धर्म
Devi Kaushiki: देवी कौशिकी ने अपने पति को बचाने के लिए सूर्य देवता को भी उदय होने से रोक दिया था, जानिए पतिव्रता देवी कौशिकी की कथा
डीएनए हिंदी: पद्मपुराण में पतिव्रता देवी कौशिकी की (Devi Kaushiki) कथा का वर्णन विस्तार से किया गया है. देवी कौशिकी एक ऐसी नारी थीं जिनके प्रताप के आगे देवताओं को भी झुकना पड़ा. उनके श्राप से सूर्य (Surya Dev) की गति रुक गई. जिस सूर्य के आगे किसी भी देवी-देवता का तेज फीका पड़ जाए, उस सूर्य का तेज एक स्त्री के सामने मंद पड़ गया. उन्होंने कोढ़ से ग्रसित अपने पति की सेवा में पूरा जीवन व्यतीत कर दिया और सदैव उनकी आज्ञा का पालन किया.
लेकिन जब देवी कौशिकी के पति को मांडव ऋषि (Mandav Rishi) का श्राप लगा तो उन्होंने यमराज (Yamraj) को भी धर्मसंकट में डाल दिया और सूर्य देवता को उदय होने से रोक दिया था. आइए जानते हैं देवी कौशिकी (Story Of Devi Kaushiki) की इस कथा के बारे में.
जब कौशिकी को ऋषि ने दिया श्राप
प्रचलित कथा के अनुसार प्रतिष्ठानपुर नगर में कौशिक नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जो कोढ़ से पीड़ित था. कौशिक के सभी रिश्तेदार उसे छोड़कर चले गए. लेकिन उनकी पत्नी कौशिकी जीवन भर उनकी सेवा में लगी रही. एक रात कौशिकी अपने पति को कंधे पर उठाकर कहीं जा रही थी. रास्ते में मांडव ऋषि अपने शूल पर बैठकर तपस्या कर रहे थे. ऐसे में अंधेरे की वजह से कौशिकी मांडव ऋषि को देख नहीं पाई, जिसकी वजह से कौशिक का पैर ऋषि के शूल से टकरा गया.
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कौशिकी ने ऋषि से हाथ जोड़कर क्षमा मांगी और कहा ऋषि देव हमसे भूल हो गई कृपया हमें माफ करें. लेकिन तपस्या भंग होने की वजह से ऋषि मांडव को क्रोध आया और उन्होंने कौशिकी को श्राप दिया कि सूर्योदय होते ही वह विधवा हो जाएगी.
राजगुरु ने कहा अटल है मांडव ऋषि का श्राप
ऋषि के श्राप के बाद अपने पति को लेकर जैसे तैसे घर पहुंची. सूर्योदय होने में कुछ ही समय बाकी था ऐसे में कौशिकी राजा के दरबार पहुंची लेकिन राजा उस वक्त आराम कर रहे थे. ऐसे में राजा के पहरेदार ने उन्हें अगले दिन आने को कहा. जिसके बाद कौशिकी राजगुरु के पास गई. जब कौशिकी ने राजगुरू को सारी बात बताई तब उन्होंने कहा कि इस संसार में ऐसा कोई भी नहीं है जो मांडव ऋषि के श्राप को निष्फल कर सके. उन्होंने कहा उनका श्राप अटल है, उन्होंने जो बोला वह होकर रहेगा.
नारद मुनि ने यमराज को दी प्राण लेने की सलाह
उधर यमराज भी इस धर्म संकट में फस गए थे, क्योंकि विधि के अनुसार कौशिक के प्राण लेने का समय अभी नहीं हुआ था. लेकिन अगर वे प्राण न लेते तो मांडव ऋषि का श्राप विफल हो जाता. ऐसे में एक ऋषि का वचन अगर मिथ्या हो गया तो यज्ञ नहीं होगा. यज्ञ न होने का अर्थ है भगवान की पूजा और भक्ति न होना. नारद मुनि ने यमराज को यह समझाते हुए कहा कि मांडव ऋषि के श्राप का आदर करते हुए आपको सूर्योदय तक कौशिक के प्राण हर लेने चाहिए.
कौशिकी ने मंदिर में माता से की विनती
कौशिकी रोते हुए मां के दरबार पहुंचती है और देवी के सामने विनती करने लगती है. वह देवी के प्रतिमा के आगे रोते हुए कहती है कि हे मां मैं अब हार गई हूं, थक गई हूं लोगों के सामने विनती करके. मुझ निर्दोष को श्राप मिला है. तभी आकाशवाणी होती है कि जो अपनी रक्षा खुद नहीं करते उनकी रक्षा कोई नहीं करता, तुम इतनी कमजोर नहीं हो सकती. क्योंकि तुम सती हो कोई अबला नहीं. तुम नारी शक्ति हो.
