उत्तर प्रदेश
मार्च 2017 के बाद उत्तर प्रदेश सरकार में जब योगी की सरकार बनी तो अपराध और माफिया के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को कानून-व्यवस्था की प्रमुख पहचान बनाया गया.
लेखक- भावेष पांडेय
माफिया अतीक अहमद के बेटे आबान की हाल में सड़क दुर्घटना में हुई मौत के बाद सोशल मीडिया पर अतीक और उसके परिवार से जुड़े पुराने वीडियो और ऑडियो फिर चर्चा में हैं. इन ऑडियो में अतीक लोगों को धमकाते, फिरौती मांगते और जान से मारने की धमकी देते सुनाई दे रहा है. उसके बेटे के भी ऐसे कई ऑडियो सामने आए हैं, जिनमें रंगदारी मांगने की आवाज सुनाई देती है.
अतीक का दौर भले ही खत्म हो चुका हो, लेकिन ये ऑडियो उत्तर प्रदेश के उस पुराने दौर की याद जरूर दिलाते हैं, जब अपराध सिर्फ अपराध नहीं रह गया था. अपराध के साथ ताकत, राजनीति और प्रभाव का ऐसा तंत्र जुड़ गया था, जिसने आम आदमी के मन में कानून से ज्यादा अपराधी के प्रभाव का डर पैदा कर दिया था.
उत्तर प्रदेश में एक समय रंगदारी, फिरौती, जमीन पर कब्जा और धमकी जैसे शब्द आम लोगों की बातचीत का हिस्सा बन गए थे. व्यापारी हो, डॉक्टर हो, कारोबारी हो या जमीन का मालिक- किसी प्रभावशाली अपराधी की नजर पड़ते ही उसके सामने सबसे बड़ा सवाल अपनी सुरक्षा का होता था. लेकिन डर सिर्फ अपराधी का नहीं था. सबसे बड़ा सवाल यह होता था कि उस अपराधी के पीछे कौन खड़ा है.
यही वह दौर था, जब कई बाहुबली अपराध और राजनीति दोनों में प्रभावशाली बने रहे. हत्या, अपहरण, रंगदारी और जमीन कब्जाने जैसे गंभीर मामलों में नाम आने के बावजूद उनकी राजनीतिक ताकत कम नहीं होती थी.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक अपराध और राजनीतिक संरक्षण के रिश्ते पर सवाल उठते रहे. मुख्तार अंसारी से लेकर अतीक अहमद तक, कई ऐसे नाम रहे जिनका प्रभाव सिर्फ अपराध की दुनिया तक सीमित नहीं था.
जेल में रहने के बावजूद आपराधिक नेटवर्क सक्रिय रहने की कहानियां सामने आती रहीं. मुख्तार अंसारी को लेकर भी लंबे समय तक यह चर्चा रही कि जेल के भीतर रहते हुए भी उसका प्रभाव और नेटवर्क कमजोर नहीं पड़ा. बड़े नेताओं और अधिकारियों से उसके संबंधों की चर्चाएं होती रहीं और जेल की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठते रहे.
अतीक अहमद का राजनीतिक सफर इसी विरोधाभास की बड़ी मिसाल रहा. उसके खिलाफ हत्या, अपहरण और जबरन वसूली समेत कई आपराधिक मामले दर्ज रहे, लेकिन इसके बावजूद राजनीति में उसका प्रभाव बना रहा. यही वह राजनीतिक संस्कृति थी, जिसने आम आदमी के मन में यह धारणा मजबूत की कि कानून की ताकत से ज्यादा ताकत किसी प्रभावशाली व्यक्ति के नाम और पहुंच में हो सकती है.
उस दौर में रंगदारी का मतलब सिर्फ किसी से पैसे मांग लेना नहीं था. इसके पीछे एक पूरा सिस्टम काम करता था। पहले फोन आता था. फिर धमकी दी जाती थी. उसके बाद दबाव बनाया जाता था. रकम मांगी जाती थी. और विरोध करने पर परिवार तक को निशाना बनाने की धमकी दी जाती थी.
किसी कारोबारी को फोन, किसी डॉक्टर को धमकी, किसी जमीन मालिक पर कब्जे का दबाव- ऐसी घटनाओं ने अपराध को एक ऐसे नेटवर्क का रूप दे दिया था, जिसमें डर खुद एक हथियार बन गया था. और अगर अपराधी जेल चला गया तो भी जरूरी नहीं था कि उसका नेटवर्क खत्म हो जाए. यही सबसे बड़ी चुनौती थी. समस्या सिर्फ अपराधी के बाहर रहने की नहीं थी, बल्कि अपराध के उस नेटवर्क की थी जो व्यवस्था के भीतर तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश करता था.
मार्च 2017 के बाद उत्तर प्रदेश सरकार में जब योगी की सरकार बनी तो अपराध और माफिया के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को कानून-व्यवस्था की प्रमुख पहचान बनाया गया. कार्रवाई सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रही. गैंगस्टर एक्ट, संपत्ति जब्ती और पुलिस अभियानों के जरिए संगठित अपराध के आर्थिक आधार पर भी कार्रवाई की गई. सरकार की इस नीति का घोषित संदेश साफ है अपराध करके कानून से बच निकलने का रास्ता आसान नहीं होगा.
इसका मतलब यह नहीं है कि आज उत्तर प्रदेश में अपराध खत्म हो गया है. अपराध आज भी होते हैं और कानून-व्यवस्था की चुनौतियां भी बनी हुई हैं. लेकिन फर्क उस माहौल का है जिसमें अपराध होता है. पुराने दौर में बड़े अपराधियों का नाम ही कई बार डर पैदा करने के लिए काफी होता था. उनके प्रभाव, राजनीतिक पहुंच और आपराधिक नेटवर्क की चर्चा आम थी. आज सरकार का जोर ऐसे नेटवर्क को तोड़ने, अपराधियों की संपत्ति पर कार्रवाई करने और संगठित अपराध की आर्थिक ताकत को कमजोर करने पर है.
यही वजह है कि जब आज अतीक के पुराने ऑडियो वायरल होते हैं तो वे सिर्फ एक पुराने अपराधी की आवाज नहीं लगते. वे लोगों को उस दौर की याद दिलाते हैं, जब फोन पर धमकी देना और रंगदारी मांगना कई लोगों के लिए किसी असामान्य घटना जैसा नहीं रह गया था.
अतीक अहमद का नाम सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वह एक बड़ा अपराधी था. उसका नाम उत्तर प्रदेश में अपराध और राजनीति के उस रिश्ते का भी प्रतीक बन गया, जिस पर वर्षों तक बहस होती रही. उसके पुराने ऑडियो का फिर सामने आना इसी पुराने दौर की याद को ताजा करता है कि कैसे यूपी में एक समय संगठित अपराध था. अपराध का एक नेटवर्क चलता था. लेकिन योगी सरकार ने इस तंत्र को ही खत्म कर दिया.
पहले के समय में यूपी में अपराधी चर्चा में रहने के लिए हत्या, रंगदारी करते थे, ताकि उनका वर्चस्व बना रहे, लोग उन्हें जानें. उनका दबदबा महसूस करें. लेकिन आज योगी सरकार में अपराधी या बाहुबली इसी जुगत में लगे रहते हैं कि वो कहीं से भी सरकार की नजर में न आएं. यही सबसे बड़ा अंतर है पिछली सरकारों और आज की योगी सरकार में.
(लेखक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में वकील हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)