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ढाई सौ साल से नहीं हो पा रहा देवी की इस मूर्ति का विसर्जन, जानें ये कहां है और क्या है इसकी अजब कहानी

आज हम आपको एक ऐसी दुर्गा पंडाल के बारे में बताने जा रहे हैं जहां पर पिछले 250 साल से मां की मूर्ति का विसर्जन नहीं किया है. बल्कि मां की मूर्ति यहां से हिलती तक नहीं और 250 सालों से ऐसे ही विराजमान हैं.

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ढाई सौ साल से नहीं हो पा रहा देवी की इस मूर्ति का विसर्जन, जानें ये कहां है और क्या है इसकी अजब कहानी

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नवरात्रि में जगह-जगह बड़े-बड़े पंडालों में माता रानी की मूर्तियों को स्थापित करके पूरे 9 दिनों तक उनकी पूजा-अर्चना की जाती है. इसके पश्चात दशहरा को माता की मूर्ति का विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है. लेकिन अगर आपसे कहा जाए कि भारत में एक ऐसी मूर्ति है जिसकी विसर्जन पिछले ढाई सौ साल से नहीं किया गया है. जी हां सही सुना आपने जहां दशहरा को पूरे देश में सजे पंडालों की मूर्तियों का विसर्जन कर दिया जाता है वहीं काशी के जंगम बाड़ी स्थित पंडाल की प्रतिमा अगले वर्ष के लिए फिर रखी जाती है. 

250 साल से ये सिलसिला जारी

ये सिलसिला करीब पिछले 250 सालों से चला आ रहा है. तब से लेकर आज तक ये मूर्ति भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बना हुई हैं. ये प्रतिमा भी और मूर्तियों को तरफ मिट्टी, लड़की और पुआल से बनी हुई हैं. दरअसल 1767 में यहां पर एक बंगाली परिवार रहता था, जिसे मुखर्जी परिवार के रूप में लोग जानते थे. इस परिवार ने 1767 में  अपनी परंपरा अनुसार षष्ठमी तिथि को देवी का पूजन कर पंडाल में दुर्गा प्रतिमा स्थापित किया. मां दुर्गा के साथ महिसासुर, कार्तिकेय, गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती माता की मूर्तियों की भी स्थापना कर पूजा-पाठ शुरू किया गया. 

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विसर्जन के लिए हिली तक नहीं प्रतिमा

विजयदशमी के दिन जब माता के विसर्जन के लिए प्रतिमा को उठाया जाने लगा तो वो हिली ही नहीं. पुजारी श्यामल भट्टाचार्य बताते हैं कि 1767 से स्थापित इस मूर्ति के दर्शनों के लिए देश ही नहीं विदेश से भी लोग आते हैं. आज तक माता से जो भी मनोकामना भक्तों ने मांगी है मां ने सब पूर्ण किया है. बताया जाता है मुखर्जी परिवार के सपने में माता ने आकर प्रतिमा विसर्जित नहीं करने और पूजा करने की बात कही थी. माता की सेवा-पूजा को खर्चीला बताने के बाद उन्होंने केवल गुड़-चना और एक टाइम की आरती की बात कहकर स्वप्न से गायब हो गई थीं. 

मां को गुड़ चने का भोग

तब से आज तक माता को गुड़ और चने का भोग लगता है और सेवा के रुप में आरती की जाती है. पुजारी बताते है कि आज तक इस मूर्ति की किसी भी तरह की मरम्मत नहीं की गई है. दुर्गाबाड़ी में दर्शन करने आए श्रद्धालु रविशंकर तिवारी बताते हैं कि माता की महिमा का वर्णन बहुत ही कठिन है. हम लोग जिस तरह से माता की भक्ति में समर्पित हैं, उसका कोई उल्लेख नहीं हैं. लगभग ढाई सौ वर्षों से मां विराजमान हैं. यहां नवरात्र में नौ दिनों मेला लगता है. 

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