Advertisement

Pitru Paksha 2022: पितृपक्ष का किस्सा जुड़ता है कर्ण से, मृत्यु के बाद 15 दिन के लिए धरती पर आए थे सूर्यपुत्र

महाभारत के समय मे कर्ण की मृत्यु के बाद देवराज इंद्र ने पितरों को भोजन कराने के लिए कर्ण को अनुमति दी तब से पितृपक्ष की शुरुआत हुई.यह है पूरा इतिहास

Pitru Paksha 2022: पितृपक्ष का किस्सा जुड़ता है  कर्ण से, मृत्यु के बाद 15 दिन के लिए धरती पर आए थे सूर्यपुत्र

दानवीर कर्ण से जुड़ा है पितृपक्ष का इतिहास

Add DNA as a Preferred Source

डीएनए हिंदीः पितृपक्ष के समय में लोग अपने पितरों को याद कर उनकी आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना करते हैं. इस (Pitru Paksha 2022) दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण जैसे महत्वपूर्ण कर्म किए जाते हैं. माना जाता है कि पितृपक्ष के दौरान पूर्वज अलग अलग रूप में धरती पर अपने परिवार के पास आते हैं और प्रसन्न होने पर परिवार को आशीर्वाद प्रदान करते हैं. पितृपक्ष (Pitru Paksha) का दिन पितरों को समर्पित होता है इस दौरान पितरों को पिंडदान, श्राद्ध व तर्पण करने की प्रथा सदियों से चली आ रही है. 

पितृपक्ष 15 दिनों तक चलता है यह भादप्रद की पूर्णिमा से शुरू हो कर कृष्ण पक्ष को अमावश्या को समाप्त होता है. इस दौरान 15 दिनों के लिए पूर्वज अन्न-जल ग्रहण करने पृथ्वी पर आते हैं. 

यह भी पढ़ेंः गया में पंचवेदी पर पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति के लिए सत्तू उड़ाना क्यों है जरूरी

दानवीर कर्ण से जुड़ा है पितृपक्ष का इतिहास 

महाभारत (Mahabaharata)  में युद्ध के दौरान जब दानवीर कर्ण  (Danveer Karn) की मृत्यु हो गई तब स्वर्ग में उन्हें भोजन के स्थान पर खाने के लिए सोना और आभूषण दिया गया. दानवीर कर्ण ने अपने जीवन मे बहुत दान किया था इसलिए कर्ण को दानवीर कर्ण कहा जाता है. स्वर्ग में भोजन के स्थान पर सोना व आभूषण देख कर्ण निराश हो गए और देवराज इंद्र से इसका कारण पूछा. देवराज इंद्र ने जवाब देते हुए कहा कि आपने अपने पूरे जीवन मे सिर्फ सोना और आभूषण दान किया लेकिन कभी आपने अपने पितरों को अन्न-जल दान नही किया इसलिए आपको भोजन में सोना और आभूषण ही दिया जा रहा है.

यह भी पढ़ेंः  गया में पिंडदान से पहले जरूर कर लें ये काम, वरना पूजा हो जाएगी बेकार

कर्ण ने कहा कि मैं अपने पूर्वजों के बारे में नही जानता इसलिए मैंने कभी पितरों को भोजन दान नही किया. यह सुनकर देवराज इंद्र ने कर्ण को 15 दिन के लिए पृथ्वी पर वापस जाने की अनुमति दी साथ ही अपने पूर्वजों को भोजन दान करने की आज्ञा दी तब से इस 15 दिन की अवधि को पितृपक्ष के रूप में पितरों को अन्न-जल दान करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाने लगा. 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. डीएनए हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता है.) 

देश-दुनिया की ताज़ा खबरों Latest News पर अलग नज़रिया, अब हिंदी में Hindi News पढ़ने के लिए फ़ॉलो करें डीएनए हिंदी को गूगल, फ़ेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर

Read More
Advertisement
Advertisement
Advertisement