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ब्रिक्स देशों के साझा घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई है. इसके साथ ही आतंकियों की सीमा पार घुसपैठ, आतंकवाद के वित्तपोषण और पनाहगाहों का मुकाबला करना भी शामिल है. साझा घोषणापत्र पर सहमति पश्चिम एशिया में संघर्ष को लेकर यूएई और ईरान के बीच गहरे मतभेदों को दूर करने के बाद बनी.
ब्रिक्स देशों ने शनिवार को आम सहमति से एक साझा घोषणा पत्र अपनाया, जोकि भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी है. इसमें पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले की भी निंदा की गई है, साथ ही आतंकियों की सीमा पार घुसपैठ, आतंकवाद के वित्तपोषण और पनाहगाहों का मुकाबला करना भी शामिल है. यह सहमति पश्चिम एशिया में संघर्ष को लेकर यूएई और ईरान के बीच गहरे मतभेदों को दूर करने के बाद बनी. हालांकि इसमें ईरान पर हमलों को लेकर अमेरिका या ईरान सेना द्वारा खाड़ी देशों पर किए गए हमलों का जिक्र नहीं है. नई दिल्ली घोषणापत्र में रूस-यूक्रेन युद्ध का जिक्र नहीं है, लेकिन गाजा में जारी हिंसा को लेकर इजरायल की आलोचना हुई है. अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा टैरिफ के बढ़ते इस्तेमाल पर भी चिंता जताई गई. नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट पाकिस्तान और उसके सपोर्टर्स के लिए आंख की किरकरी बन गया है.
पाकिस्तान समर्थक भारतीय-अमेरिकी प्रोफेसर मुक्तेदार खान ने पाकिस्तान की पत्रकार आरजू काजमी के साथ बातचीत में ब्रिक्स में शामिल होने पहुंचे ईरानी प्रेसिडेंट पेजेश्कियान पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा, 'ट्रंप की धमकी के बाद ईरान में भारत कोई इन्वेस्टमेंट नहीं करेगा. पेजेश्कियान के वहां जाने से कोई फायदा नहीं है. भारत, मिस्र और रूस जैसे ब्रिक्स देश ईरान के साथ बिजनेस नहीं कर रहे हैं. सिर्फ चीन ही उसके साथ है, जिसने अपनी कंपनियों से कहा है कि अगर अमेरिकी की धमकी से डरकर कारोबार बंद किया तो तुम्हारे खिलाफ एक्शन लिया जाएगा.'
उन्होंने कहा कि ईरान से पूछा जाना चाहिए तुम्हें ब्रिक्स में जाकर क्या मिला? इन्वेस्टमेंट, हथियार या किसी देश का खुलकर साथ मिला. हालांकि ब्रिक्स ईरान के लिए सांकेतिक था. जब पश्चिम और अमेरिका उसको अलग-थलग करने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे में उसे ऐसा मंच मिला, जिसने साबित को किया तेहारान अलग-थलग नहीं हैं. भारत से तो ईरान को कोई मदद नहीं मिलने वाली है.
मुक्तेदार खान ने कहा कि ब्रिक्स सम्मेलन भारत से ज्यादा रूस और चीन के लिए इंपोर्टेंट था. शी जिनपिंग का सात साल बाद नई दिल्ली जाना, ये भारत की सफलता है. पुतिन-जिनपिंग और पेजेश्कियान के साथ पीएम मोदी की फोटो दिखाते हुए प्रोफेसर ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में कहा जा रहा था कि चीन ने पाकिस्तान का साथ दिया था और ईरान ने भी दिया था, लेकिन ये फोटो देखकर तो ऐसा लग रहा है कि पीएम मोदी काफी खुश दिखाई दे रहे थे.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि ब्रिक्स जी7 देशों से आगे निकल गया है. हमारी आबादी करीब 50 फीसदी और जीडीपी करीब 40 फीसदी है. इस पर प्रोफेसर मुक्तेदार खान ने कहा, 'आंकड़ों में देखिए पुतिन कह रहे हैं कि ब्रिक्स G7 से आगे हैं, लेकिन जी7 देशों की इकोनॉमी 55 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि ब्रिक्स देशों की 35 ट्रिलियन डॉलर. इनमें चीन की अकेले ही करीब 20 ट्रिलियन डॉलर है. जी7 देशों की पर कैपिटा इनकम 70,165 डॉलर है, जबकि ब्रिक्स देशों में ये 8916 डॉलर है. जी7 में सात देश हैं, वो सभी लोकतांत्रिक देश हैं, लेकिन ब्रिक्स में 11 में से सिर्फ चार देश लोकतांत्रिक हैं. ब्रिक्स में शामिल देशों के चीन के अलावा सबके मेजर ट्रेडिंग पार्टनर पश्चिम में है. जी7 के सभी देश, छह नाटो में हैं. जापान का अमेरिका के साथ सुरक्षा को लेकर समझौता है. जबकि ब्रिक्स देश आपस में ही लड़ रहे हैं. इसलिए पुतिन का कहना सही नहीं होगा. जी7 में डिसएग्रीमेंट हैं, लेकिन ब्रिक्स के स्तर पर नहीं हैं.'
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, अबू धाबी के युवराज शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और समूह के अन्य शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में पहले दिन की बैठक समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणापत्र को अपनाए जाने की घोषणा की. इसमें ईरान युद्ध को लेकर कहा गया, 'हम पश्चिम एशिया में तनाव के लगातार बढ़ने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं और अपने-अपने राष्ट्रीय रुख को ध्यान में रखते हुए अधिकतम संयम बरतने तथा ऐसी कार्रवाइयों से बचने का आह्वान करते हैं, जो हालात को और खराब कर सकती हैं.'
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