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पाकिस्तान की प्रमुख बिजली वितरण कंपनी FESCO के निजीकरण की दौड़ से चीनी सरकारी कंपनी जियांग्शी इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन बाहर हो गई है.
चीन और पाकिस्तान की आर्थिक साझेदारी को एक बड़ा झटका लगा है. पाकिस्तान की प्रमुख बिजली वितरण कंपनियों में से एक फैसलाबाद इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी (FESCO) के निजीकरण की दौड़ से एक चीनी सरकारी कंपनी बाहर हो गई है. यह घटना इसलिए काफी अहम मानी जा रही है क्योंकि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के तहत चीन वर्षों से पाकिस्तान का सबसे बड़ा आर्थिक मददगार रहा है.
पिछले एक दशक में चीनी कंपनियों ने पाकिस्तान के पावर, ट्रांसपोर्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर्स में अरबों डॉलर का भारी निवेश किया है. लेकिन FESCO के मामले ने पाकिस्तान के बदहाल बिजली सेक्टर में कारोबार करने की बढ़ती चुनौतियों और वित्तीय जोखिमों को उजागर कर दिया है.
चीन की कंपनी जियांग्शी इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन ने FESCO की 51 से 100 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने और इसका मैनेजमेंट कंट्रोल हासिल करने के लिए बोली लगाई थी. इस कंपनी में दिलचस्पी दिखाने वाले 12 संभावित निवेशकों में यह अकेली चीनी कंपनी थी. लेकिन यह कंपनी प्री-क्वालिफिकेशन राउंड में ही बाहर हो गई.
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीनी कंपनी ने तय नियमों का पालन करने के बजाय अपने सभी बिडिंग डॉक्युमेंट्स अंग्रेजी की जगह चीनी भाषा में जमा कर दिए थे. पाकिस्तान के प्राइवेटाइजेशन कमीशन ने 12 में से 10 कंपनियों को अगले दौर के लिए चुन लिया, लेकिन चीनी कंपनी अयोग्य घोषित हो गई.
यह मामला इसलिए भी हैरान करने वाला है क्योंकि इस्लामाबाद इस वक्त अपने घाटे में चल रहे बिजली क्षेत्र को उबारने के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है. सरकार ने पहले चरण में FESCO, GEPCO और IESCO जैसी तीन बड़ी कंपनियों को बेचने का प्लान बनाया है, जो करीब 1.4 करोड़ से ज्यादा ग्राहकों को बिजली पहुंचाती हैं.
पाकिस्तान का बिजली क्षेत्र लंबे समय से भारी वित्तीय घाटे, बिलों की अनसुलझी बकायेदारी और सर्कुलर डेट यानी चक्रवृद्धि कर्ज की मार झेल रहा है. इस वजह से नए निवेश जुटाना काफी मुश्किल हो चुका है.
चीन की बड़ी कंपनियां, जैसे पावरचाइना, 1987 से पाकिस्तान में काम कर रही हैं और CPEC के तहत लगभग 2.2 अरब डॉलर का निवेश कर चुकी हैं. लेकिन FESCO के इस वाकये को सिर्फ एक सामान्य तकनीकी नाकामी के रूप में नहीं देखा जा रहा है. पाकिस्तान में लगातार आर्थिक अस्थिरता, पेमेंट्स में देरी और सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं ने चीनी निवेशकों को बहुत ज्यादा सतर्क कर दिया है.
हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि चीन पाकिस्तान से पूरी तरह पीछे हट रहा है. चीनी कंपनियां अब भी वहां कई परियोजनाओं पर काम कर रही हैं. FESCO की घटना से यह साफ मैसेज मिलता है कि चीन अब पाकिस्तान के जोखिम भरे सेक्टर्स में आंख मूंदकर पैसा लगाने के मूड में नहीं है. वहीं पाकिस्तान के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि अगर बड़े विदेशी निवेशक दूरी बनाएंगे, तो उसका आर्थिक सुधार कार्यक्रम अधर में लटक सकता है.
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