ब्रह्मा जी द्वारा दिये गए इस जीवन का तुमने सदुपयोग किया है इसलिए तुम अब एक शक्ति बन गई हो. जो तुम चाहो वो हो सकता है. तभी कौशिकी कहती हैं क्या मेरे कहने पर सूर्योदय भी नहीं होगा? जवाब मिलता है 'हां' अगर तुम चाहो तो सूर्योदय कभी नहीं होगा. यह सुन कौशिकी खुश हो जाती है और वापस अपने पति के पास चली जाती है.
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कौशिकी के वचन से नहीं होता सूर्योदय
कौशिकी जब घर पहुंचती है तो उसे वहां यमराज दिखाई देते हैं. वह सूर्योदय होने का इंतजार कर रहे थे ताकि ऋषि मांडव के श्राप को पूरा कर सकें. ऐसे में कौशिकी ने कमंडल से जल लेकर आठो दिशाओं और सभी भगवान और प्रकृति को साक्षी मानकर कहती है 'यदि वो सती है और उसमे थोड़ी भी सतित्वा है तो सूर्य उदय कभी न हो'
कौशिकी के इतना कहते ही चारो ओर अंधेरा छा गया, आसमान में बिजलियां चमकने लगीं, हर तरफ हाहाकार मच गया, धरती हिलने लगी, इंद्र का आसान डोलने लगा, सारे दैत्य दानव, ऋषि मुनि, देवी देवता भयभीत हो गए. सूर्योदय नहीं हुआ.
सभी देवी-देवता ने त्रिदेव से रक्षा की लगाई गुहार
सभी देवी देवता और यमराज त्रिदेव के पास पहुंचे, यमराज ने कहा प्रभु सूर्योदय न होने की वजह से उनका सरा लेखा जोखा बिगड़ गया है. समय का ज्ञान न होने की वजह से तीनों लोको का काम रुक गया है. जिन्हें प्राण त्यागना था और जिन आत्माओं को जन्म लेना था वो जन्म नहीं ले पा रहे हैं. हमें इस संकट से बचाइए.
ब्रह्मा जी भी पूरी नहीं कर पाए कौशिकी की मांग
ब्रह्मा जी जब कौशिकी के पास पहुंचे तो वे भी कौशिकी की मांग को पूरी नहीं कर पाए. क्योंकि स्वयं ब्रह्मा जी भी मांडव ऋषि के श्राप अनादर नहीं कर सकते थे.
तब भगवान विष्णु समझ गए कि सती के श्राप को निष्फल कर पाना किसी के भी बस में नहीं है. एक सती के श्राप को केवल एक सती ही खत्म कर सकती है. इसलिए उन्होंने देवताओं को महर्षि अत्री कि पत्नी देवी अनुसुइया के पास जाने को कहा.
देवताओं ने देवी अनुसुइया से की विनती
सभी देवता माता अनुसुइया से मिले और उन्हें सारी व्यथा बताई. उन्होंने देवी से आग्रह किया कि उनके जैसी एक और सती हैं जिन्होंने सूर्य देवता को निकलने से रोक दिया है. इस संसार में केवल आप ही उन्हें अपना श्राप वापस लेने के लिए मना सकती हैं. यही एक रास्ता है जिससे इस संसार को बचाया जा सकता.
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देवी अनुसुइया ने दिया यह वचन
देवी अनुसुइया कौशिकी के पास पहुंची और उनसे श्राप वापस लेने को कहा, साथ ही उन्होंने कहा कि वे कौशिक के मृत्यु के बाद भी यमराज से उसे वापस ले आएंगी. पलभर में उसे जीवित कर देंगी. तुम सूर्योदय होने दो. कौशिकी बात मानकर श्राप वापस ले लेती हैं. जिसके बाद सूर्योदय हो जाता है.
देवी अनुसुइया ने श्राप बंधन से कर दिया मुक्त
सूर्योदय होते ही जब यमराज पुनः प्राण लेने के लिए आए तो देवी अनुसुइया ने उन्हें रोका और कहा कि आज के दिन कौशिक का प्राण हरण नहीं हो सकता क्योंकि उसकी मृत्यु का समय अभी नहीं है. तब यमराज ने कहा की देवी ऋषि के श्राप की वजह से कौशिक का प्राण हरण करना होगा अन्यथा ऋषि का श्राप मिथ्या हो जाएगा.
ऐसे में देवी अनुसुइया ने यमराज से कहा की वे अपने सतीत्व और बल से उन्हे मांडव ऋषि के श्राप बन्धन मुक्त कर रही हैं. जिससे अंततः कौशिक के प्राण बच गए और उन्होंने कौशिकी को दिया हुआ अपना वचन पूरा किया.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. डीएनए हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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