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Mysterious Goddess Temple: इस मंद‍िर की छत तोड़कर चली गईं मां चंडी, रहस्य से भरी है ये जगह

Devi Chandi Temple: मध्‍य प्रदेश के सागर में देवी चंडी का एक मंदिर ऐसा है, जहां से देवी छत तोड़कर चली गई हैं और मंदिर में कवेल पत्थर का फ्रेम बच गया है

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Mysterious Goddess Temple: इस मंद‍िर की छत तोड़कर चली गईं मां चंडी, रहस्य से भरी है ये जगह

इस मंद‍िर की छत तोड़कर कर चली गईं मां चंडी

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डीएनए हिंदीः देवी के चमत्कारिक मंदिरों के बारे में आपने तो बहुत सुना होगा लेकिन क्या आपको पता है कि मध्यप्रदेश के सागर जिले में देवी चंडी का एक मंदिर ऐसा है जहां देवी अब नहीं हैं? यही नहीं, यहां से देवी की प्रतिमा रातोरात गायब हो गई और केवल प्रतिमा के आकार को लिया एक पत्थर ही बचा है. 

जिले के मालथौन में मां चंडी का मंदिर रहस्यों से भरा माना जाता है, हालांकि देवी के जाने के बाद भी यहां लोग पूजा करते हैं जबकि यहां से सालों पहले प्रतिमा अचानक ही गायब हो गई थी.  इस प्रतिमा के गायब होने के पीछे कई कहान‍ियां प्रचलित हैं. नवरात्रि में आज भी दूर-दूर से लोग देवी के इस पत्थर का दर्शन करने अपनी मुरादों को लेकर यहां जरूर आते है. 

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उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा से लगे जंगलों के बीच स्थित मां चंडी मंदिर उत्तरप्रदेश के नाराहट से यह स्थान दो किलोमीटर दूर दौलतपुर गांव के पास है तो वहीं एक अन्य रास्ता मध्य प्रदेश के सागर जिले के मालथौन के अटा गांव से होकर पहुंचता है. 
बता दें कि मंदिर में जहां कभी देवी की प्रतिमा थी अब वहा केवल मूर्ति का फ्रेम ही दिखाई देता है. जिसमें चारों ओर अस्त्र-शस्त्र हैं लेकिन मुख्य स्वरूप की प्रतिमा नहीं है. एक तरह से माता के निराकार दर्शन करने श्रद्धालु पहुंचते जरूर हैं.

कहीं सिर तो कहीं धड़ की होती है पूजा
बताया जाता है कि यहां से गायब हुई प्रतिमा के तार चंदेरी तक जुड़े हुए हैं. कहीं धड़ तो कहीं माता के सिर की पूजा होती है. मान्यता के अनुसार मां चंडी अपने मढ़ की छत तोड़कर चंदेरी मध्य प्रदेश के पर्वत की तलहटी में पहुंच गई थीं, जहां उन्हें जागेश्वरी माता के नाम से जाना जाता है. लेकिन लोगों की आस्था इस क्षेत्र से सैकड़ों साल से बनी हुई है.  यहां चंदेल कालीन मूर्तियां, मंदिर के स्तंभों दरवाजे के नाले में बिखरे अवशेष सैकड़ों साल के इतिहास की गवाही देते हैं.

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इस क्षेत्र को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित स्मारक घोषित किया है. ऐतिहासिक महत्व की बात करें तो यहां विशेषज्ञ बताते हैं कि यहां आल्हा-ऊदल की कचहरी लगा करती थी, इस लिहाज से यह बुंदेलखंड के प्रमुख स्थानों में शामिल हो जाता है. वहीं, यहां घाटी में पड़े प्राचीन आस्था केंद्रों के अवशेष मूर्तिकाला का सौंदर्य चंदेल काल को दर्शाते हैं इसे लेकर शोधकार्य भी जारी है.

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रहस्यों से भरा है यह स्थान
इस स्थान के विषय में कहा जाता है कि यह तंत्र साधना और दैवीय महत्व का विशेष स्थल है. यहां सैकड़ों वर्ष पुरानी षोडश मात्रिका व गणेश प्रतिमाएं घाटी में पड़ी हुई हैं. वहीं, घाटी के ऊपर एक मंदिर नुमा प्राचीन भवन है जिसके द्वार पर गणेश या भैरव नहीं बल्कि भगवान शंकर की आकृति उकेरी हुई है. लगभग सभी मूर्तियां सांकेतिक रूप से खंडित हैं.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. डीएनए हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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