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Mahabharat Secrets: महाभारत में वनवास के दौरान पांडवों को कैसे मिला अक्षय पात्र, जानें कहा गया ये बर्तन

महाभारत के अज्ञात तथ्य: जब युधिष्ठिर और उनके भाई द्रौपदी के साथ वनवास पर गए, तो उनके बीच एक अजीब झगड़ा हुआ. इस घड़े के कारण पांडवों और ऋषियों ने भी कभी...

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Mahabharat Secrets: महाभारत में वनवास के दौरान पांडवों को कैसे मिला अक्षय पात्र, जानें कहा गया ये बर्तन
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Mahabharat Secrets: महाभारत के बारे में आज भी लोग कई बातें नहीं जानते हैं. यहां तक ​​कि जिन लोगों ने महाभारत पढ़ा है उनके मन में भी अभी भी कई सवाल हैं. हम महाभारत से एक ऐसी ही घटना के बारे में जानने जा रहे हैं. ऐसा कहा जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास के दौरान एक चमत्कारिक युद्ध किया था, जब पांडव 12 वर्ष के वनवास पर थे, तो सबसे बड़ी समस्या भोजन की थी. सबसे बड़ा सवाल यह था कि जंगल में भूखे लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन कैसे जुटाया जाए, जब पांडवों के पास ऋषि और अन्य अतिथि उनके पास आये तो उन्हें भोजन परोसना कठिन हो गया. ऐसी स्थिति में युधिष्ठिर को एक चमत्कारी अस्त्र प्राप्त हुआ, जिसके कारण उन्हें कभी भी भोजन की कमी महसूस नहीं हुई. आइए जानते हैं इस चमत्कारी बर्तन को क्या कहा जाता है? निर्वासन के बाद उस बर्तन का क्या हुआ? इस चमत्कारी बर्तन के उपयोग के लिए कुछ शर्तें थीं, जिसके कारण एक बार वह बड़ी मुसीबत में पड़ गये थे. 

चमत्कारी बर्तन के पीछे का रहस्य?

इतिहास में उल्लेख है कि पांडवों के पास अक्षय पात्र नामक एक चमत्कारी अस्त्र था. इस शाश्वत चरित्र के बारे में एक किंवदंती है. ऐसा नहीं है कि जब पांडव वनवास पर गए तो उनके पास कभी खत्म न होने वाली कोई औषधि थी. ऐसे में वनवास के दौरान पांडवों को कई बार वनवास में भूखे पेट सोना पड़ा. इतना ही नहीं, कभी-कभी भोजन पर्याप्त नहीं होता था. वे पाण्डवों के पास आये सैकड़ों ऋषियों का आतिथ्य करने में कभी असफल नहीं हुए. पांडवों ने उन्हें तब तक भोजन कराया जब तक वे तृप्त नहीं हो गए. आप सोच रहे होंगे कि युधिष्ठिर को जंगल में इतना सारा भोजन कैसे मिला होगा. 

तब युधिष्ठिर ने सूर्य की तपस्या की...

वनवास के दौरान पांडवों की कुटिया में अतिथि और ऋषिगण आते रहते थे. उस समय द्रौपदी को इस बात की चिंता थी कि कहीं उनके आतिथ्य में कोई कमी न रह जाए. द्रौपदी ने युधिष्ठिर से इस समस्या का समाधान पूछा. उस समय युधिष्ठिर नदी के तट पर गए और जल में खड़े होकर सूर्यदेव की तपस्या करने लगे. कई दिनों तक ऐसा करने के बाद सूर्य भगवान प्रसन्न हुए और प्रकट हुए. जब उन्होंने युधिष्ठिर से इस तपस्या के बारे में पूछा तो युधिष्ठिर ने संकोचपूर्वक उन्हें पूरी समस्या बता दी. 

तभी सूर्यदेव...

इस मुद्दे पर सूर्य देव ने युधिष्ठिर से कहा कि अब वनवास में उन्हें न केवल अपने भोजन की चिंता करनी होगी, बल्कि वे अपने यहां आने वाले सभी अतिथियों को दिव्य भोजन भी करा सकेंगे. यह कहकर उन्होंने युधिष्ठिर को एक चमत्कारी अस्त्र दिया. जो अक्षय पात्र था. वास्तव में, पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि धौम्य नामक एक पारिवारिक पुरोहित ने युधिष्ठिर को इस संबंध में सूर्य की पूजा करने के लिए कहा था. 

सूर्यदेव ने साथ में दी शर्त

सूर्य देव ने एक शर्त रखी, उन्होंने कहा कि यह बर्तन हर दिन और हर घंटे असीमित भोजन प्रदान करता रहेगा, जब तक कि द्रौपदी अपना भोजन समाप्त नहीं कर लेती. इस कटोरे से उन्हें चार प्रकार के खाद्य पदार्थ मिलेंगे जैसे अनाज, फल, सब्जियां आदि. 

श्रीकृष्ण ने किया था द्रौपदी की समस्या का समाधान

अक्षय पात्र से संबंधित एक अन्य किंवदंती यह है कि अपने वनवास के दौरान एक दिन, पांडवों और द्रौपदी के भोजन करने के बाद, ऋषि दुर्वासा पांडवों से मिलने आए. उनके साथ बहुत से शिष्य थे. आगमन पर उन्होंने दोपहर का भोजन करने की इच्छा व्यक्त की. द्रौपदी चिंतित हो गयी. इसी बीच अचानक दुर्वासा ने घोषणा की कि वे और उनके शिष्य नदी में स्नान करके लौट रहे हैं. फिर हम खाना खायेंगे. द्रौपदी ने चिंतित होकर भगवान कृष्ण को पुकारा. अपनी बहन की पुकार सुनकर कृष्ण प्रकट हुए. श्री कृष्ण ने अपनी बहन से अक्षय पात्र लाने को कहा. उसमें चावल का एक दाना बचा और कृष्ण ने उसे खा लिया. इसके बाद उन्होंने कहा कि चावल के इस दाने से उनका पेट पहले ही भर चुका है. अब द्रौपदी, चिंता मत करो. दुर्वासा और उनके शिष्य नहीं आएंगे. यह क्या हुआ. जब दुर्वासा और उनके साथी स्नान करके बाहर आये तो उन्हें पता चला कि उनका पेट भर गया है. वे स्नान करने के बाद सीधे चले गये. द्रौपदी की समस्या का समाधान भगवान श्रीकृष्ण ने किया था. 

बाद में अक्षय पात्र का क्या हुआ?

पांडवों ने अपना 12 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद, अक्षय पात्र को अपने साथ महल में लाया. तब इस चरित्र की कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन उनके निर्वासन के दौरान, ये बर्तन एक महत्वपूर्ण संपत्ति थे, जिसकी बदौलत उन्हें कभी भी भोजन की कमी का सामना नहीं करना पड़ा. यह स्पष्ट है कि उस समय उन्हें अक्षय पात्र की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन सूर्य से प्राप्त यह चमत्कारी पात्र भी ईश्वरीय आशीर्वाद का प्रतीक था. उन्होंने इस बर्तन को सजाया और महल में सुरक्षित रख दिया.

Disclaimer: यह खबर सामान्य जानकारी और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. डीएनए हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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