दुनिया
एक्सपर्ट ने क्लीयर किया कि चीन के लिए भारत कभी अमेरिका से अपने संबंध नहीं बिगाड़ेगा. उन्होंने कहा, 'भारत का अमेरिका के साथ बिजनेस फायदे का सौदा है. जबकि चीन के साथ नुकसान का. हम अमेरिका को ज्यादा निर्यात करते हैं, जबकि चीन से आयात करते हैं. हम अमेरिका से पंगा क्यों लेंगे.'
भारत में ब्रिक्स समिट में शामिल होने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 साल बाद नई दिल्ली आए थे. 2020 में हुए गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन के बीच तनाव काफी ज्यादा बढ़ गया था, लेकिन दोनों देशों की ओर से लगातार बातचीत के जरिए सीमा पर हालात सुधरे हैं. ऐसे में शी जिनपिंग का करीब 400 डेलीगेशन के साथ ब्रिक्स समिट में शामिल होना बताता है कि बीजिंग भारत के साथ रिश्तों को अहमियत दे रहा है. इसको लेकर भारतीय सेना के रिटायर्ड कर्नल और विदेश मामलों के जानकार दिनेश नैन से जब पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भारत चीन के ऊपर आंखें बंद करके भरोसा नहीं करता है.
पाकिस्तान की पत्रकार आरजू काजमी ने पूछा कि क्या भारत और चीन के रिश्ते अब बेहतर होंगे तो इस पर दिनेश नैन ने कहा कि चीन ने नेपाल के साथ पुरानी संधि के आधार पर सीमा का समझौता कर लिया, लेकिन भारत के साथ करना नहीं चाहता है. चाहे लेह-लद्दाख हो या अरुणाचल प्रदेश हो. उन्होंने कहा, 'चीन ने हमारे ऊपर ट्रेड डेफिसिट बढ़ा दिया है. हम 9 लाख करोड़ का आयात करते हैं, लेकिन असलियत में ये 15 लाख करोड़ के करीब है. हमारे कारोबारी कम का बिल बनवाकर आते हैं ताकि उन्हें आयात कम टैक्स देना पड़े. चीन हमारा सामान ही नहीं खरीदता है. 10 फीसदी भी चीन नहीं ले रहा है. हमारा मुद्दा क्लीयर है कि अगर आपको हमारे साथ आगे बढ़ना है तो आपको ट्रेड डेफिसिट भी खत्म करना पड़ेगा. ड्रिलिंग मशीन, टनल बनाने का सामान, इंजीनियर्स को भेजना, इन्वेस्ट करना, रियरल अर्थ मटीरियल भी देना होगा. हम भारत में मोबाइल बनाते हैं, सोलर पैनल बनाते हैं, लेकिन उसकी बैट्री चीन से ही खरीदने पड़ती हैं.'
एक्सपर्ट दिनेश नैन ने कहा कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब है. दुनिया की सप्लाई चेन चीन के ही पास है, लेकिन उसके साथ ट्रस्ट का बड़ा इश्यू है. इसको यूरोप और अमेरिका भी समझते हैं और इस ट्रस्ट डेफिसिट का फायदा भारत को मिलेगा. उन्होंने कहा, 'हाल ही में कई यूरोपीय नेता भारत आए हैं. फ्रांस ने 114 राफेल फाइटर जेट बनाने का ऑफर दिया है. इसके लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी की है. रूस भी भारत को एस-500 और सुखोई-57 देने को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ देने को तैयार है. जर्मनी के चांसलर से ब्रिटेन के पीएम और कनाडा के नेता भी आए. ये लोग चाहते हैं कि भारत चीन को टक्कर देने वाला, वही फैक्ट्री बने, उसी तरह की सप्लाई चेन हो क्योंकि भारत पर दुनिया का ट्रस्ट है.'
उन्होंने कहा कि भारत इस समय टाइम गेन कर रहा है. हम अपना सामान बनाना ठप नहीं कर सकते हैं. दुनिया का 2.8 बिलियन का मार्केट चीन और भारत के पास है. अगर आपको सामान बेचना है तो हम ही हैं. आने वाले समय में यूरोप-अमेरिका सब ट्रस्ट डेफिसिट की वजह से भारत में निवेश के लिए भागेंगे.
आरजू काजमी ने पूछा कि क्या शी जिनपिंग के भारत आने के बाद भारत ने चीन के जिन मोबाइल ऐप्स को बैन कर दिया था, उन्हें खोल दिया है तो इस पर विदेश मामलों के जानकार नैन ने कहा, 'भारत स्ट्रैटजिक ऑटोनॉमी में बिलीव करता है. वो किसी का पिछलग्गू नहीं है.कोई भी ऐप नहीं खोला गया है. चीन की एक टेलीकॉम कंपनी है, उसको भी बंद किया गया है.'
दिनेश नैन ने कहा कि जिनपिंग-मोदी की मीटिंग हुई है, उसमें जो कहा गया है कि वो क्या है-
-किसी भी देश के ऊपर एकतरफा एग्रेशन मंजूर नहीं होगा.
-ग्लोबल साउथ रूल टेकर नहीं रूल सेफर बनेगा.
-UNSC में पुराने जमाने के 5 लोगों को बैठा रखा है, उसमें बदलाव होना चाहिए.
इस पर चीन ने साइन किया है, इससे पाकिस्तान में करंट जाएगा. अगर किसी तरह का टेररिज्म होता है तो इस पर सभी ब्रिक्स देश मिलकर एक्शन लेंगे.
दिनेश नैन ने कहा, 'अमेरिका सुपरपावर है. अगर ऐसा सोचें कि चीन, रूस, भारत मिलकर वर्ल्ड ऑर्डर को बदल देंगे. ये हमारे जीवन में होने वाला नहीं है और ना ही डी-डॉलराइजेशन होने वाला है. ब्रिक्स करेंसी का मुद्दा ही खत्म हो गया है. भारत का कोई इंटरेस्ट नहीं है, डी-डॉलराइजेशन में. हम किसी के खिलाफ नहीं है. हमारा स्ट्रैटजिक ऑटोनॉमी है. मल्टीपोलर वर्ल्ड हमारे लिए इंपोर्टेंट हैं. हम भी चाहते हैं कि सब एक दूसरे की इज्जत करें. हम क्वाड को मिलिट्राइजेशन के समर्थक कभी नहीं रहे हैं. भारत को पता है कि उसे कैसे स्ट्रैटजी बनानी है.'
विदेश मामलों के एक्सपर्ट दिनेश नैन ने क्लीयर किया कि चीन के लिए भारत कभी अमेरिका से अपने संबंध नहीं बिगाड़ेगा. उन्होंने कहा, 'भारत का अमेरिका के साथ बिजनेस फायदे का सौदा है. जबकि चीन के साथ नुकसान का. हम अमेरिका को ज्यादा निर्यात करते हैं, जबकि चीन से आयात करते हैं. हम अमेरिका से पंगा क्यों लेंगे. चीन मजबूरी के साथ भारत के साथ विवादों को सॉल्व करना चाहता है.'
ये भी पढ़ें- BRICS समिट में जाकर ईरान को क्या मिला? PAK सपोर्टर एक्सपर्ट बोले- 'कोई फायदा नहीं, भारत तो...'