उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने करीब 170 विधानसभा सीटों को अपनी प्राथमिकता में रखा है. इन 170 सीटों में बड़ी संख्या ऐसी बताई जा रही है, जहां समाजवादी पार्टी पहले से मजबूत मानी जाती है या पिछले चुनावों में उसका अच्छा प्रदर्शन रहा है.
लेखक- भावेष पांडेय
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष के सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ बीजेपी को चुनौती देने का नहीं, बल्कि विपक्ष के भीतर नेतृत्व और हिस्सेदारी तय करने का भी है. यही वजह है कि इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर बढ़ती खींचतान की हो रही है.
दोनों दल सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं. बयानबाजी लगातार तेज हो रही है. कभी कांग्रेस के नेता समाजवादी पार्टी की राजनीतिक शैली पर सवाल उठा रहे हैं तो कभी सपा की ओर से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में उसकी राजनीतिक हैसियत याद दिलाई जा रही है. यह टकराव अब सिर्फ गठबंधन की बातचीत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कई बार नेताओं के बीच व्यक्तिगत टिप्पणियों तक पहुंच चुका है. लेकिन इस पूरी सियासी लड़ाई के बीच कांग्रेस चुपचाप एक ऐसी रणनीति पर काम कर रही है, जो आने वाले दिनों में समाजवादी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा सकती है.
कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा था कि पार्टी प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर तैयारी कर रही है. उनका कहना था कि कांग्रेस हर विधानसभा क्षेत्र में अपना संगठन खड़ा करेगी और उसे किसी दूसरे दल के सहारे राजनीति करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है.
यह बयान अपने आप में महत्वपूर्ण था, लेकिन इसके पीछे की असली रणनीति अब धीरे-धीरे सामने आती दिख रही है. दरअसल, कांग्रेस ने करीब 170 विधानसभा सीटों को अपनी प्राथमिकता में रखा है. पार्टी का सबसे ज्यादा जोर इन्हीं सीटों पर संगठन मजबूत करने, स्थानीय समीकरण साधने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर है. यानी 403 सीटों पर तैयारी का दावा अपनी जगह है, लेकिन वास्तविक राजनीतिक निवेश फिलहाल इन 170 सीटों पर दिखाई दे रहा है.
यहीं से पूरी कहानी दिलचस्प हो जाती है. इन 170 सीटों में बड़ी संख्या ऐसी बताई जा रही है, जहां समाजवादी पार्टी पहले से मजबूत मानी जाती है या पिछले चुनावों में उसका अच्छा प्रदर्शन रहा है. यानी कांग्रेस अपनी सबसे ज्यादा ताकत उन्हीं इलाकों में लगा रही है, जिन्हें सपा अपनी राजनीतिक ताकत का केंद्र मानती है.इसकी एक वजह कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक जमीन है. उत्तर प्रदेश में जिन इलाकों में आज समाजवादी पार्टी मजबूत दिखाई देती है, उनमें से कई क्षेत्र कभी कांग्रेस का मजबूत आधार हुआ करते थे. खासकर वे सीटें, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या निर्णायक मानी जाती है.
कांग्रेस की रणनीति यह संकेत देती है कि अगर उसे उत्तर प्रदेश में दोबारा मजबूत होना है तो उसे सबसे पहले अपने पुराने सामाजिक आधार को वापस हासिल करना होगा. ऐसे में पार्टी उसी सामाजिक और राजनीतिक स्पेस में दोबारा जगह बनाने की कोशिश कर रही है.
इसके पीछे 2024 लोकसभा चुनाव का परिणाम भी बड़ी वजह माना जा सकता है. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में छह सीटें जीतीं. कई अन्य सीटों पर भी उसका प्रदर्शन पहले की तुलना में बेहतर रहा. इससे पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ा है. कांग्रेस अब खुलकर यह दावा कर रही है कि लोकसभा चुनाव में विपक्ष को मिली सफलता में उसकी भी बड़ी भूमिका थी. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी मानती है कि जीत का आधार उसका संगठन और उसका वोट बैंक था. यही कारण है कि कांग्रेस अब खुद को सिर्फ गठबंधन की छोटी सहयोगी पार्टी के रूप में पेश नहीं करना चाहती.
अगर आने वाले महीनों में दोनों दलों के बीच मनमुटाव बढ़ता है और सीट बंटवारे पर सहमति नहीं बनती, तो कांग्रेस का यह 170 सीटों वाला मिशन सीधे समाजवादी पार्टी के वोट बैंक और संगठन को चुनौती देगा. ऐसी स्थिति में कई विधानसभा सीटों पर मुकाबला बीजेपी बनाम सपा नहीं, बल्कि बीजेपी बनाम सपा बनाम कांग्रेस का रूप ले सकता है. कांग्रेस जिन क्षेत्रों में संगठन मजबूत करेगी, वहां उसके कार्यकर्ता स्वाभाविक रूप से अपनी पार्टी के लिए पूरी ताकत लगाएंगे. वहीं समाजवादी पार्टी भी उन्हीं सीटों को आसानी से छोड़ने के लिए तैयार नहीं होगी.
इसका एक दूसरा असर भी हो सकता है. लगातार बढ़ रही बयानबाजी दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच दूरी बढ़ा सकती है. यदि कार्यकर्ताओं का यह टकराव जमीन पर भी दिखाई देता है, तो कई सीटों पर विपक्षी वोटों का बिखराव संभव है. यही वजह है कि कांग्रेस की 170 सीटों वाली तैयारी सिर्फ संगठन विस्तार की योजना नहीं, बल्कि 2027 की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक चालों में से एक मानी जा रही है.
अब देखना यह होगा कि चुनाव नजदीक आने तक यह रणनीति सीट बंटवारे में कांग्रेस की ताकत बढ़ाती है या फिर विपक्ष के भीतर ऐसी प्रतिस्पर्धा पैदा करती है, जिसका सबसे बड़ा फायदा तीसरे पक्ष को मिल जाए.
(लेखक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में वकील हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)