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MahaKumbh 2025: जूना अखाड़े से निकाले गए IIT बाबा अभय सिंह, जानें क्यों और किसने लिया ये एक्शन

महाकुंभ की शुरुआत के सुर्खियों में आए आईआईटी बाबा पर जूना अखाड़ा के अध्यक्ष और संत समाज ने कार्रवाई की है. उन्होंने इंजीनियर बाबा को अखाड़े से बाहर कर शिविर के आसपास भी न दिखने का आदेश दिया है.

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MahaKumbh 2025: जूना अखाड़े से निकाले गए IIT बाबा अभय सिंह, जानें क्यों और किसने लिया ये एक्शन
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Mahakumbh 2025 IIT Baba: महाकुंभ की शुरुआत के साथ ही सोशल मीडिया पर चर्चा में आए आईआईटी इंजीनियर बाबा अभय सिंह को शनिवार को जूना अखाड़े से बाहर कर दिया गया है. अखाड़ा ने गुरु के प्रति अपशब्दों बोलने वाले वीडियो संज्ञान लेते हुए इंजीनियर बाबा पर यह कार्रवाई की. साथ ही इसमें आईआईटी बाबा अभय सिंह को अखाड़े या शिविर के आसपास आने पर भी रोक लगा दी गई है. यह जानकारी खुद जूना अखाड़े के सचिव हरि गिरि ने दी है. 

उन्होंने कहा कि संन्यासी को अनुशासन और गुरु के प्रति समर्पण बेहद महत्वपूर्ण है. इन दोनों ही चीजों का ध्यान और पालन न करने वाला व्यक्ति संन्यासी नहीं बन सकता है. महाकुंभ 2025 में शामिल हुए आईआईटी बाबा पिछले कुछ दिन से सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं. उन्होंने वीडियो में बताया था कि वह आईआईटी मुंबई से डिग्री लेकर आए. लाखों रुपये पैकेज कनाड़ा में नौकरी की. इसके बाद संन्यासी बन गये. 

आईआईटी बाबा को निकाला गया बाहर

दरअसल आईआईटी इंजीनियर बाबा अभय सिंह ने अपने ​माता पिता से लेकर गुरु पर कई बयान दिए हैं. उनके यही बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. इन्हीं वीडियों में उन पर गुरु का अपमान करने का आरोप है. इसी को लेकर संत समाज ने आईआईटी बाबा के खिलाफ आपत्ति जताई थी. अखाड़े ने कहा कि माता-पिता और गुरु का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. इसी को लेकर अखाड़े ने कहा कि संन्यासी में गुरु के प्रति समपर्ण और अनुशासन होना बेहद जरूरी है. इसका पालन नहीं करने वाले कभी भी संन्यासी नहीं बन सकते हैं. इसी को लेकर आईआईटी बाबा के आसपास आने पर भी रोक लगा दी गई है. 

जूना अखाड़े के संत बोले

आईआईटी बाबा को निष्काषण को लेकर जूना अखाड़े के संत श्री पंचदशनाम ने कहा कि गुरु असम्मान करने वाले अखाड़े की परंपरा को तोड़ने वालों का इसका हिस्सा नहीं बनाया जा सकता है. इस परंपरा को तोड़ने का हक भी किसी के पास नहीं है. अभय सिंह अखाड़े के अनुशासन को तोड़ रहे थे. वह गुरु शिष्य परंपरा से हटकर काम कर रहे थे और यह संन्यासी के सिद्धांतों के खिलाफ है. संत हरी गिरि ने कहा कि अपने गुरु के प्रति असम्मान का मतलब है कि सनातन धर्म और अखाड़ा की परंपरा के प्रति असम्मान करना.

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