धर्म
आज विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री का व्रत रख रही हैं. सनातन धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है. इस दिन विवाहित महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा कर कच्चा धागा क्यों बांधती, चलिए इस व्रत कथा के साथ जानें.
वट सावित्री का व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाया जाता है. इस व्रत को करने से विवाहित महिलाओं को शाश्वत वैवाहिक सुख प्राप्त होता है. हिंदू धर्म में बरगद के पेड़ को त्रिदेवों का प्रतीक माना जाता है और वट सावित्री व्रत पर इसकी पूजा का विशेष महत्व है. साथ ही पति-पत्नी के बीच संबंध भी मधुर बनते हैं. इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा करने का विशेष महत्व है. पूजा के दौरान विवाहित महिलाएं पेड़ पर कच्चा धागा बांधती हैं. जानिए वट सावित्री पर बरगद के पेड़ पर क्यों लपेटा जाता है कच्चा धागा और क्या इस व्रत की कथा.
वट सावित्री व्रत शुभ मुहूर्त
ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि 26 मई को सुबह 12.11 बजे शुरू होगी. वहीं, यह तिथि 27 मई को सुबह 8 बजकर 31 मिनट पर समाप्त होगी. ऐसे में वट सावित्री व्रत 26 मई, सोमवार को मनाया जाएगा.
पूजा विधि
वट सावित्री के दिन महिलाएं सुबह स्नान कर पूर्ण श्रृंगार करती हैं और बिना कुछ खाए-पिए कठोर व्रत रखती हैं. वह बरगद के पेड़ के पास जाती है और विधि-विधान से उसकी पूजा करती है. पूजा के दौरान कच्चे दगा को बरगद के पेड़ के तने के चारों ओर सात बार लपेटा जाता है. यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और हर विवाहित महिला पूरी आस्था और भक्ति के साथ इसका पालन करती है.
वट सावित्री के दिन बरगद के पेड़ को धागा क्यों लपेटा जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट सावित्री व्रत के दिन बरगद के पेड़ की पूजा करने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है. इसके अलावा व्रत रखने वाली महिलाएं बरगद के पेड़ की सात बार परिक्रमा भी करती हैं. इसके अलावा बरगद के पेड़ के चारों ओर सात बार कच्चा धागा भी लपेटा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि बरगद के पेड़ के चारों ओर कच्ची रस्सी सात बार लपेटने से पति-पत्नी का रिश्ता सात जन्मों तक कायम रहता है. बरगद के पेड़ पर कच्ची रस्सी बांधने से पति के सभी संकट दूर होते हैं तथा दाम्पत्य जीवन में सुख, शांति और मधुरता आती है.
बरगद के पेड़ की पूजा का महत्व
कथा के अनुसार, यमराज ने एक बरगद के पेड़ के नीचे माता सावित्री के पति सत्यवान के जीवन को बहाल किया था और उन्हें 100 पुत्रों का आशीर्वाद दिया था. कहा जाता है कि तभी से वट सावित्री व्रत और बरगद के पेड़ की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई. ऐसा माना जाता है कि वट सावित्री व्रत के दिन बरगद के पेड़ की पूजा करने से यम सहित त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है. ऐसा माना जाता है कि बरगद के पेड़ में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) निवास करते हैं.
यहां पढ़ें वट सावित्री व्रत कथा
भद्रदेश नामक राज्य में अश्वपत नाम के राजा और उनकी रानी मालवती के घर एक सुंदर और तेजस्वी कन्या का जन्म हुआ था और उस कन्या का नाम सावित्री रखा गया था. वह बुद्धिमान, धर्मपरायण और सुंदर थी. जब सावित्री विवाह योग्य हुई तो पिता ने साविक्षी को खुद वर चुनने की अनुमति दी.
तब सावित्री ने सत्यवान नामक एक राजकुमार को अपना वर चुना. सत्यवान एक वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे, जो किसी कारणवश अपना राज्य खो चुके थे और वन में रहते थे. लेकिन एक बात जिसने सबको चिंतित कर दिया वह यह थी कि एक भविष्यवाणी के अनुसार सत्यवान की मृत्यु एक साल के भीतर हो जाएगी. लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही और सत्यवान से विवाह कर लिया.
विवाह के बाद सावित्री अपने पति और सास-ससुर के साथ वन में रहने लगी. वह बहुत सेवा भाव से सबका ध्यान रखती थी. जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होनी थी, उस दिन सावित्री ने व्रत रखा और वट वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा की. जब सत्यवान लकड़ियां काटने जंगल गया, तो सावित्री भी उसके साथ गई. थोड़ी देर बाद सत्यवान के सिर में दर्द हुआ और वह सावित्री की गोद में लेट गया. तभी यमराज, मृत्यु के देवता, उसकी आत्मा लेने आए.
सावित्री ने यमराज का पीछा किया और उनसे सत्यवान की आत्मा वापस देने की प्रार्थना की. यमराज ने कहा कि यह नियम के विरुद्ध है, लेकिन सावित्री की बुद्धिमानी, प्रेम और दृढ़ संकल्प देखकर वे प्रसन्न हो गए. उन्होंने सावित्री को तीन वर मांगने का अवसर दिया. सावित्री ने पहले अपने ससुर का राज्य वापस मांगा, फिर अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी, और अंत में अपने लिए सौ पुत्र मांगे.
यमराज ने बिना सोचे समझे वर दे दिए, लेकिन जब सावित्री ने सौ पुत्रों की बात कही तो यमराज को समझ आया कि बिना सत्यवान के यह संभव नहीं है. उन्होंने सावित्री की दृढ़ता को सराहा और सत्यवान को जीवनदान दे दिया. इस तरह सावित्री के प्रेम और तप से सत्यवान की मृत्यु टल गई. तभी से महिलाएं सावित्री की तरह अपने पति की लंबी उम्र के लिए वट सावित्री व्रत करती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं, जो दीर्घायु और अटल प्रेम का प्रतीक माना जाता है.
Disclaimer: हमारा लेख केवल जानकारी प्रदान करने के लिए है. ये जानकारी सामान्य रीतियों और मान्यताओं पर आधारित है.)
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