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जापान तेजी से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है. चीन को जापान की ये नीति बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रही है. जापान अमेरिका में बने 23 MQ-9B सी-गार्जियन ड्रोन भी खरीद रहा है.
जापान की तेजी से बढ़ती ड्रोन क्षमताओं को लेकर चीन असहज है. चीन के सैन्य समाचार पत्र PLA Daily ने जापान की रक्षा नीतियों और ड्रोन तकनीक के विस्तार पर कड़ी आपत्ति जताते हुए धमकी भी दी है. चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के आधिकारिक समाचार पत्र जापान पर आरोप लगाया है कि वह अनमैन्ड और ड्रोन तकनीकों का आक्रामक उपयोग करके 'रेड लाइन' को पार कर रहा है. चीन का दावा है कि जापान खुद को ऐसे देश में बदल रहा है जो लंबी दूरी के सटीक हमलों में सक्षम हो.
पिछले कई दशकों से जापान सैन्य ताकत को सीमित रखने की नीति पर चलता आया है. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने आक्रामक डिफेंस पॉलिसी अपनाई है. जापान अब डिफेंस बजट बढ़ा रहा है और मिलिट्री मॉडर्नाइजेशन कर रहा है. अमेरिका, भारत और फिलीपींस के साथ करीबी रक्षा संबंध विकसित कर रहा है. चीन को ये रास नहीं आ रहा है.
जापान ने पांच सालों में मानवरहित प्रणालियों के विकास पर 1 ट्रिलियन येन का निवेश करने का फैसला किया है जिसे चीन खतरे के रूप में देखता है. जापान ने इस साल के बजट में ड्रोन कार्यक्रमों के लिए 277 अरब येन आवंटित किए हैं. इसमें से 100 अरब येन डिफेंस नेटवर्क के लिए हैं. जापान अमेरिका से MQ-9B सी-गार्डियन भी खरीद रहा है और अपने खुद के अनमैन्ड सर्फेस वेसल और अंडरवाटर व्हीकल तेजी से विकसित कर रहा है. जापान ने क्यूशू, ओकिनावा, इशिगाकी, योनागुनी द्वीपों और मियाको व ओसुमी जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर ड्रोन नेटवर्क की तैनाती भी की है.
चीन की सरकार अब जापान को एक प्रमुख सैन्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रही है. यही कारण है कि चीनी समाचार पत्र ने जापान के Shield कार्यक्रम की तुलना अमेरिकी सेना के 'हेलस्केप' विचार से की है. इस रणनीति का उपयोग युद्ध के दौरान दुश्मन की नौसेना को पंगु करने के लिए भारी संख्या में ड्रोन तैनात करने के लिए किया जाता है.
चीन और जापान की सीमाएं एक दूसरे से नहीं मिलतीं. लेकिन फिर भी दोनों देशों के बीच विवाद बहुत गहरा है. दोनों देशों के बीच सेनकाकू द्वीपों को लेकर विवाद है. ये द्वीप पूर्वी चीन सागर में ऐसी जगह स्थित हैं जहां जापान, चीन और ताइवान के समुद्री रास्ते मिलते हैं. जो देश इस क्षेत्र पर नियंत्रण रखता है उसे समुद्र में निगरानी, सैन्य उपस्थिति और रणनीतिक बढ़त मिलती है. चीन हर हाल में इन द्वीपों पर कब्जा करना चाहता है.
चीन कहता है कि ये द्वीप सदियों से उसके व्यापारिक मार्ग और ऐतिहासिक नक्शों का हिस्सा रहे हैं. जापान दावा करता है कि उसने 1895 में इन्हें कानूनी रूप से अपने प्रशासन में शामिल किया था और तब से वह वास्तविक नियंत्रण रखता आ रहा है. इस ऐतिहासिक बहस ने दोनों देशों में सेनकाकू को राष्ट्रवाद का मुद्दा बना दिया है.