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आईइएफ को फाइटर जेट्स के 42 स्क्वाड्रनों की स्वीकृति मिली हुई है, जिसके मुकाबले वर्तमान में करीब 29 से 31 स्क्वाड्रन ही ऑपरेशनल हैं. भारत स्वदेशी AMCA पर काम कर रहा है और 2034-35 तक इसके सेवा में आने की उम्मीद है. ऐसे में रूस का तर्क है कि करीब 40 Su-57 की खरीद चीन के J-20 के अंतर को पाट सकती है.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पीएम नरेंद्र मोदी के बीच ब्रिक्स समिट के दौरान 11 सितबंर को मीटिंग होने वाली है. इससे पहले क्रेमलिन की ओर से भारत को एक बार फिर 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट Su-57 की पेशकश की गई है. हालांकि मास्को की ओर से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, भारत में ही मैन्यूफेक्चरिंग और सोर्स कोड को लेकर शर्तें रखी गई हैं, जिसकी वजह से दिल्ली की ओर से खास दिलचस्पी नहीं दिखाई गई है.
जहां रूस बार-बार Su-57 फाइटर जेट की पेशकश कर रहा है, जो उसकी बढ़ती हताशा को दिखा रहा है, जबकि भारत की गैर-दिलचस्पी इस बात को दिखाती है कि उसकी रणनीति और स्वदेशी रक्षा प्राथमिकताओं में काफी बदलाव आ चुका है. आइए जानते हैं कि रूस सुखोई बेड़े को बढ़ावा क्यों दे रहा है, लेकिन भारतीय वायुसेना इसको लेकर उदासीन क्यों दिखाई दे रही है?
यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंधों की बौछार कर दी, जिसने रूस के पारंपरिक रक्षा निर्यात बाजारों को पंगु बना दिया. वित्तीय बाधाओं और भू-राजनीतिक दबाव की वजह से पुराने खरीदार देश पीछे हट गए, जिसकी वजह से रूस अपने सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार भारत की ओर देख रहा है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव की प्रेस ब्रीफिंग और राष्ट्रपति पुतिन के पिछले बयानों से संकेत मिल रहे हैं कि रूस किसी भी कीमत में भारत के साथ सुखोई-57 को लेकर डील करना चाहता है.
रूस भारत को सिर्फ अपने निर्यात संस्करण (Su-57E) की पेशकश नहीं कर रहा है, बल्कि प्रस्ताव में Su-57 ग्रुप के सभी विमानों का ऑफर दिया है. खासकर डबल सीट वाला Su-57D का, जिसने करीब 2-3 महीने पहले ही अपनी पहली उड़ान पूरी की थी. इतना ही नहीं रूस की ओर से डील को इंट्रेस्टिंग बनाने के लिए भारत में ही प्रोडक्शन के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड (HAL) के इस्तेमाल का प्रस्ताव भी दिया है.
भारतीय वायुसेना (IAF) वर्तमान में स्क्वाड्रनों की भारी कमी से जूझ रही है. IAF के बेड़े में 42 स्क्वाड्रनों की स्वीकृति मिली हुई है, जिसके मुकाबले वर्तमान में करीब 29 से 31 स्क्वाड्रन ही ऑपरेशनल हैं. 2028 में जगुआर बेड़े का रिटायरमेंट और उसके बाद 2030 के दशक में मिग-29 और मिराज-2000 के रिटायरमेंट के साथ ही 2035 तक भारतीय बेड़े में करीब 12 स्क्वाड्रनों की कमी आ सकती है. भारत अपने स्वदेशी 5वीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) पर काम कर रहा है और 2034-35 तक इसके सेवा में आने की उम्मीद है. ऐसे में रूस का तर्क है कि 36 से 40 Su-57 फाइटर जेट की खरीद चीन के J-20 और पाकिस्तान के संभावित स्टेल्थ फाइटर जेट खरीद के मुकाबले क्षमता अंतर को पाट सकती है.
