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Neem Karoli Baba: लक्ष्मी नारायण शर्मा से कैसे कलियुग के हनुमान बने नीम करोली बाबा, किसने दिया उन्हें ये नाम

बाबा नीम करोली ने 11 सितंबर 1973 में अपने प्राण त्याग दिये थे. इसके लिए उन्होंने वृंदावन को चुना और यहां पर ही समाधि ली. यहां पर भी बाबा नीम करोली का मंदिर है.

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Neem Karoli Baba: लक्ष्मी नारायण शर्मा से कैसे कलियुग के हनुमान बने नीम करोली बाबा, किसने दिया उन्हें ये नाम
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आज की दुनिया में चमत्कार को नमस्कार है. ऐसे चमत्कार नीम करोली बाबा के आश्रम में माथा टेकने पर मिलते हैं. यहां इसकी वजह बाबा नीम करोली को हनुमान जी अवतार माना गया है. दुनिया में उन्हें अलग अलग नाम मिले, लेकिन जन्म के साथ उनकी पहचान लक्ष्मी नारायण शर्मा से मिली. यह उनका मूल नाम था. नीम करोरी बाबा की प्रसिद्धी केवल देश ही नहीं विदेशों में भी थी. लोग दूर-दूर से उनके दर्शनों के लिए पहुंचे थे. Neem Karoli बाबा की गिनती 20वीं सदी के महान संतों में की जाती है. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में हुआ था.

बचपन में इस नाम से जाने जाते थे बाबा?

श्रीमान दुर्गा प्रसाद शर्मा जी के घर जन्में नीम करोली बाबा को बचपन में लक्ष्मी नारायण शर्मा नाम से जाना जाता था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा अकबरपुर गांव में ही हुई थी. उम्र बढ़ने के साथ उनका झुकाव अध्यात्म की तरफ हुआ और उन्होंने अपनी जिंदगी को नई राह दी.

नीम करोली बाबा कैसे पड़ा नाम और रुकी हुई ट्रेन चलवाने की कहानी

बाबा को पहले लक्ष्मी नारायण शर्मा नाम से जाना जाता था. उन्होंने साल 1958 में घर छोड़ दिया था. बताया जाता है कि वह बिना टिकट एक ट्रेन में चढ़ गए थे.जब टीटी को पता चला तो उसने उन्हें नीम करोली गांव के पास ट्रेन से उतार दिया. बाबा के उतारने के बाद मानो ट्रेन जाम हो गई. वह आगे बढ़ी ही नहीं. कई कोशिशों के बाद भी जब काम नहीं बना तो किसी ने सलाह दी कि टीटी साधु को ट्रेन में वापस ले आए. शायद तब ही ट्रेन आगे बढ़े. लोगों की बात सुनकर टीटी उनके पास पहुंचा तो बाबा ने दो शर्तें रखीं...पहली ये कि नीम करोली गांव में रेलवे स्टेशन बनवाया जाए और दूसरी यह कि आज के बाद रेल में साधुओं के साथ अच्छा बर्ताव होगा. अधिकारियों ने बाबा की शर्तें मान लीं. बाबा जैसे ही ट्रेन में चढ़े ट्रेन ठीक हो गई, लेकिन ड्राइवर बाबा का आशीर्वाद लिए बिना आगे नहीं बढ़ना चाहते थे. उन्होंने बाबा को प्रणाम किया और फिर आगे बढ़े. कुछ समय बाद नीम करोली गांव में रेलवे स्टेशन बना. कुछ समय बाबा ने नीम करोली में भी बिताया था. वहीं के लोगों ने उन्हें यह नाम दिया जो कि उनका प्रसिद्ध नाम बन गया. 

हनुमान जी के भक्त थे नीम करोली बाबा

बताया जाता है कि बाबा को 17 साल की छोटी उम्र में ही ईश्वर के बारे में विशेष ज्ञान हो गया था. वह हनुमान जी को अपना गुरु और आराध्य मानते थे. बाबा ने अपने जीवनकाल में हनुमान जी के करीब 108 मंदिर बनवाए. माना जाता है कि हनुमान जी की पूजा और साधना से बाबा को कई चमत्कारिक सिद्धियां प्राप्त थीं. हालांकि वह दिखावे और आडंबर से दूर रहते थे. वह तो किसी को अपने पैर भी नहीं छूने देते थे. वे लोगों से कहते थे कि उनकी जगह हनुमान जी के पैर छुए.

कैंची धाम की कहानी

1961 में नीम करोली बाबा पहली बार नैनीताल आए थे. साल 1964 में उन्होंने भुवाली से सात किलोमीटर दूर कैंची धाम की स्थापना की. उन्होंने अपने मित्र पूर्णानंद के साथ मिलकर आश्रम बनाने का विचार किया. उनके आश्रम और चमत्कार की कहानियां विदेशों तक मशहूर हैं. फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बाबा के बारे में चर्चा की थी. इस युग के दिव्य पुरुषों में से एक माने जाने वाले नीम करौली बाबा के अनुयायी दूर-दूर से इस कैंची धाम में पहुंचते हैं. पीएम मोदी, जूलिया रॉबर्ट्स, एप्पल के फाउंडर स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग जैसी बड़ी हस्तियां बाबा को मानने वालों में शामिल हैं.

बाबा ने पानी से बना दिया था घी

बाबा नीम करोली के आश्रम के पावन धाम से जुड़े कई चमत्कारिक किस्से बताए जाते हैं. कहा जाता है कि एक बार भंडारे के दौरान घी कम पड़ गया था. तब बाबा ने कहा कि नीचे नदी के पास जाओ और एक कनस्तर में पानी भरकर ले आओ. बाबा के आदेश पर पानी लाया गया. थोड़ी देर बाद जब प्रसाद के लिए इसका इस्तेमाल किया जाने लगा तो यह घी बन चुका था. बाबा के भक्तों में से एक जाने-माने लेखक रिचर्ड अल्बर्ट ने बाबा के चमत्कारों के बारे में बताते हुए एक किताब लिखी है. इस किताब का नाम 'मिरेकल ऑफ लव' है.

वृंदावन में त्यागे थे प्राण

नीम करोली बाबा ने 11 सितंबर 1973 में वृंदावन में अपनी देह को त्याग दिया था. उनकी यही इच्छा थी कि वे अपने प्राण वृंदावन में त्यागे. यहां मृत्यु से कुछ समय पहले ही बाबा एक आश्रम में आकर रुके थे. कुछ दिन पहले तक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे थे. उनकी मृत्यु की वजह डॉयबिटिक कोमा बताया जाता है, जब डॉक्टर ने उनके इलाज शुरू किया तो उन्होंने पहले ही बता दिया था कि अब उनका आखिरी समय है. इसी के बाद उन्होंने यहां अपने प्राण त्याग दिये. इसी जगह पर उनका यहां एक मंदिर स्थित है, जहां भक्त उनके दर्शन करने आते हैं. 
 

Disclaimer: यह खबर सामान्य जानकारी और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. डीएनए हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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