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पाकिस्तान में इस समय नए प्रांतो के गठन के लेकर बहस चल रही है. नए प्रांतों के गठन का प्रोजेक्ट सेना का है. लेकिन, राजनीतिक दल इससे सहमत नहीं दिखते. ये तनाव बड़े पैमाने पर अशांति का रूप भी ले सकता है.
पाकिस्तान में एक बार फिर से सियासी संकट गहराने लगा है. देश से बाहर रह रहे ब्रिटिश-पाकिस्तानी नेता अल्ताफ हुसैन ने आरोप लगाया है कि पाकिस्तान की ताकतवर सेना और राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के बीच इस समय एक खामोश लड़ाई चल रही है. मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (MQM) के संस्थापक अल्ताफ हुसैन का दावा है कि 27वें
संविधान संशोधन से सारी ताकत हासिल करने के बाद आसिम मुनीर अब 28वें संविधान संशोधन की तैयारी में हैं. ये संशोधन नए प्रांत बनाने से संबंधित है जिसे सिंध प्रांत में अच्छी राजनीतिक पकड़ रखने वाले आसिफ अली जरदारी स्वीकार करने में संकोच कर रहे हैं.
अल्ताफ हुसैन ने दावा कि या है कि नए प्रांत बनाने पर बातचीत गृह मंत्री मोहसिन नकवी और DG-ISPR ने शुरू की है. प्रस्तावित संवैधानिक बदलाव राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी और सेना के नेतृत्व के बीच बढ़ते मतभेदों को दिखाते हैं. अल्ताफ हुसैन के अनुसार, राजनीतिक गतिरोध के गंभीर संवैधानिक नतीजे हो सकते हैं और मार्शल लॉ लागू किया जा सकता है. पहले हुए 26वें और 27वें संशोधनों का जिक्र करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक दलों ने पहले भी उन्हें पास कराने के लिए समझौते किए थे.
पाकिस्तान में नए प्रांत बनाने की योजना सेना की है. आसिम मुनीर के नेतृत्व में सेना चाहती है कि चार बड़े प्रांतों की जगह 15 से 20 छोटे-छोटे प्रांत बनें ताकि उसका नियंत्रण देश पर ज्यादा मजबूत हो. हालांकि पाकिस्तान के राजनीतिक दल इससे सहमत नहीं दिखते. पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन के मुताबिक, "सरकार के लिए नए प्रांत बनाना एक बहुत बड़ा काम लग रहा है. मौजूदा सरकार इसके लिए तैयार नहीं दिख रही है और उसने अभी तक देश की राजनीतिक ताकतों के बीच आम सहमति भी नहीं बनाई है."
डॉन के अनुसार, पाकिस्तान के राजनीतिक दलों ने भी सरकार से नए प्रशासनिक यूनिट बनाने के लिए संविधान में बताई गई प्रक्रिया का पालन करने को कहा है. न्होंने चेतावनी दी है कि संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करने की किसी भी कोशिश से जबरदस्त विरोध हो सकता है, जिसे सरकार बर्दाश्त नहीं कर पाएगी. रिपोर्टों के अनुसार, कई नए प्रांत बनाने की योजना है. हालांकि उनकी सही संख्या अभी तय नहीं है लेकिन, अनुमान के मुताबिक यह संख्या सात से 27 के बीच हो सकती है.
बता दें कि पाकिस्तान में अभी संवैधानिक रूप से चार बड़े सूबे हैं. देश की बदहाल स्थिति को देखते हुए नए प्रांत बनाने की बहस छिड़ी है लेकिन, जानकार इसे सेना का प्रोजेक्ट मानते हैं. पाकिस्तान के अंदर ही इस प्रस्ताव को लेकर विरोध शुरू हो गया है और सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या आर्थिक तंगी से जूझ रहा देश इससे बनने वाले अतिरिक्त प्रशासनिक ढांचे का खर्च उठा सकता है.
24 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला पाकिस्तान चार प्रांतों - पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान - में बंटा हुआ है. इन प्रांतों की आबादी और भूगोल में बहुत अंतर है. क्षेत्रफल और प्राकृतिक संसाधनों के मामले में सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान की आबादी सबसे कम है. पंजाब की आबादी सबसे ज्यादा है पूरे देश पर इसका दबदबा भी दिखता है. इससे पहले 2018 में अफगान सीमा के पास सात पहले से अर्ध-स्वायत्त आदिवासी जिलों को उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में मिला दिया गया था. लेकिन, आठ साल बाद भी, प्रांतीय अधिकारियों का कहना है कि उस विलय से जुड़े वित्तीय इंतजाम अभी तक सुलझ नहीं पाए हैं. ये हालात देखकर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेताओं का कहना है कि 8 साल में वे सिर्फ एक विलय को नहीं सुलझा पाए हैं. जब 15 प्रांत बनेंगे तो वे ऐसा कैसे कर पाएंगे?