रक्षा खबरों से जुड़ी वेबसाइट, डिफेंस डॉट इन की रिपोर्ट के मुताबिक, Su-57 को लेकर भारत की रूस के साथ डील टूट गई थी. दरअसल भारत और रूस ने 2007 में मिलकर फिफ्थ जनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट पर काम करना शुरू किया था, जोकि 2018 तक इस कार्यक्रम के साथ रहा, लेकिन IAF ने Su-57 (तब इसे PAK FA के नाम से जाना जाता था) का मूल्यांकन किया और गंभीर टेक्नोलॉजी आपत्तियां जताईं. जब तक भारत इस कार्यक्रम से बाहर निकला, तब तक वो प्रारंभिक डिजाइन में से ही 295 मिलियन डॉलर तक खर्च कर चुका था.
-स्टेल्थ क्षमता में कमी: भारतीय वायुसेना ने निष्कर्ष निकाला कि यह विमान 5वीं पीढ़ी की स्टेल्थ क्षमता के मानकों को पूरा नहीं करता. हालांकि इसका सामने का रडार क्राॉस सेक्शन ठीक था, लेकिन इसके पीछे के हिस्से मॉडर्न रडारों के लिए आसानी से दिखाई देते थे.
-इंजन में कमियां: FGFA के प्रोटोटाइप में वादा किया गया था कि इसमें अगली पीढ़ी का इंजन 'Izdeliye 30' होगा. इसके बजाय रूस ने पुराने AL-41F1 इंजन ही लगाया था, जो भारतीय वायुसेना द्वारा अपेक्षित वास्तविक सुपरक्रूज क्षमता प्रदान करने में विफल रहे.
-टेक्नोलॉजी ट्रांसफर: रूस ने भारत को बार-बार महत्वूर्ण सोर्स कोड और डिजाइन डेटा तक पहुंच नहीं दी, जिससे भविष्य में लड़ाकू विमान के एवियोनिक्स को स्वतंत्र रूप से डेवलेप करने और स्वदेशी हथियारों को इंटीग्रेट करने की भारत की क्षमता पंगु हो जाती.
रूस तो अपने भरोसेमंद साझेदार को लगातार ऑफर दे रहा है, लेकिन आज भारत के लिए भू-राजनीतिक और घरेलू परिस्थितियां काफी बदल गई हैं, जिससे Su-57 का अधिग्रहण असंभव जैसा हो गया है.
भारत का एयरोस्पेस क्षेत्र पर फोकस अब पूरी तरह से स्वदेशी विकास पर केंद्रित हो गया है. जुलाई 2026 में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने क्लीयर कर दिया था कि सरकार की Su-57 खरीदने की कोई योजना नहीं है. इसके बजय भारत का फोकस स्वदेशी प्रोजेक्ट्स पर है. भारतीय वायुसेना 180 तेजस Mk1A फाइटर जेट को शामिल करने, तेजस Mk2 और AMCA को डेवलेप करने में प्राथमिकता दे रही है. इसके अलावा भारी लड़ाकू विमानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत फिलहाल अपने Su-30MKI बेड़े को अरबों डॉलर की लागत से अपग्रेड कर रहा है.
अगर भारत 5वीं पीढ़ी के रूसी फाइटर जेट Su-57 की खरीद करता है, तो इससे अमेरिका नाराज हो सकता है और राजनियक तनाव पैदा हो सकता है. अमेरिका काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट यानी CAATSA के तहत रूस से बड़े रक्षा उपकरण खरीदने वाले देशों पर कड़े प्रतिबंध लगा सकता है. हालांकि भारत अपने S-400 एयर डिफेंस सिस्टम के लिए कुछ शर्तों के साथ छूट हासिल करने में कामयाब रहा था, लेकिन एक प्रमुख लड़ाकू विमान का सौदा उस रेड लाइन को पार करने जैसा होगा.
इसके अलावा 2026 में अमेरिकी सीनेट के एक विधेयक में रूसी हथियार खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है. भारत इस समय अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर बातचीत भी कर रहा है, जोकि बेहद ही नाजुक मोड पर है, जिसका उद्देश्य अमेरिका की ओर से लगाए गए 18 फीसदी टैरिफ को कम करना है.
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