डीएनए एक्सप्लेनर
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में आगामी चुनावों से पहले भड़की हिंसा ने एक बार फिर इस क्षेत्र को चर्चा में ला दिया है. अक्सर राजनीतिक बयानों में गूंजने वाले पीओके का इतिहास और इसकी जमीनी हकीकत क्या है, यह जानना बेहद जरूरी है.
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में 27 जुलाई को होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है. वहां सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसक झड़पों में 30 से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लगभग 200 लोग घायल हैं. इस पूरे बवाल की जड़ चुनाव से जुड़ा एक नया फैसला है.
प्रशासन ने आने वाले चुनावों में 45 विधानसभा सीटों में से 12 सीटें शरणार्थियों (रिफ्यूजियों) के लिए रिजर्व करने का फैसला किया. स्थानीय संगठन जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने इसका कड़ा विरोध किया. उनका मानना है कि यह स्थानीय लोगों की आवाज को दबाने और राजनीति चमकाने की एक चाल है. इसी के विरोध में एक बड़े प्रदर्शन की तैयारी थी, लेकिन उससे एक दिन पहले ही हिंसा भड़क गई.
इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें 1947 के दौर में जाना होगा. जब अंग्रेजों ने भारत का बंटवारा किया, तो उस समय की रियासतों को तीन विकल्प दिए गए- वे चाहें तो भारत में शामिल हों, पाकिस्तान में जाएं या फिर आजाद रहें. जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को कानूनी तौर पर भारत के साथ इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसन (विलय पत्र) पर दस्तखत किए थे. ये फैसला पूरी तरह कानूनी और अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक था, जैसे बाकी 560 से ज़्यादा रियासतों ने किया था.
पेंच तब फंसा जब अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने पहले कबीलाई लड़ाकों और फिर मई 1948 में अपनी नियमित सेना को कश्मीर में घुसपैठ के लिए भेज दिया. इसके बाद दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया, जो 1949 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद सीजफायर पर खत्म हुआ. इस सीजफायर लाइन ने कश्मीर को दो हिस्सों में बांट दिया, और जम्मू-कश्मीर का लगभग 35 फीसदी हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे में चला गया. साल 1994 में भारतीय संसद ने एक प्रस्ताव पास कर साफ कर दिया था कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान को अपने कब्जे वाले इलाके खाली करने होंगे.
प्रशासनिक तौर पर पाकिस्तान ने इस इलाके को दो हिस्सों में बांट रखा है- पहला आजाद जम्मू और कश्मीर (AJK) और दूसरा गिलगित-बाल्टिस्तान, जिसे पहले नॉर्दर्न एरिया कहा जाता था. मुजफ्फराबाद इस पूरे इलाके की राजधानी है और यह मीरपुर, मुजफ्फराबाद और पुंछ जैसे तीन डिवीजनों के 10 जिलों में फैला है. दिखाने के लिए PoK का अपना एक अलग संविधान है, विधानसभा है, प्रधानमंत्री, कैबिनेट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी है. वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का चुनाव वहां की विधानसभा ही करती है.
नाम भले ही 'आजाद कश्मीर' हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. खुद पाकिस्तान का संविधान PoK को अपना हिस्सा नहीं मानता. पाकिस्तान के संविधान में जो चार प्रांत दर्ज हैं- पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा, उनमें PoK का नाम कहीं नहीं है. यहां तक कि पाकिस्तान की संसद में भी PoK का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. यहां असली सत्ता 'कश्मीर काउंसिल' के हाथ में होती है, जिसका मुखिया खुद पाकिस्तान का प्रधानमंत्री होता है.
इसके 14 सदस्यों में से 6 को सीधे इस्लामाबाद यानी पाकिस्तानी सरकार चुनती है. 1974 के अंतरिम संविधान के मुताबिक, यहां की लोकल सरकार छोटे से छोटे फैसले के लिए भी पूरी तरह इस्लामाबाद पर निर्भर है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि वहां के संविधान के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति या पार्टी पाकिस्तान में कश्मीर के विलय के खिलाफ प्रचार नहीं कर सकती. अगर कोई ऐसा करता है, तो उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता है. चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों को पाकिस्तान के प्रति वफादारी का हलफनामा देना पड़ता है.
पाकिस्तान इस इलाके का भरपूर आर्थिक और रणनीतिक इस्तेमाल करता है, लेकिन बदले में यहां के लोगों को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं. यह इलाका प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है. यहां पानी, जंगल और ग्रेफाइट, मार्बल, कीमती पत्थरों जैसे खनिजों का बड़ा भंडार है. पाकिस्तान के पंजाब और सिंध के खेतों में सिंचाई के लिए जो पानी जाता है, उसका करीब 70 प्रतिशत हिस्सा इसी इलाके की सिंधु नदी प्रणाली से आता है. यही नहीं, पाकिस्तान की कुल बिजली का 10 से 15 फीसदी हिस्सा यहां के हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से बनता है. लेकिन अफसोस की बात यह है कि इन संसाधनों का फायदा पाकिस्तान के मुख्य शहरों को मिलता है, और यहां के लोग खाली हाथ रह जाते हैं.
हालिया रिपोर्ट्स और रिसर्च के आंकड़े यहां की बदहाली की गवाही देते हैं. PoK की करीब 66 फीसदी आबादी आज भी खेती और पशुपालन पर निर्भर है. यहां करीब 29 प्रतिशत लोग कुपोषण का शिकार हैं, जो पाकिस्तान के राष्ट्रीय औसत (19.9%) से कहीं ज्यादा है. पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लगभग 90 प्रतिशत परिवारों के पास खाने-पीने की सुरक्षा नहीं है. बच्चों की सेहत की स्थिति और भी चिंताजनक है, पांच साल से कम उम्र के करीब 39 फीसदी बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो पाया है और 14 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट हैं. स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण नवजात शिशुओं और माताओं की मृत्यु दर भी यहां बेहद ज्यादा है.