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दिन में हवन तो रात में क्यों किया जाता है विवाह, जानें शादी की परंपरा से लेकर देर रात फेरे होने की वजह

शादी में अनुष्ठान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हवन है, जिसकी परिक्रमा लगाकर दूल्हा और दुल्हन सात फेरे लेते हैं, लेकिन हिंदू धर्म में हवन दिन में किया जाता है. 

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दिन में हवन तो रात में क्यों किया जाता है विवाह, जानें शादी की परंपरा से लेकर देर रात फेरे होने की वजह
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हिंदू विवाह को केवल दो लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच एक पवित्र मिलन माना जाता है. इस अनुष्ठान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा "हवन" है, जिसकी परिक्रमा लगाकर दूल्हा और दुल्हन सात फेरे लेते हैं. हिंदू धर्म में, हवन दिन में करने का विधान है, क्योंकि रात्रि में हवन वर्जित माना जाता है. शास्त्रों में कहा गया है कि हवन दिन में, सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले किया जाना चाहिए. फिर भी, विडंबना यह है कि अधिकांश शादियां रात्रि में ही होती हैं. जानें इसकी वजह...

शास्त्रों में रात्रि हवन करना क्यों वर्जित है

धार्मिक ग्रंथों में रात्रि को अंधकार और नकारात्मक ऊर्जा का समय माना गया है. इस दौरान तंत्र-मंत्र और भूत-प्रेत की साधनाएं भी होती हैं. इस दौरान बुरी शक्तियां बहुत ज्यादा शक्तिशाली हो जाती हैं. इसलिए, सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा का लाभ उठाने के लिए यज्ञ और हवन जैसे शुभ कार्य दिन के उजाले में करना सर्वोत्तम माना जाता है. शास्त्रों में बताया गया है कि तांत्रिकों और अघोरियों के लिए रात्रि अपने देवताओं को प्रसन्न करने का समय है. हालांकि, गृहस्थों के लिए ईश्वर से संबंधित शुभ कार्य दिन में करने का सुझाव दिया गया है.

ब्रह्म मुहूर्त का महत्व 

धार्मिक विद्वानों के अनुसार, नई पीढ़ी के लिए यह तथ्य समझना थोड़ा कठिन हो सकता है, लेकिन शास्त्रों में ब्रह्म मुहूर्त को आध्यात्मिक और शुभ ऊर्जा से भरपूर बताया गया है. यही कारण है कि प्राचीन काल में विवाह और अन्य संस्कार प्रातःकाल या सूर्यास्त के समय संपन्न किए जाते थे.

ध्रुव तारा और चंद्रमा का साक्षी   

रात्रि विवाह के बारे में एक और मान्यता यह है कि ध्रुव नक्षत्र और चंद्रमा को साक्षी मानकर विवाह करना शुभ माना जाता है. सात फेरों के दौरान, नवविवाहितों को सप्तर्षि नक्षत्र और ध्रुव नक्षत्र दिखाएं जाते हैं. ध्रुव नक्षत्र स्थिरता का प्रतीक है, इसलिए जोड़े को इसका स्वरूप दिखाया जाता है. यह केवल रात्रि में ही दिखाई देता है, इसलिए रात्रि का शुभ समय चुना गया ताकि यह विवाह का प्रत्यक्ष साक्षी बन सके. वहीं, रात्रि में चंद्रमा और शुक्र का होना प्रेम और कोमलता का संकेत देता है.

रात्रि विवाह की परंपरा मुगल काल में शुरू हुई

रात्रि विवाह की परंपरा के पीछे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कारण है. इतिहासकारों के अनुसार, मुगल काल में दिन में विवाह करना असुरक्षित हो गया था. आक्रमणकारियों के डर से, हिंदू परिवारों ने अंधेरे में चुपचाप विवाह समारोह संपन्न करना शुरू कर दिया. यह एक सामाजिक सुरक्षा उपाय था, जो धीरे-धीरे एक परंपरा बन गया.

उत्तर और दक्षिण भारत की परंपराओं में अंतर

दक्षिण भारतीय राज्यों केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में दिन में होने वाली शादियों को आज भी शुभ माना जाता है. उत्तर भारत में, रात में होने वाली शादियाँ एक सामाजिक परंपरा बन गई हैं. समय के साथ, यह रिवाज लोगों के जीवन में रच-बस गया है.

समय बदलता है, लेकिन परंपरा जारी रहती है

रात्रि में हवन करने की प्रथा के अभाव के बावजूद, विवाह जैसे शुभ संस्कार रात्रि में संपन्न करने की प्रथा एक दुर्लभ उदाहरण है. हिंदू धर्म में रात्रि में विवाह करना दर्शाता है कि सामाजिक परिस्थितियों ने धार्मिक प्रथाओं को कैसे बदल दिया है. आज ज्योतिष और धर्म, दोनों ही मानते हैं कि सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय नहीं, बल्कि शुभ मुहूर्त है.

Disclaimer: यह ज्योतिष की गणना और मान्यताओं पर आधारित है. डीएनए इसकी जिम्मेदारी या पुष्टी नहीं करता है.

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