दुनिया
ग्लोबल वार्मिंग के कारण जहां पूरी दुनिया के समुद्रों का तापमान तेजी से बढ़ रहा है, वहीं अटलांटिक महासागर में एक ऐसा रहस्यमयी हिस्सा है जो लगातार ठंडा होता जा रहा है.
दुनियाभर के वैज्ञानिक इस समय अटलांटिक महासागर में हो रही एक बेहद अजीब हलचल को देखकर हैरान भी हैं और परेशान भी. आमतौर पर हम सब जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पूरी दुनिया के समंदर लगातार गर्म हो रहे हैं, लेकिन ग्रीनलैंड और आइसलैंड के ठीक नीचे समुद्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है, जो गर्म होने के बजाय दिन-ब-दिन ठंडा होता जा रहा है. इस खास और ठंडे इलाके को वैज्ञानिकों ने 'कोल्ड ब्लॉब' या 'वार्मिंग होल' का नाम दिया है.
आंकड़ों की मानें तो साल 1900 से लेकर अब तक इस हिस्से का तापमान करीब 1 डिग्री सेल्सियस तक नीचे गिर चुका है. एक नई रिसर्च ने इस रहस्यमयी बदलाव के पीछे की वजहों को सामने रखा है, जो यह इशारा करती हैं कि इंसान बहुत तेजी से मौसम के एक ऐसे विनाशकारी मोड़ पर पहुंच रहा है जहां से वापस लौट पाना मुमकिन नहीं होगा. जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स जर्नल में 28 मई को पब्लिश हुई नई रिसर्च, पिछली बातों को सपोर्ट करती है कि ब्लॉब का होना अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन नाम की समुद्री धाराओं के कमजोर होने की ओर इशारा करता है.
वैज्ञानिकों ने जब सैटेलाइट और जमीनी आंकड़ों की मदद से इस पहेली को सुलझाने की कोशिश की, तो पता चला कि यह ठंडक सिर्फ समुद्र की ऊपरी सतह पर नहीं है, बल्कि गहराई तक फैली हुई है. इसका मतलब यह है कि इस पर बादलों या हवाओं का कोई तात्कालिक असर नहीं है, बल्कि इसके पीछे समुद्र के भीतर चलने वाली ताकतवर धाराएं जिम्मेदार हैं.
इसे विज्ञान की भाषा में एमोक (AMOC- अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन) कहा जाता है. यह सिस्टम समंदर के अंदर एक विशाल कन्वेयर बेल्ट की तरह काम करता है, जो गर्म पानी को भूमध्य रेखा से उत्तरी गोलार्ध की तरफ ले जाता है. वहां पहुंचकर यह पानी ठंडा होता है, भारी होकर नीचे बैठता है और फिर गहराई से वापस दक्षिण की तरफ बह जाता है. अब यही पूरा सिस्टम कमजोर पड़ रहा है, जिसकी वजह से वहां तापमान लगातार गिर रहा है.
ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ध्रुवों पर जमी बर्फ और ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं. इस पिघलती बर्फ के कारण समंदर में भारी मात्रा में मीठा और साफ पानी मिल रहा है, जिसने एमोक के नमक और घनत्व के संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है. रिसर्च का कहना है कि यह सिस्टम पिछले 1000 सालों में अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है.
अगर यह समुद्री बेल्ट पूरी तरह ठप हो गई, तो दुनिया का पूरा नक्शा और मौसम बदल जाएगा. इसके थमने से अमेरिका के पूर्वी तटों पर समुद्र का जलस्तर अचानक बढ़ जाएगा और वहां के तटीय शहर डूबने लगेंगे. वहीं दूसरी तरफ, यूरोप में इतनी हाड़ कंपाने वाली ठंड पड़ेगी जैसी पहले कभी नहीं देखी गई. यही नहीं, अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में मानसून का पूरा चक्र ही तबाह हो जाएगा, जिससे भयानक सूखा पड़ने की आशंका है.
इस नई स्टडी को लेकर मौसम विज्ञानियों के बीच थोड़ी बहस भी छिड़ी हुई है. कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि अलग-अलग डेटा स्रोतों से एक जैसे नतीजे आना इस बात को साबित करता है कि खतरा बिल्कुल वास्तविक है. हालांकि, कुछ का यह भी कहना है कि हमारे पास समुद्र की गहराइयों का बहुत पुराना और सटीक डेटा मौजूद नहीं है, इसलिए इस थ्योरी को आखिरी सच नहीं माना जा सकता. इसके सटीक असर को समझने के लिए अभी और ज्यादा रिसर्च की जरूरत है.
वैज्ञानिकों की यह चेतावनी पूरी इंसानियत के लिए एक वेक-अप कॉल है. अगर समंदर का यह सुरक्षा चक्र हमेशा के लिए रुक गया, तो प्रकृति में होने वाले विनाशकारी बदलावों को कभी सुधारा नहीं जा सकेगा. इस बड़े खतरे से बचने का इकलौता उपाय यही है कि दुनिया के तमाम देश मिलकर ग्रीनहाउस गैसों और कार्बन के उत्सर्जन को तुरंत और कड़ाई से रोकें. जब तक ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार धीमी नहीं होगी, तब तक समंदर के इस बिगड़ते मिजाज को संभालना नामुमकिन होगा.