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पीएम मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट Su-57 के बारे में भी चर्चा हो सकती है. रूस काफी पहले भारत के सामने Su-57 की पेशकश कर चुका है. हालांकि भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर इस पर कोई बयान जारी नहीं किया गया है.
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान नई दिल्ली में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच द्विपक्षीय वार्ता होगी. 12 सितंबर को होने वाली इस मीटिंग में एयर डिफेंस सिस्टम S-400, रूस का 5वीं पीढ़ी का फाइटर जेट Su-57 और ब्रह्मोस मिसाइल का अपग्रेडेशन प्रमुख मुद्दों के रूप में उभर रहे हैं. क्रेमलिन ने संकेत दिया है कि चर्चा में संबंधों के कई क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा, लेकिन सैन्य-तकनीकी सहयोग पर खास फोकस किया जाएगा.
क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव की ओर से ये बयान संकेत देता है कि मॉस्को भारत के साथ अपनी कुछ सबसे एडवांस्ड सैन्य टेक्नोलॉजी पर चर्चा करने के लिए तैयार है, जिसमें Su-57 और ब्रह्मोस मिसाइल को अधिक ताकतवर बनाने के तरीकों पर भी विचार किया जा रहा है. इसके अलावा दोनों नेताओं के बीच एयर डिफेंस सिस्टम S-400 को लेकर भी चर्चा की उम्मीद है. भारत ने 2018 में रूस से पांच S-400 ट्रायम्फ सिस्टम के लिए 5.43 अरब डॉलर की डील की थी, इनमें से चार की डिलीवरी हो चुकी है, लेकिन एक की आपूर्ति इस साल के आखिर तक होने की उम्मीद है. क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भारतीय मीडिया से बात करते हुए कहा कि रूस अपने दायित्वों को पूरा करने में सक्षम है और उन्हें पूरा किया जाएगा. उन्होंने आगे कहा कि यह मुद्दा दोनों नेताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है.
भारत के लिए एस-400 का विशेष महत्व है क्योंकि इसे लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों और कुछ बैलिस्टिक मिसाइलों समेत कई प्रकार के हवाई खतरों का पता लगाने और उन्हें तबाह करने के लिए डिजाइन किया गया है. इसीलिए इसकी तैनाती भारत की मल्टीलेयर एयर डिफेंस सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है. हाल ही में पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान भारत की हवाई सुरक्षा को मेंटेन बनाए रखने में इसका बड़ा योगदान रहा. भारत की रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने कुछ और एस-400 की खरीद को मंजूरी दी है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत के लिए ये डिफेंस सिस्टम कितना इंपोर्टेंट है.
पीएम मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट Su-57 के बारे में भी चर्चा हो सकती है. रूस काफी पहले भारत के सामने Su-57 की पेशकश कर चुका है. Su-57 के बारे में पूछे जाने पर पेस्कोव ने कहा, 'भारत को इन मशीनों की बिक्री का मुद्दा एजेंडे में है.'
Su-57 रूस का 5वीं पीढ़ी का मल्टीरोल लड़ाकू विमान है, जिसे स्टेल्थ टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड एविएशन टेक्नोलॉजी, सेंसर इंटीग्रेशन, हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों प्रकार के मिशनों को अंजाम देने की क्षमता को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है. अगर भारत मॉस्को के इस ऑफर को स्वीकार करता है तो फाइटर जेट्स की कमी से जूझ रही इंडियन एयरफोर्स के बेड़े में विमानों की संख्या भी बढ़ जाएगी और उसे एडवांस्ड फाइटर जेट्स का स्क्वाड्रन भी मिल जाएगा. हालांकि भारत की दिलचस्पी तैयार फाइटर जेट्स को खरीदने के बजाय टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और देश में उसका प्रोडक्शन करने में है. क्रेमलिन प्रवक्ता ने स्पष्ट किया है कि भारतीय वैज्ञानिक और अधिकारी प्रोडक्शन टेक्नोलॉजी तक पहुंच के लिए बातचीत कर रहे हैं और इसको लेकर बातचीत जारी है.
रूसी फाइटर जेट पर चर्चा का ये सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. भारत की रक्षा खरीद रणनीति अब पूरी तरह से हथियार प्रणालियों के आयात के बजाय घरेलू मैन्यूफेक्चरिंग, लोकल असेंबली और टेक्नोलॉजी हासिल करने पर अधिक जोर दिया जा रहा है. इसलिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर चर्चा करने का मॉस्को का उत्साह प्रस्तावित Su-57 सौदे को एक पारंपरिक लड़ाकू विमान बिक्री से अलग आयाम देता है. साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की व्यवस्था सीधे खरीद की तुलना में कहीं अधिक कठिन होगी. स्टेल्थ, एडवांस्ड रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, इंजन से जुड़ी टेक्नोलॉजी 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोग्राम में सबसे संवेदनशील होती हैं.
पीएम मोदी और पुतिन के बीच चर्चा में तीसरा सबसे प्रमुख मुद्दा ब्रह्मोस मिसाइल कार्यक्रम का होगा, जिसे भारत-रूस ने मिलकर डेवलेप किया था. ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जो भारत की सटीक मारक क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है. इसे जमीन आधारित लॉन्चर्स, युद्धपोतों और लड़ाकू विमानों समेत कई प्लेटफॉर्म में इंटीग्रेट किया गया है. अब मॉस्को इस साझेदारी को अगले चरण में ले जाना चाहता है.
पेस्कोव ने कहा, 'हम संयुक्त रूप से ब्रह्मोस मिसाइलों का प्रोडक्शन कर रहे हैं. अब समय आ गया है कि इन मिसाइलों में सुधार करने, कुछ अतिरिक्त विशेषताएं जोड़ने और उन्हें बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी और प्रभावी बनाने के बारे में सोचा जाए.' इससे भारत को रणनीतिक फायदा मिल सकता है. एक ओर उसके सशस्त्र बलों की क्षमता बढ़ेगी और दूसरी रक्षा निर्यातक के रूप में स्थिति और भी मजबूत होगी.