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यूरोप बाकी दुनिया के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है. इसके पीछे आर्कटिक का पास होना, बदलता मौसम और बर्फ की कमी जैसे 4 मुख्य कारण हैं. जानिए इसके गंभीर परिणाम और भविष्य की चुनौतियां.
Europe Heatwave Reasons: साल 2026 में पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की मार झेल रही है, लेकिन यूरोप इस संकट का केंद्र बनकर उभरा है. हालिया आंकड़ों और शोध के अनुसार, यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन गया है. यह अन्य महाद्वीपों की तुलना में दोगुनी गति से गर्म हो रहा है, जिसके परिणाम बेहद घातक और जानलेवा साबित हो रहे हैं.
यूरोप में पड़ रही भीषण गर्मी ने वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को पूरी तरह से चिंता में डाल दिया है. इस गर्मी के कारण अकेले 2026 की गर्मियों में अब तक हजारों लोगों की जान जा चुकी है. इटली जैसे देशों में जंगलों की भीषण आग और पूरे महाद्वीप में पड़ रहे सूखे ने इसे एक राष्ट्रीय आपातकाल जैसी स्थिति में खड़ा कर दिया है.
आंकड़े बताते हैं कि जीवाश्म ईंधन के अत्यधिक उपयोग से पहले की तुलना में यूरोप अब 2.5°C अधिक गर्म हो चुका है, जबकि वैश्विक औसत वृद्धि 1.4°C है. 1990 के दशक के मध्य से, यूरोप में हर दशक में तापमान 0.56°C बढ़ा है, जो उत्तरी अमेरिका (0.42°C) और अफ्रीका (0.36°C) जैसे महाद्वीपों से कही अधिक है.
वैज्ञानिकों ने यूरोप की इस स्थिति के लिए मुख्य रूप से चार बातों को जिम्मेदार ठहराया है:
1. आर्कटिक का पास होना: आर्कटिक दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला क्षेत्र है. पहले यहां की सफेद बर्फ सूरज की रोशनी को टकराकर वापस अंतरिक्ष में भेज देती थी. अब बर्फ पिघलने के कारण गहरा समुद्र खुल गया है, जो गर्मी को सोख रहा है. यूरोप का एक बड़ा हिस्सा आर्कटिक के नजदीक है. यही वजह है कि वहां बढ़ रही गर्मी का सीधा असर यूरोप के मौसम पर दिख रहा है.
2. वायुमंडल के पैटर्न में बदलाव: यूरोप के ऊपर हवा के बहाव का तरीका बदल गया है. इस वजह से वहां 'हीट डोम' जैसी स्थिति बन रही है, जहां गर्म हवा एक ही जगह फंसकर रह जाती है. वैज्ञानिकों के अनुसार, 'जेट स्ट्रीम' जैसी तेज हवाओं के पैटर्न में भी बदलाव आया है. यही वजह है कि यूरोप को लगातार भीषण लू का सामना करना पड़ रहा है.
3. बर्फ की चादर का कम होना: पहले यूरोप का एक बड़ा हिस्सा सर्दियों में बर्फ से ढका रहता था, जिससे वहां ठंडक बनी रहती थी. लेकिन जलवायु संकट के कारण अब बर्फबारी कम हो रही है. मार्च 2025 में, यूरोप की बर्फ की चादर औसत से 13 लाख (1.3 मिलियन) वर्ग किलोमीटर कम थी. यह कमी फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे पांच देशों के कुल क्षेत्रफल के बराबर है.
4. स्वच्छ हवा से होने वाला असर : यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में हवा का साफ होना भी गर्मी बढ़ने की एक वजह बना है. पहले प्रदूषण के कण सूरज की किरणों को रोककर वापस भेज देते थे. अब हवा साफ होने से सूरज की ज्यादा गर्मी सीधे जमीन तक पहुंच रही है और ग्रीनहाउस गैसों का असर पूरी तरह दिखने लगा है.
यूरोप की इस वार्मिंग का सीधा असर आम जनजीवन पर पड़ रहा है जिसमें-
स्वास्थ्य संकट: भीषण गर्मी के कारण हीटस्ट्रोक और मौत के मामले में लगातार वृद्धि हो रही है. जिसके वजह से आम लोगों में डर बन गया है.
प्राकृतिक आपदाएं: इतना ही नहीं जंगलों में आग, अचानक आने वाली बाढ़ और भयंकर सूखे से खेती और आजीविका पर भयंकर प्रभाव पड़ रहा है.
आर्थिक नुकसान: जलवायु संकट के कारण बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है. जिसको लोगों को भारी परेशानी हो रही है.