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खत्म हो रहा ईरान का तेल भंडार, सिर्फ दो महीने का ही फ्यूल रिजर्व बचा, अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद कितनी बढ़ी मुसीबत?

अमेरिका ने हाल के हफ्तों में ईरान पर कई नए प्रतिबंध लगाए हैं. इनका मकसद ईरान की कैश तक पहुंच और इंटरनेशनल फाइनेंसिंग नेटवर्क और तेल निर्यात को रोकना है.

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खत्म हो रहा ईरान का तेल भंडार, सिर्फ दो महीने का ही फ्यूल रिजर्व बचा, अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद कितनी बढ़ी मुसीबत?

ईरान के पास अब सिर्फ दो महीने का ही तेल भंडार बचा है. (AI इमेज)

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अमेरिका के साथ पिछले कई महीनों से जारी संघर्ष और आर्थिक प्रतिबंधों के कारण ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है. कच्चे तेल के सबसे बड़े उत्पादकों में शामिल ईरान में अब सिर्फ दो महीने का ही फ्यूल रिजर्व बचा है. ईरान इस स्थिति में महीनों तक चली अमेरिकी बमबारी और नए प्रतिबंधों के कारण पहुंचा है. हालात ऐसे ही बने रहे तो होर्मुज पर नियंत्रण के बावजूद ईरान बड़ी मुसीबत में फंस सकता है. 

ईरान की मुसीबत कितनी बड़ी?

रॉयटर्स ने अपनी एक रिपोर्ट में ईरान के सीनियर अधिकारी के हवाले से बताया है कि अमेरिकी हमलों में रिफाइनरी इंफ़्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा है. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि ईरान को गैसोलीन इम्पोर्ट करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. ईरानी सरकार के पास रिफ़ाइनरीज की मरम्मत के लिए पैसे नहीं हैं. पूरे देश में अब सिर्फ दो महीने का ही तेल भंडार बचा है. 

कच्चे तेल के निर्यात में भारी गिरावट

आंकड़े बताते हैं कि ईरान का कच्चा तेल निर्यात जो एक साल पहले तक लगभग 17 लाख बैरल प्रति दिन था, वह घटकर अब महज 2.6 लाख बैरल प्रति दिन रह गया है. अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी और कड़े प्रतिबंधों के कारण ईरान का कच्चा तेल निर्यात लगभग ठप हो गया है. 

ईरानी मुद्रा रियाल का पतन और बेकाबू महंगाई

अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बंद हो गया है. वर्तमान में ईरानी मुद्रा (Rial) रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है. एक साल में रियाल का मूल्य 10 लाख प्रति डॉलर से गिरकर 22 लाख प्रति डॉलर से भी अधिक हो चुका है. ईरान में मुद्रास्फीति लगभग 70 प्रतिशत तक पहुंच गई है. खाद्य पदार्थों और दैनिक जरूरत के सामानों के दाम इससे लगभग दोगुने हो चुके हैं. 

क्या काम कर गई ट्रंप की रणनीति?

अमेरिका ने हाल के हफ्तों में ईरान पर कई नए प्रतिबंध लगाए हैं. इनका मकसद ईरान की कैश तक पहुंच और इंटरनेशनल फाइनेंसिंग नेटवर्क और तेल निर्यात को रोकना है. इन कदमों की वजह से ईरान के लिए सामान खरीदना, विदेशी मुद्रा हासिल करना और अपनी अर्थव्यवस्था को चालू रखना बहुत मुश्किल हो गया है. 

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने पिछले महीने ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट का ऐलान करते हुए ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की थी. उन्होंने इसे अमेरिकी इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंधों के जरिए ईरानी शासन को गिराने का अभियान बताया था.  उन्होंने इस कोशिश की तुलना ईरान के लिए कोनॉमिक D-Day से की थी. 

अमेरिकी अधिकारी इस समय ईरान की कड़ी निगरानी भी कर रहे हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि जो देश ईरान को किसी भी तरह की लाइफलाइन देंगे, उन्हें खुद आर्थिक नतीजों का सामना करना पड़ेगा. ईरान की आर्थिक स्थिति देखते हुए यही लगता है कि जो लक्ष्य अमेरिका सैन्य कार्रवाई से नहीं हासिल कर पाया, वो आर्थिक प्रतिबंधों से हासिल करने के करीब है.

ईरानी शासन के सामने अब क्या चुनौती है?

अमेरिकी दबाव के बीच, ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदार संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भी अगस्त में ईरान के साथ सभी वित्तीय और व्यावसायिक लेनदेन निलंबित कर दिए हैं. ईरान ने इससे पहले दशक से प्रतिबंधों को दरकिनार करने वाला नेटवर्क तैयार कर लिया था, लेकिन अब अमेरिका ने द्वितीयक प्रतिबंध सख्त कर दिए हैं जिससे ये नाकाम साबित हो रहा है. ईरान के शीर्ष नेतृत्व को इस बात का भी डर है कि भीषण आर्थिक मंदी और महंगाई के कारण देश में फिर से बड़े पैमाने पर जन-आक्रोश या विरोध प्रदर्शन भड़क सकते हैं.

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