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Kailash Mansarovar Yatra: 5 साल बाद शुरू हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा, जानें इसका धार्मिक महत्व

हर साल ​लोग कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते थे, लेकिन कोरोना और चीन व भारत में तनाव के चलते 5 सालों तक कैलाश मानसरोवर यात्रा बंद थी. इसकी वजह कैलाश मानसरोवर का रास्ता चीन से होते हुए जाता है.

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Kailash Mansarovar Yatra: 5 साल बाद शुरू हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा, जानें इसका धार्मिक महत्व
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Kailash Mansarovar Yatra 2025: चारधाम की यात्रा के बाद कैलाश मानसरोवर यात्रा की शुरुआत हो गई है. मान्यता है कि महादेव भगवान शिव मां पार्वती के साथ इसी पर्वत पर निवास करते हैं. यही वजह है कि हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत के साथ ही इसकी यात्रा का विशेष महत्व है. कैलाश मानसरोवर का हिंदू धर्म के साथ ही जैन धर्म और तिब्बतियों के बीच भी खासा महत्व है. अब कैलाश मानसरोवर यात्रार की शुरुआत हो चुकी है. कैलाश मानसरोवर की यात्रा 5 साल बाद शुरू हो गई है. 

क्यों 5 साल बाद शुरू हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा

चारधाम यात्रा की तरह ही हिंदू धर्म में कैलाश मानसरोवर यात्रा का बड़ा महत्व है. यह यात्रा बेहद कठीन होती है. हर साल ​लोग इस यात्रा को करते हैं, लेकिन कोरोना और चीन व भारत में तनाव के चलते 5 सालों तक कैलाश मानसरोवर यात्रा बंद थी. इसकी वजह कैलाश मानसरोवर का रास्ता चीन से होते हुए जाना है. ऐसे में चीन की परमिशन की जरूरत होती है. अब चीन की सहमती के बाद 30 जून 2025 से कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू हो गई है. 

कैलाश मानसरोवर यात्रा का महत्व

कैलाश पर्वत को महादेव भगवान शिव का माना गया है. यह समुद्र तल से 22,028 फीट ऊंचाई पर स्थित है. कैलाश पर्वत एक तरह का पिरामिड नुमा पत्थर है, जिसका शिखर शिवलिंग जैसा प्रतीत होता है. यह पूरे साल बर्फ की सफेद चादर से ढका रहता है. 22,028 फीट ऊंचे बर्फ से ढके शिखर और उससे लग मानसरोवर को कैलाश मानसरोवर कहते हैं. हिंदू धर्म में मान्यता है कि कैलाश मानसरोवर प्राचीन है. ​इसका संबंध सृष्टि से है. यह बेहद अद्भुत और अलौकिक जगह है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां पर प्रकाश तरंगों और ध्वमि तरंगों का समागम है. इसी से ॐ की प्रतिध्वनि निकालता है.

यही से निकलती है गंगा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, कैलाश मानसरोवर कुबेर की नगरी थी. यहीं से भगवान विष्णु के चरण कमलों से निकलकर गंगा नदीं कैलाश पर्वत की चोटी पर विकराल वेग के साथ नीचे गिरती हैं. कहा गया है कि यही वजह जगह है, जहां भगवान शिव गंगा को अपनी जटाओं में धारण किए हुए हैं और फिर मां गंगा निर्मल धारा का रूप धरकर नदी के स्वरुप में बहर रही हैं.  बताया जाता है कि जो भी व्यक्ति मानसरोवर झील की धरती को छू लेता है. उसे खुद ब्रह्मा जी अपने बनाए स्वर्ग ले जाते हैं. वहीं जो झील का पानी पी लेता वह भगवान शिव के बनाए स्वर्ग में जाता है.

महाभारत में भी कैलाश मानसरोवर का जिक्र

द्वापर युग में रची महाभारत में भी मानसरोवर का जिक्र किया गया है. कहा जाता है कि यही से मां सीता स्वर्ग गई थीं. कैलाश मानसरोवर को साक्षात् शिव का पवित्र स्थान माना गया है. महादेव की पूजा ज्यादातर शिवलिंग रूप में होता है, लेकिन मानसरोवर पर "ॐ" के रूप में पूजा की जाती है. मान्यता यह भी है कि भगवान शिव की कृपा के कारण ही सरोवर का जलस्तर हमेशा एक जैसा रहता है. यहां कितनी भी बर्फ और सर्दी पड़ जाए. इस मानसरोवर में बर्फ नहीं जमती. इसमें एक तरफ ठंडा और दूसरी तरफ गर्म पानी बहता है. वहीं इसके पास में स्थित सरोवर, जिसे राक्षसी ताल कहते हैं. उसका पानी हमेशा जमा रहता है. 

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