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Durga Puja 2023: नवरात्रि में वेश्यालय की मिट्टी के बिना नहीं बनती मां दुर्गा की मूर्ति, क्यों है ऐसा नियम?

प्राचीन काल से लेकर आज तक देवी की मूर्तियां बनाने के लिए वेश्यालय की मिट्टी की आवश्यकता होती है लेकिन यह प्रथा क्यों?

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Durga Puja 2023: नवरात्रि में वेश्यालय की मिट्टी के बिना नहीं बनती मां दुर्गा की मूर्ति, क्यों है ऐसा नियम?

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डीएनए हिंदीः शारदीय नवरात्रि हर साल आश्विन माह के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि को शुरू होती है और दशमी तिथि को विसर्जन के साथ समाप्त होती है. यह नवरात्रि 26 सितंबर से शुरू होकर 5 अक्टूबर को समाप्त होगी. इस समय जगह-जगह मिट्टी से बनी मां दुर्गा की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. आइए जानें कि मां की मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी कहां से लाई जाती है?

माँ दुर्गा की मूर्ति किस मिट्टी से बनाई जाती है?
उत्तर और पूर्वोत्तर भारत में नवरात्रि का पवित्र त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. यह त्यौहार मूलतः 9 दिनों तक चलता है. इन 9 दिनों में मां दुर्गा के विभिन्न रूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है. इस दौरान अलग-अलग पंडालों में मिट्टी से बनी मूर्तियां रखी जाती हैं और पंडालों को सजाया जाता है.

इन पंडालों में मां की स्थापना से पहले ही मां दुर्गा की मूर्तियां बनाई जाती थीं. मां दुर्गा की मूर्तियां बनाने के लिए वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है. हिंदू मान्यता के अनुसार, देवी दुर्गा की मूर्तियां गंगा मिट्टी, गोमूत्र, गाय के गोबर और वेश्यालय की मिट्टी को मिलाकर बनाई जाती हैं. हिंदू धर्म की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है.

मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए वेश्यालय की मिट्टी क्यों लाई जाती है?
वेश्यालय की मिट्टी से देवी दुर्गा की मूर्तियां बनाने के पीछे कई मान्यताएं हैं. कहा जाता है कि वेश्याओं ने देवी दुर्गा से प्रार्थना की थी कि मां की मूर्ति उनके वेश्यालय के आंगन से लाई गई मिट्टी से बनाई जाए. तब माता रानी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और वरदान दिया कि जो भी वेश्यालय की मिट्टी से बनी मूर्ति स्थापित करेगा और उसकी नियमित पूजा करेगा, उसकी प्रतिज्ञा सफल होगी. तभी से वेश्यालय के आंगन से लाई गई मिट्टी से मां दुर्गा की मूर्तियां बनाई जाने लगीं.

वहीं कुछ मान्यताएं ये भी है कि वेश्यालय की मिट्टी का उपयोग उन वेश्याओं को सम्मानित करने के लिए किया जाता है जिन्होंने लोगों की भावनाओं को वश में करके समाज को स्वच्छ रखा. शक्तिदर्शन और शक्तिसंप्रदाय के आधार पर मां दुर्गा की पूजा की पद्धति बनाई गई, इसलिए शक्तिसंप्रदाय द्वारा पहचानी गई नई कन्या के प्रतीक के रूप में उन 9 वर्गों की महिलाओं के दरवाजे की मिट्टी को मूर्ति बनाने के लिए लिया जाता है. यहां सिर्फ वेश्या के दरवाजे की मिट्टी ही नहीं बल्कि अष्टकन्या के दरवाजे की मिट्टी भी उतनी ही जरूरी है. इसके अलावा मूर्तियां बनाने में सात नदियों, 51 शक्तिपीठों और पांच जानवरों के अवशेषों का भी उपयोग किया जाता है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. डीएनए हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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