धर्म
नवरात्रि के पावन अवसर पर माता दुर्गा की आराधना करने का विशेष महत्व है. भक्तगण इन नौ दिनों में मां दुर्गा की आरती और चालीसा का पाठ कर अपने जीवन में शक्ति, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं.
आरती और चालीसा का पाठ नवरात्रि में केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और मानसिक संतुलन प्राप्त करने का एक माध्यम है. आरती के माध्यम से हम देवी दुर्गा को समर्पण भाव से आमंत्रित करते हैं, जिससे वातावरण में सकारात्मकता और ऊर्जा का प्रवाह होता है. वहीं दुर्गा चालीसा का पाठ हमें यह स्मरण कराता है कि देवी शक्ति, साहस और करुणा का स्वरूप हैं. यह नकारात्मक विचारों को दूर कर मन को स्थिर करता है और जीवन में आत्मविश्वास बढ़ाता है. नवरात्रि में आरती और चालीसा से भक्ति के साथ-साथ जीवन में शक्ति और शुभता का आशीर्वाद मिलता है.
🌸दुर्गा जी की आरती: ॐ जय अम्बे गौरी…🌸
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी .
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को .
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै .
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी .
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती .
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती .
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे .
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी .
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों .
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता,
भक्तन की दुख हरता . सुख संपति करता ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
भुजा चार अति शोभित, खडग खप्पर धारी .
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती .
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे .
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।।
🌸 दुर्गा चालीसा 🌸
॥ दोहा ॥
नित्यानन्द करुणा अम्बे, करुणामयी जय दुर्गे .
जय जगदम्बे दयामयी, जय जय माता भवानी ॥
॥ चौपाई ॥
नमो नमो दुर्गे सुख करनी .
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥
निराकार है ज्योति तुम्हारी .
तिहुँ लोक फैली उजियारी ॥
शशि ललाट मुख महा विशाल .
नेत्र लाल भृकुटि विकराल ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे .
दरश करत जन अति सुख पावे ॥
तुम संसार शक्ति लै कीना .
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला .
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
प्रलय काल सब नाशन हारी .
तुम गौरी शिव-शंकर प्यारी ॥
शिव योगी तुमरे गुण गावैं .
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावैं ॥
रूप सरस्वती को तुम धारा .
दे सबको ज्ञान प्रकाश हमारा ॥
रूप लक्ष्मी का तुमको माना .
धन-वैभव संपत्ति नित आना ॥
रूप तुम्हारा सभी जग जाने .
करो कृपा सबके दुःख टालें ॥
ध्यान धरे जो नर मन लाई .
पार पावै संकट से भाई ॥
जो यह पढ़े दुर्गा चालीसा .
होवे सिद्धि साखी गौरीसा ॥
॥ दोहा ॥
दुर्गा चालीसा जो कोई गावे .
सकल मनोरथ सिद्धि पावे ॥
जयति जयति जगदम्ब भवानी .
तुम सम हित कोई नहीं दानी ॥
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