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कौन हैं यूट्यूब के CEO नील मोहन, जानिए क्यों है लखनऊ से उनका खास नाता

भारतीय मूल के नील मोहन यूट्यूब के सीईओ हैं. हाल ही में उन्होंने निखिल कामथ के साथ पॉडकास्ट के दौरान लखनऊ में बिताए अपने शुरुआती दिनों को याद किया. ऐसे में आइए जानते हैं कौन हैं नील मोहन.

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कौन हैं यूट्यूब के CEO नील मोहन, जानिए क्यों है लखनऊ से उनका खास नाता
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यूट्यूब के सीईओ नील मोहन निखिल कामथ के पॉडकास्ट पर आए, जहां दोनों ने कई विषयों पर चर्चा की - यूट्यूब क्रिएटर्स के लिए एक प्लेटफॉर्म है और इसके एल्गोरिदम को क्रैक करने के टिप्स से लेकर राजनीति पर सोशल मीडिया के प्रभाव तकय इन गंभीर विषयों के बीच, बातचीत मोहन के शुरुआती सालों और लखनऊ में उनकी स्कूली शिक्षा की ओर मुड़ गई. मोहन के पिता ने आईआईटी से पढ़ाई की थी।. छोटी उम्र में ही वे अमेरिका चले गए, जहां उनके पिता पर्ड्यू यूनिवर्सिटी में मृदा परीक्षण में पीएचडी कर रहे थे.

कौन है नील मोहन 

भारतीय मूल के नील मोहन यूट्यूब के सीईओ और वाइस प्रेसिडेंट हैं. साल 2008 में नील यूट्यूब के साथ जुड़े थे. साल 2013 में कंपनी ने उन्हें 544 करोड़ रुपए का बोनस दिया था. यूट्यूब की मूल कंपनी अल्फाबेट के सीईओ सुंदर पिचाई (Sunder Pichai) भी भारतवंशी हैं उन्होंने साल 2015 में चीफ प्रोडक्ट ऑफिसर की जिम्मेदारी मिली. उनके काम को देखते हुए उन्हें शुरुआत से ही वोज्स्की का उत्तराधिकारी माना जा रहा था. 

नील मोहन ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ग्लोरफाइड टेक्निकल सपोर्ट से की थी. उन्होंने एसेंचर में सीनियर एनालिस्ट के पद पर काम किया है. इसके अलावा उन्होंने डबलक्लिक इंक में 3 सालों तक काम किया. इसके बाद उन्होंने करीब ढाई साल वाइस प्रेसिडेंट बिजनेस ऑपरेशन की जिम्मेदारी संभाली.

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लखनऊ से है खास जुड़ाव 

यूट्यूब के सीईओ ने बताया, "मैंने लखनऊ में हाई स्कूल की पढ़ाई की. मेरे पिता - मैं भारत में पैदा हुआ था और मेरे पिता पीएचडी कर रहे थे - इसलिए जब मैं पैदा हुआ तो मेरे माता-पिता स्नातक छात्र थे, और हाई स्कूल के लिए यहां वापस आए."

सातवीं कक्षा में लखनऊ आने पर उनके सामने नई चुनौतियां आईं, जिनमें सबसे बड़ी चुनौती थी मोहन का हिंदी में निपुण न होना. "जब मैं अमेरिका में बड़ा हो रहा था, तो मुझे बेसबॉल बहुत पसंद था, मुझे ट्रांसफॉर्मर बहुत पसंद था, आदि आदि, और फिर यहां आकर, आप जानते हैं, मैं अजीब लग रहा था. मेरे पास लोगों से जुड़ने के लिए ऐसी कोई चीज नहीं थी." मोहन के पूर्व सहपाठियों और शिक्षकों को याद है कि शुरुआत में वह हिंदी में बात करने में असमर्थ थे. लेकिन बाद में मेहनत से वो सब सीख गए. 

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