दुनिया
नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने अमेरिकी संरक्षणवादी नीतियों और मनमाने टैरिफ का विरोध किया.
18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में जब दुनिया के बड़े नेता एक मंच पर जुटे, तो उनके बीच एक बात बिल्कुल साफ दिखी. आपस में भले ही कुछ मतभेद हों, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की नीतियों, मनमाने टैरिफ और एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों ने इस संगठन को एकजुट कर दिया है.
वैश्विक मंच पर अमेरिका के इस कड़े रुख का मुकाबला करने और अपनी अर्थव्यवस्थाओं को सुरक्षित रखने के लिए ब्रिक्स देश अब एक मजबूत और एकजुट मोर्चा बना रहे हैं.
सम्मेलन के दौरान सर्वसम्मति से मंजूर किए गए नई दिल्ली घोषणापत्र में यह चिंता खुलकर सामने आई. ब्रिक्स देशों ने दुनिया में बढ़ते एकतरफा टैरिफ, व्यापारिक रुकावटों और संरक्षणवादी नीतियों की कड़े शब्दों में निंदा की. उन्होंने साफ कहा कि ये कदम विश्व व्यापार संगठन के नियमों के पूरी तरह खिलाफ हैं.
भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे अलग-अलग तरह की अर्थव्यवस्था वाले देशों के लिए अमेरिका की टैरिफ धमकियों ने पुराने गणित को बदल दिया है. अब अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना और व्यापारिक रास्ते बदलना सिर्फ एक दूर का सपना नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है.
अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की चर्चा ब्रिक्स में पहले से चल रही थी, लेकिन अब इसने खासी रफ्तार पकड़ ली है. अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम और पाबंदियों के दबाव से बचने के लिए ब्रिक्स देशों ने मिलकर ठोस कदम उठाने शुरू कर दिए हैं.
ब्रिक्स देश अब आपस में डॉलर के बजाय अपनी-अपनी करेंसी, जैसे रुपया, युआन आदि में कारोबार बढ़ाने पर तेजी से काम कर रहे हैं. इससे करेंसी के उतार-चढ़ाव और बाहरी पाबंदियों का असर कम होगा.
एक ऐसा सिस्टम तैयार किया जा रहा है, जिससे बिना किसी रुकावट और कम खर्च में सीमाओं के पार पैसों का लेन-देन हो सके. भारत की पहल पर गुजरात में 'BRICS रिस्क लैब' बनाने की तैयारी है, ताकि इंश्योरेंस और री-इंश्योरेंस के क्षेत्र में किसी बाहरी देश पर निर्भर न रहना पड़े.
अमेरिका के दबाव का एक बड़ा असर यह हुआ है कि पुराने विरोधी भी अब एक टेबल पर आ गए हैं. भारत और चीन जैसी बड़ी एशियाई ताकतों के बीच कुछ मुद्दों पर अपनी अलग राय भले ही हो, लेकिन दोनों का मकसद एक ही है- अपने एक्सपोर्ट को बचाना, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना.
एकतरफा व्यापारिक फैसलों के खतरे ने इन देशों को समझदारी से काम लेने पर मजबूर किया है. अपनी आर्थिक संप्रभुता की रक्षा करना अब इस पूरे ग्रुप का सबसे बड़ा मकसद बन गया है.
नई दिल्ली से उभरी यह रणनीति सिर्फ खुद का बचाव करने तक सीमित नहीं है. BRICS देश अब अपनी बढ़ती आर्थिक ताकत के दम पर WTO, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे वैश्विक संगठनों में बड़े सुधारों की मांग कर रहे हैं. देखा जाए तो वाशिंगटन के सख्त रवैये ने अनजाने में ही सही, लेकिन ब्रिक्स देशों को पिछले दो दशकों में पहली बार इतना एकजुट और मजबूत मकसद दे दिया है.
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