत का इस्तेमाल करेगा. बता दें कि पिछले ढाई सालों में इजरायल ने गाजा, लेबनान और सीरिया को मिलाकर करीब 1,000 वर्ग किलोमीटर इलाके पर अपना नियंत्रण कर लिया है, जो क्षेत्रफल में लगभग न्यूयॉर्क शहर जितना बड़ा है.
इस पूरे विवाद पर इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बेन-ग्विर का गुस्सा और भी ज्यादा भड़का हुआ है. उन्होंने कहा, "हम अमेरिका से प्यार करते हैं और राष्ट्रपति ट्रंप के मददगार रवैये के लिए उनके शुक्रगुजार हैं, लेकिन इजरायल अमेरिका के अधीन नहीं है. हम एक आजाद और संप्रभु देश हैं." बेन-ग्विर ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि जब भी इजरायल ने अपनी सुरक्षा को दांव पर लगाकर अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने टेके हैं, उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है.
उन्होंने ओस्लो समझौते और 2006 के लेबनान समझौते का उदाहरण देते हुए कहा कि उन फैसलों का नतीजा इजरायल के लिए बेहद बुरा रहा था. उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को सलाह दी है कि इस ऐतिहासिक मोड़ पर इजरायल को लेबनान की तरफ से आने वाले हर ड्रोन, मिसाइल या यूएवी हमले का मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए.
इजरायली नेताओं द्वारा इस्तेमाल किया गया 'बनाना रिपब्लिक' शब्द असल में एक राजनीतिक तंज है. यह शब्द उन छोटे, गरीब या राजनीतिक रूप से अस्थिर देशों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था किसी एक फसल या संसाधन के निर्यात पर टिकी होती है, और वहां की सरकारें विदेशी ताकतों या बड़ी कंपनियों के इशारों पर नाचती हैं. इजरायल ने खुद को यह कहकर अमेरिका को चेताया है कि उसे कोई कमजोर या कठपुतली देश समझने की भूल न की जाए.