दुनिया
अमेरिका और ईरान के बीच शांति व्यवस्था को लेकर हुए करार का समय अब खत्म हो गया है. अब तक दोनों ही देशों में कई बातों को लेकर असहमति बनी हुई है. ऐसे में ईरान ने भी सहमति न बनने की स्थिति में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर आवाजाही रोकने का संकेत दे दिया है.
अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीति की डोर लगातार कमजोर होती जा रही है. फरवरी में शांति व्यवस्था के लिए दोनों देशों के बीच तय किया गया समय अब पूरा होने वाला है. इन 90 दिनों के शांति व्यवस्था बातचीत में भी कोई हल नहीं निकला. रॉयटर्स की मानें तो ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर बातचीत नाकाम रही, तो वह 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में सैन्य कार्रवाई कर सकता है, लेकिन यह सिर्फ दो देशों की जंग या भू-राजनीतिक बयानबाजी भर नहीं है. इसका सीधा असर ज्यादातर देशों में क्रूड आॅयल से लेकर अन्य सामान की सप्लाई में बांधा आने की वजह से देखने को मिल सकता है...
रॉयर्ट्स के अनुसार, ईरान अधिकारी का कहना है कि "ईरानी संस्थाओं को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और व्यापक क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि ईरान कठिन फैसले लेने और उन पर कार्रवाई करने के लिए तैयार रहेगा." उन्होंने आगे कहा कि अगर कूटनीति विफल रही तो तेहरान अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को तोड़ने के लिए "समयबद्ध और सटीक" सैन्य हमला कर सकता है.
ईरान के पास स्थित यह संकरा समुद्री रास्ता पूरी दुनिया की ईंधन आपूर्ति की जीवनरेखा है. दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और भारी मात्रा में एलएनजी (LNG) इसी रास्ते से होकर गुजरती है. अगर ईरान यहां अपनी नौसेना तैनात करता है या जहाजों का रास्ता रोकता है, तो वैश्विक तेल बाजार में भूचाल आ सकता है, जिसका प्रभाव दुनिया के ज्यादातर देशों पर पड़ सकता है.
जब भी मिडिल ईस्ट में आग लगती है, उसका धुआं सीधे आम उपभोक्ता के घर तक पहुंचता है. अगर होर्मुज में तनाव बढ़ा, तो इसका असर तीन बड़े मोर्चों पर देखने को मिल सकता है. इनमें सबसे पहला कच्चे तेल की सप्लाई रुकते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें रातों-रात बढ़ सकती हैं. इसका प्रभाव पेट्रोल डीजल के दामों पर पड़ेगा. इनके बढ़ते ही ट्रांसपोर्ट से लेकर सफर, सब्जियां और राशान तक प्रभावित होंगे. वहीं भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर हिस्सा आयात करता है. ऐसे में एलपीजी और सीएनजी के दाम बढ़ने से ज्यादातर लोग प्रभावित होंगे.
लोग अक्सर सोचते हैं कि होर्मुज संकट का मतलब सिर्फ 'महंगा पेट्रोल' है, लेकिन इसका एक बड़ा पहलू उर्वरक और केमिकल सप्लाई से भी जुड़ा है. मिडिल ईस्ट से भारत और एशियाई देशों क भारी मात्रा में यूरिया और पेट्रोकेमिकल्स का निर्यात होता है. अगर यह रास्ता बंद होता है, तो कृषि लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर आने वाले सीजन में अनाज और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ेगा.
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है. भारत के लिए यह दोहरा संकट हो सकता है. एक तरफ अपने ऊर्ज हितों को बचाना और दूसरी तरफ खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा करना है. अगर कूटनीतिक रास्ते बंद होते हैं, तो दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को महंगाई से निपटने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे.