धर्म
काल भैरव का जन्म मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को हुआ था, इसलिए इसी दिन काल भैरव जयंती मनाई जाती है. मान्यता है कि काल भैरव की पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है. काल भैरव जयंती कब है और काशी के कोतवाल किससे अवतार माने गए हैं चलिए जानें.
मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान शिव के रौद्र रूप कालभैरव का जन्म हुआ था. हर साल इसी दिन कालभैरव जयंती मनाई जाती है. कालभैरव की पूजा करने से सभी नकारात्मकता दूर होती है. तंत्र और मंत्र सिद्धि के लिए भी इनकी पूजा की जाती है. ग्रह क्लेशों से मुक्ति पाने के लिए भी कालभैरव की पूजा की जाती है. कालभैरव जयंती पर व्रत और पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय कम होता है. रोग-दोष भी दूर होते हैं. जानें कब है कालभैरव जयंती, पूजा का मुहूर्त
कालभैरव जयंती कब है?
पंचांग के अनुसार, काल भैरव जयंती मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी तिथि मंगलवार, 11 नवंबर को रात्रि 11 बजकर 8 मिनट पर प्रारंभ होगी. यह तिथि 12 नवंबर को रात्रि 10 बजकर 58 मिनट तक रहेगी. ऐसे में काल भैरव जयंती बुधवार, 12 नवंबर को मनाई जाएगी.
साथ ही, इस दिन दो शुभ योग भी बन रहे हैं. कालभैरव जयंती पर शुक्ल और ब्रह्म योग बन रहे हैं. शुक्ल योग सुबह 8 बजकर 2 मिनट तक रहेगा. उसके बाद ब्रह्म योग शुरू होगा, जो पूरी रात रहेगा. साथ ही, उस दिन सुबह से शाम 6 बजकर 35 मिनट तक आश्लेषा नक्षत्र रहेगा. उसके बाद मघा नक्षत्र शुरू हो जाएगा.
पूजा का शुभ मुहूर्त
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दौरान आप दिन में काल भैरव की पूजा कर सकते हैं. पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6.41 बजे से 9.23 बजे तक है, जबकि सुबह 10.44 बजे से दोपहर 12.5 बजे तक भी पूजा का शुभ मुहूर्त रहेगा. काल भैरव जयंती पर निशिता पूजा का महत्व है, जिसमें तंत्र-मंत्र की साधना की जाती है. काल भैरव जयंती का निशिता मुहूर्त रात 11:39 बजे से 12:32 बजे तक रहेगा.
कालभैरव जयंती के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4.56 से 5.49 बजे तक रहेगा. उस दिन अभिजित मुहूर्त नहीं होगा. इस समय राहु काल दोपहर 12.5 बजे से 1.26 बजे तक रहेगा.
काल भैरव की उत्पत्ति कैसे हुई?
स्कंद पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा अहंकार में आकर भगवान शिव का अपमान करने लगे. इससे ब्रह्मा क्रोधित हो गए और उनका चौथा सिर जल गया. इसके बाद भगवान शिव ने कालभैरव की रचना की और वह शिवजी के रौद्र अवतार माने जाते हैं और शिव के आदेश पर, कालभैरव ने ब्रह्मा का चौथा सिर काट दिया.
इस कारण उन पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया. इस पाप से मुक्ति पाने के लिए कालभैरव शिव की नगरी काशी गए. वहां उन्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिल गई. इसके बाद कालभैरव हमेशा के लिए काशी में ही रहने लगे.
कालभैरव जयंती का महत्व
कालभैरव को काशी का कोतवाल भी कहा जाता है. इस दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व है. मान्यता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से सभी भय, शत्रु और बाधाएं दूर हो जाती हैं. इसके अलावा, जिन लोगों की कुंडली में राहु-केतु या शनि दोष हो, उनके लिए भी इस दिन भैरव की पूजा करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है. तंत्र-मंत्र साधना के लिए भी इस तिथि का विशेष महत्व है.
Disclaimer: यह ज्योतिष की गणना और मान्यताओं पर आधारित है. डीएनए इसकी जिम्मेदारी या पुष्टी नहीं करता है.
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