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भगवान विष्णु को क्यों प्रिय हैं तुलसी, बिना तुसली के अधूरी मानी जाती है श्री हरि की पूजा और भोग, जानें पूरी कहानी

भगवान विष्णु के पूजा अर्चना से लेकर प्रसाद में तुलसी को जरूर शामिल किया जाता है. बिना तुलसी दल के श्रहरि भोग प्रसाद ग्रहण नहीं करते. 

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भगवान विष्णु को क्यों प्रिय हैं तुलसी, बिना तुसली के अधूरी मानी जाती है श्री हरि की पूजा और भोग, जानें पूरी कहानी
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Tulsi Importance And Relation With Lord Vishnu: हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे का विशेष महत्व होता है. यही वजह है कि ज्यादातर घरों में तुलसी का पौधा जरूर होता है. इसमें मां लक्ष्मी का वास माना जाता है. घर में तुलसी के पौधे को रखने के साथ ही इसकी पूजा अर्चना करने से बरकत बढ़ती है. सुख शांति का संचार होता है. वहीं भगवान विष्णु के पूजा अर्चना से लेकर प्रसाद में तुलसी को जरूर शामिल किया जाता है. बिना तुलसी दल के श्रहरि भोग प्रसाद ग्रहण नहीं करते. आइए जानते हैं इसकी वजह तुलसी का महत्व और क्यों बिना तुलसी के अधूरे माने जाते हैं श्री हरि...

इसलिए भगवान भगवान विष्णु को चढ़ाते हैं तुलसी दल

दरअसल जिस तरह पंचतत्व में आकाश तत्व के स्वामी विष्णु भगवान माने जाते हैं. उसी तरह अग्नि तत्व की स्वामिनी मां दुर्गा और धरती तत्व के भगवान शिव हैं. इसी तरह भगवान विष्णु को सत्त गुण, दुर्गा को रजोगुण और शिव को तमोगुण का अधिष्ठाता माना गया है. इसी आधार से तुलसी में सतोगुण की अधिकता होती है. तुलसी न केवल पवित्र वनस्पति है, बल्कि उसमें सतो गुण अत्यधिक होते हैं. इसमें मां लक्ष्मी का वास और विष्णु की प्यारी होती है. 

हेल्थ के लिए भी फायदेमंद होती है तुलसी

तुलसी न सिर्फ वातावरण को शुद्ध करती है. यह व्यक्ति के शरीर को स्वस्थ रखने और बीमारियों से लड़ने में भी मदद करती है. उन्हें बीमारियों से बचाती है. यह आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होती है. इसका सेवन करने मात्र से व्यक्ति में कई बीमारियों का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है. 

भगवान विष्णु के पूजन में जरूरी है तुलसी

भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी जरूरी मानी गई है. भगवान विष्णु को अन्न, फल, या कोई भी भोग तुलसी दल के बिना अर्पित किया जाए, तो वह उसे भगवान स्वीकार नहीं करते. तुलसी दल भोग को पवित्र बनाने के साथ ही विष्णु प्रेम की अभिव्यक्ति भी करता है. जब भी व्यक्ति मरणासन्न अवस्था में तुलसी दल दिया जाता है. इसमें व्यक्ति की आत्मा का वास वैकुंठ में प्राप्त होता है. स्कंद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में भी वर्णिन किया गया है. 
 

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