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भारत का प्रोजेक्ट कुशा रूस के S-400 डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती? मॉस्को को दिखा नया मौका!

भारत और रूस के रिश्ते कई सालों तक पूरी तरह से हथियारों और फाइटर जेट की बिक्री पर आधारित थे, लेकिन अब भारत ने क्लीयर कर दिया है कि वो अपने सैन्य जरूरतों को खुद ही पूरा करेगा. इसलिए मॉस्को दिल्ली के साथ कंप्टीशन के बजाय संयुक्त प्रयासों का प्रस्ताव देकर उसके साथ जुड़ा रहेगा.

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भारत का प्रोजेक्ट कुशा रूस के S-400 डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती? मॉस्को को दिखा नया मौका!

रूस के सामने चुनौती बनेगा प्रोजेक्ट कुशा? (फोटो-AI)

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  • भारत अपने स्वदेशी डिफेंस सिस्टम प्रोजेक्ट कुशा को विकसित कर रहा है.
  • कुशा को साल 2028 से 2030 तक भारतीय वायुसेना में शामिल किया जाएगा. 
  • कुशा के तीन वेरिएंट होंगे, जो M1, M2 और M3 के नाम से जाने जाएंगे. 
  • इसकी रेंज 150 किमी से शुरू होकर 400 किमी तक होगी. 

भारत स्वदेशी लॉन्ग-रेंज एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम पर तेजी से काम कर रहा है, जिसे प्रोजेक्ट कुशा (Project Kusha) नाम दिया गया है. इसे डिफेंस रिसर्च एंड डेवलेपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) विकसित कर रहा है. इसे आम तौर पर रूस के एयर डिफेंस सिस्टम S-400 के लिए एक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि मॉस्को भारत के इस प्रोजेक्ट को प्रतिद्वंदी की तरह नहीं, बल्कि तकनीकी भागीदार के रूप में अपनी भूमिका स्थापित कर रहा है. 

मॉस्को का ये नजरिया भारत-रूस रक्षा संबंधों के बदलते स्वरूप को दिखाता है. कई सालों तक भारत और रूस के बीच रिश्ते पूरी तरह से हथियारों और फाइटर जेट की बिक्री पर आधारित थे. भारत ने क्लीयर कर दिया है कि अब वो अपने सैन्य जरूरतों को खुद ही पूरा करेगा. यह नियम फाइटर जेट्स, उनके इंजन से लेकर मिसाइल नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक वॉर फेयर, रडार सिस्टम और एयर डिफेंस सिस्टम तक सभी पर लागू होता है. आत्मनिर्भर भारत अभियान के साथ रूस ये स्वीकार करता है कि भविष्य में दोनों देशों के बीच संबंध सिर्फ और सिर्फ हथियारों की बिक्री पर ही निर्भर नहीं होंगे, बल्कि भारत की स्वदेशी परियोजनाओं में शामिल होने पर निर्भर करेंगे. इस बदलाव का एक प्रमुख संकेत रूस के अगली पीढ़ी के S-500 Prometheus डिफेंस सिस्टम से जुड़ी टेक्नोलॉजी को शेयर करने की तत्परता भी है.

भारत के प्रोजेक्ट कुशा पर रूस ने क्या कहा?

रूस ने भारत को S-500 को सीधे बेचने की कोशिश करने के बजाय उसकी टेक्नोलॉजी को शेयर करने में रुचि दिखाई है, जिससे भारत की भविष्य की लंबी दूरी की मिसाइल रक्षा परियोजनाओं का फायदा मिलेगा. बता दें कि मॉस्को ने किसी भी देश को अपना अपग्रेडेड डिफेंस सिस्टम नहीं बेचा है और फिलहाल अपनी सेना की जरूरतों को पूरा कर रहा है. इस तरह के सहयोग में अपग्रेडेड टारगेट ट्रैकिंग, लॉन्ग रेंज इंटरसेप्शन, हाई स्पीड मिसाइल नेविगेशन और कमांड-एंड-कंट्रोल फ्रेमवर्क में विशेषज्ञता साझा करना शामिल हो सकता है. ऐसी क्षमताएं प्रोजेक्ट कुशा जैसी पहलों और इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस ग्रिड के लिए भारत के परसेप्टिव का भरपूर समर्थन करेंगी. मॉस्को के लिए यह एक समझदारी भरा बदलाव है, पीछे हटने का कदम नहीं.

क्या है प्रोजेक्ट कुशा?
-प्रोजेक्ट कुशा भारत का स्वदेशी लंबी दूरी का एयर डिफेंस कवच है, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से दुश्मन के फाइटर जेट, ड्रोन और क्रूज मिसाइल जैसे हवाई खतरों को रोकने के लिए डेवलेप किया जा रहा है.
-इस प्रोजेक्ट का आधिकारिक नाम एक्सटेंडेड रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (ERADS) बताया जाता है.
-DRDO ने जुलाई, 2026 में कुशा प्रोजेक्ट के तहत लॉन्ग रेंज जमीन से हवा में मार सकने वाले पहले सफल परीक्षण की जानकारी दी.
-कुशा को चरणबद्ध तरीके से भारतीय वायुसेना में शामिल करने की योजना है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2028-2030 के आसपास इसको तैनात किया जा सकता है.
-प्रोजेक्ट कुशा में तीन इंटरसेप्टर वेरिएंट होने की उम्मीद है. M1- जिसकी रेंज 150KM है. M2- जिसकी रेंज करीब 250KM है और M3- जिसकी रेंज करीब 350 से 400KM होगी.

S-400 के रखरखाव में मदद करता है रूस

रूस ये अच्छी तरह समझता है कि भारत को हमेशा लंबी दूरी की मिसाइलों, डिफेंस सिस्टम, फाइटर जेट्स की खरीद के लिए मनाना बेकार है. भारत से कंप्टीशन के बजाय संयुक्त प्रयासों का प्रस्ताव देकर रूस अपने सबसे सुरक्षित डिफेंस गठबंधनों में से एक में अपनी अहमियत बनाए रखता है. एक फैक्ट ये भी है कि भारत के कुशा प्रोजेक्ट का टारगेट तुरंत ही S-400 की जगह लेना नहीं है. भारत के पांच S-400 स्क्वाड्रन, जिनकी अनुमानित लागत करीब 5.4 अरब डॉलर है, आने वाले सालों तक वायुसेना के डिफेंस सिस्टम में से एक बने रहेंगे. इंडियन एयरफोर्स ने पहले ही इन बैटरियों को इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ दिया है. रूस अभी S-400 बेड़े को रखरखाव, अतिरिक्त पुर्जे, सॉफ्टवेयर अपडेट और मिसाइल रिप्लेसमेंट में मदद करता है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि स्वदेशी सिस्टम मजबूत होने के बावजूद मॉस्को भारत के डिफेंस सिस्टम में गहराई से शामिल रहेगा. 

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